हिन्दी भाषा को ‘हिन्दी दिवस’ की कोई आवश्यकता नहीं है।

हिन्दी की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि इसमें वही लिखा जाता है जो उच्चारित होता है। इसमें हर ‘ध्वनि’ के लिए अपना एक शब्द है। दूसरी भाषाएं हिन्दी जितनी धनिक नहीं है। तीन हज़ार वर्ष पूर्व जब विश्व भाषाओं के बारे में जानता भी नहीं था, हिन्दी समृद्ध हो चुकी थी। एक अंग्रेजी भाषा विज्ञानी ने प्रयोग किया। उसने हिन्दी वर्णों के आकार और स्वरूप के अनुरूप मिट्टी के खोखले आवरण तैयार किये। जब इन आवरणों में साँस छोड़ी गई तो वही स्वर सुनाई दिए, जिनके आकार के आवरण बनाए गए थे। हिन्दी संस्कृत के बाद संसार की सर्वश्रेष्ठ भाषा है। आज हिन्दी दिवस के दिन पुराना राग छेड़ा जाएगा कि हिन्दी खतरे में है। एक ऐसा झूठ जो स्वतंत्रता के बाद से अनवरत कहा जा रहा है। हिन्दी को ‘हिन्दी दिवस’ की बैसाखियों की आवश्यकता कभी नहीं रही।

सन 2010 में देश में एक भाषाई सर्वेक्षण प्रारम्भ हुआ। देश में बोली जाने वाली 780 जीवित भाषाओं पर हिन्दी-अंग्रेजी के ख्यात विद्वान गणेश नारायणदास देवी के नेतृत्व में ये सर्वेक्षण किया गया। सर्वेक्षण प्रकाशित हुआ तो स्वतंत्रता के बाद से अनवरत बोले जा रहे झूठ का रहस्य सबके सामने आ गया। सर्वेक्षण में कहा गया कि हिन्दी संसार की सबसे अधिक बोली जाने वाली तीस भाषाओं में शामिल है। सर्वेक्षण के अनुसार ये एक वहम है कि आने वाले समय में अंग्रेजी हिन्दी व अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को समाप्त कर देगी।

पिछले दो दशक में हिन्दी को नया आकाश मिल गया है। अधिक संख्या में हिन्दी टीवी चैनलों का अस्तित्व में आना और इंटरनेट के द्रुत फैलाव ने हिन्दी को संजीवनी प्रदान कर दी। अब तक ये काम हिन्दी सिनेमा और अख़बारों के माध्यम से हो रहा था। इस जागरण में हिन्दी के मूर्धन्य साहित्यकारों का योगदान आश्चर्यजनक रूप से कम रहा है। हमारे संसद में जो हिन्दी बोली जाती है, वही देश की आम हिन्दी बननी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं है, बल्कि हमारे देश की हिन्दी शायद मुंबई के फिल्मों से निकलती है या मजदूरों और किसानों से।

हर वर्ष सरकार ‘हिन्दी दिवस’ का आयोजन कर करोड़ों रुपया व्यर्थ बहा देती है। बड़े विद्वान हर वर्ष कहते हैं हिन्दी संकट में है। जबकि हिन्दी तो अपना विस्तार लगातार बढ़ाती जा रही है। ऐसा नहीं है कि इस भाषा के सामने कोई संकट नहीं है। हिन्दी लिखने वाले सॉफ्टवेयर सुनियोजित ढंग से हिन्दी के कुछ वर्णों को विलुप्त करने का प्रयास कर रहे हैं।

अख़बारों और किताबों को छोड़ दे तो बाकी माध्यमों में ‘पूर्ण विराम’ का स्थान अंग्रेजी के ‘फुल स्टॉप’ ने ले ली है। ये परिवर्तन पिछले दस वर्ष में ही हो गया है। हिन्दी में मिलावट कर उसे अशुद्ध करने के प्रयास लगातार किये जा रहे हैं। निराशाजनक बात ये है कि अंग्रेजी के फुल स्टॉप को हिन्दी पाठकों ने स्वीकार कर लिया है, जो इस भाषा के लिए अशुभ संकेत है।

सोशल मीडिया ने हिन्दी को नया आकाश तो दिया है लेकिन साथ ही वर्तनियों की अशुद्धियां और फुल पॉइंट जैसी विकृतियां भी मुफ्त दे दी है। इन विकृतियों को पहचान कर दूर करने में अब तक सोशल मीडिया कुछ ख़ास नहीं कर सका है। इसका कारण इस माध्यम का उपयोग कर रहे लोगों में जागरूकता की कमी है।

इतने थपेड़े सहने के बाद भी हिन्दी ने अपनी वैज्ञानिकता और सार्थकता बनाए रखी है। आज देश में कहीं भी ‘हिन्दी दिवस’ मनाने की कोई आवश्यकता नहीं रह गई है। इस दिवस को मनाना बंद कर देना चाहिए और इसके स्थान पर भाषाई शुद्धता का सरकारी अभियान चलाने की आवश्यकता है। तीन हज़ार वर्ष से निर्बाध बह रही ‘हिन्दी’ सरिता आने वाले हज़ारों वर्ष तक नहीं सूखने वाली है। आवश्यकता है कि इस भाषाई नदी में से अशुद्धता को निकालकर ‘भाषाई पर्यावरण’ सुधार दिया जाए।

URL: There is no need of Hindi Diwas for Hindi language.

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Vipul Rege

Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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