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दुनिया में दो उपाय हैं बोझ से मुक्त होने के- OSHO

दुनिया में दो उपाय हैं बोझ से मुक्त होने के—एक तो यह है कि दायित्व छोड़ दो, भगोड़ा संन्यासी वही करता है। वह दायित्व ही छोड़ देता है; वह कहता है कि न रहेगा बांस, न बजेगी बासुरी;बात खतम; पत्नी—बच्चों को छोड़कर भाग गए जंगल! वह दायित्व छोड़ देता है। यह कोई असली संन्यास न हुआ। असली संन्यास है दायित्व तो होने दो, कर्ता छोड़ दो। तो भी बोझ चला जाता है। वही असली क्रांति है।

यह कोई असली क्रांति न हुई, तुम अगर घर—बच्चे छोड़कर भाग गए, ज्यादा देर न लगेगी, पहाड़ की गुफा में भी बच्चे और पत्नी आ जाएंगे। किसी पहाड़ी स्त्री से लगाव बन जाएगा। तुम अपने से कहा जाओगे? शिष्य इकट्ठे हो जाएंगे, उन्हीं से तुम्हारा भाव हो जाएगा, वही जो तुम्हारा अपने बच्चों से था। उन्हीं से मोह लग जाएगा

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कल तुम्हारा शिष्य मर जाएगा तो तुम उसी तरह रोओगे जिस तरह तुम्हारे बेटे के मरने से रोते। तो फर्क क्या हुआ? मकान छोड़कर चले गए, गुफा में बैठ गए, कल गुफा में भूकंप आ जाए और गुफा टूट जाए, तो तुम उसी तरफ दुखी होओगे जैसे मकान के आग लग जाने से हो जाते। भेद क्या पड़ा? तुमने स्थिति बदल ली, मनस्थिति तो वही की वही है। सब छोड़कर चले गए, एक भिक्षापात्र ले गए और रात किसी ने गुफा से चुरा लिया, तो तुम्हारे सुबह मन में वही होगा, वही भाव उठेंगे जो किसी ने तुम्हारी तिजोड़ी खोलकर सारा धन निकाल लिया होता तब उठते। कुछ भेद नहीं पड़ेगा

असली संन्यास कर्ता का त्याग है, दायित्व का नहीं। वही गीता का अपूर्व संदेश है। गीता ने जगत को ठीक संन्यास की पहली परिभाषा दी। गलत संन्यास बहुत पुराना था, गीता ने एक अनूठे संन्यास की परिभाषा दी। गीता ने कहा—रहो यहीं, जीओ यहीं, और फिर भी भीतर से सब शून्य हो जाए। अर्जुन से वे कह रहे है—तू लड़ और भीतर से शून्य भाव से लड़।

तू परमात्मा के हाथ मे अपने को सौप दे—परमात्मा यानी समग्र के हाथ में अपने को सौप दे, फिर उसे जो करवाना हो, करवा ले। जीत होगी कि हार, यह भी विचारणीय नहीं है। तू है ही नहीं करने वाला, तो फिर फल विचारणीय नहीं हो सकता। अगर परमात्मा का जन्म और कर्म बहुत दूर की बात मालूम पड़े, बहुत एब्सटैरक्ट, हवाई बात मालूम पड़े, तो इस पृथ्वी पर जो कभी—कभी परमात्मा की थोड़ी सी झलक मिलती है, उनमें पहचानने को कोशिश करना। उनमे भी तुम वही पाओगे। वही शून्य भाव। भीतर कोई भी नहीं। कर्म का विराट जाल और कर्ता का अभाव।

अथातो भक्‍ति जिज्ञासा (भाग–1) प्रवचन–19

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