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भाजपा समर्थकों के खून से सने लड्डू खा रहे हैं कथित किसान?

भाजपा समर्थकों के खून से सने लड्डू खा रहे हैं, दिल्ली बॉर्डर पर बैठे किसान! जी हाँ, कल जैसे ही पश्चिम बंगाल में चुनावों में ममता बनर्जी की जीत तय होती चली गयी, वैसे वैसे भाजपा के कार्यकर्ताओं में भय पैदा होने लगा और वह कार्यकर्ता जो सोशल मीडिया पर थे, वह भी धीरे धीरे अपने सोशल मीडिया अकाउंट बंद करने लगे। 

उन कार्यकर्ताओं में इतना भय बैठ गया कि वह कहने लगे कि अब कुछ दिन सोशल मीडिया से दूरी रखूंगा! दरअसल ममता बनर्जी का कार्यकर्ता पहले ही भाजपा कार्यकर्ताओं की ह्त्या करते हुए आ रहा था और वह चुनाव परिणामों के बाद हर प्रकार का प्रतिशोध लेने के लिए तैयार बैठा था। जैसे ही दीदी के चुनाव जीतने की खबर आती रही वैसे वैसे भाजपा के कार्यकर्ताओं के दिल में दहशत बढ़ने लगी। विजयी विधायकों को भी अपने प्राणों की रक्षा की चिंता होने लगी परन्तु सबसे हैरान करने वाला दृश्य दिल्ली के बॉर्डर पर बैठे कथित किसानों का था।

वहां पर लड्डू बांटे जा रहे थे, वहां पर लड्डू खाए जा रहे थे। क्यों? वहां पर आतिशबाजी क्यों हो रही थी? ऐसा क्या हो गया था कि वह लोग खुश थे? क्या पश्चिम बंगाल में किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलने लगा था? क्या पश्चिम बंगाल के किसानों को यह स्वतंत्रता प्राप्त हुई कि वह अपनी फसल ले जाकर मंडियों में बेच सकें? या फिर ऐसा कुछ हो गया था कि पश्चिम बंगाल सरकार ने किसानों की कोई मांगें मान ली थीं?

ऐसा कुछ नहीं हुआ था! ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था! किसानों से सम्बन्धित कोई भी उपलब्धि नहीं थी, फिर क्या था ऐसा कि दिल्ली और हरियाणा बॉर्डर पर आतिशबाज़ी हो रही थी? दरअसल जब भाजपा के कार्यकर्ता अपनी जान बचाने के लिए कुछ सोच रहे थे, और उनके खून से सड़कें रंगने की योजना तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता बना रहे थे, तभी उसी तृणमूल कांग्रेस की जीत की खुशी यह किसान मना रहे थे। एक ओर खून बह रहा था और दूसरी ओर वह लोग, जिनका इस चुनाव से कोई लेना देना ही नहीं था।

जिनका इस चुनाव से केवल इतना लेना देना है कि वह किसी न किसी प्रकार से केवल और केवल नरेंद्र मोदी को झुकाना चाहते हैं। वह बस यह चाहते हैं कि यह सरकार किसी प्रकार गिर जाए और देश में वही अराजकता फ़ैल जाए, जैसा वह फैलाना चाहते हैं, उन्हें इसी प्रकार अपने विरोधियों को मारने की छूट मिले,  उन्हें इसी प्रकार खून की ईद मनाने की छूट मिले! वह यही चाहते हैं।

यदि वह किसानों से सम्बन्धित समस्याओं के हल चाहते तो वह बहुत आराम से सरकार की बातें मान सकते थे पर वह ऐसा नहीं चाहते! वह खून खराबा चाहते हैं, वह छब्बीस जनवरी के बहाने देश जलाना चाहते थे! वह अपने विरोधियों को उसी तरह नंगा करना चाहते हैं, जैसा उन्होंने पंजाब में भाजपा विधायक के साथ किया। वह वही भय पूरे भारत में पैदा करना चाहते हैं कि हमारे खिलाफ कुछ बोला तो जान से जाओगे! यही कारण है कि वह निर्दोष भाजपा कार्यकर्ताओं के खून से परेशान नहीं हैं, बल्कि वह खुश हैं कि भाजपा हार गयी है।

क्योंकि उनका भी कहीं न कहीं हाथ इस हिंसा में हैं। क्योंकि कथित किसान भाजपा को हराने के लिए पश्चिम बंगाल गए थे और उन्होंने भाजपा को हराने की अपील की थी। हालांकि यह अपील कितनी कारगर रही होगी, यह नहीं पता! पर इससे कथित किसानों के कुटिल इरादे पता चले थे, जिन्होनें अपनी मई दिवस की प्रेस विज्ञप्ति में भड़काऊ बातें कहीं थीं।  पहले तो किसानों का मई दिवस से क्या मतलब? परन्तु नहीं, संयुक्त किसान मोर्चा ने मई दिवस मनाते हुए प्रेस विज्ञप्ति में कहा

“शिकागो कें 1886 के आंदोलनों को याद करते हुए, वक्ताओं ने 8 घंटे कार्यदिवस की मांग और संगठित होन व संघर्ष करने के अधिकार की चर्चा की। इसमें पुलिस फायरिंग मे कई मजदूर मारे गए और बाद में 7 नेताओं पर फर्जी केस दर्ज करके उन्हें मौत की सजा दी गयी, पर इसके बावजूद आंदोलन जारी रहा।

आज भारत सरकार ने ना केवल 4 लेबर कोड अमल करके मजदूरों द्वारा न्यूनतम वेतन, मानवीय काम के हालातों, औद्योगिक दुर्घटनाओं से रक्षा, स्वास्थ्य व शिक्षा की कल्याणकारी योजनाओं के मौलिक अधिकारों के लिए संघर्ष के हक पर हमला किया है, उसने पर्यावरण की रक्षा के पैमाने कमजोर करके विनाशकारी उद्योगकों को भी छूट दी है। आज बहुत सारे बुद्धिजीवियों को किसानों व मजदूरों के संघर्ष का समर्थन करने के लिए फर्जी केसों में जेल में डाला जा रहा है, जैसा कि 1886 में किया था।

वक्ताओं ने स्वस्थ्य, शिक्षा, एलाआईसी, बैंक, रेल आदि का निजीकरण करने की निन्दा की और कहा कि इससे आम जन की परेशानियां बढ़ जाएंगी।“

किसान आन्दोलन में 1886 के शिकागो आन्दोलन को क्यों याद करना? क्या इनका किसानों की समस्या या उनके समाधान से कोई सम्बन्ध है? नहीं! क्या यह भड़काने का प्रयास है? तो इसका उत्तर है हाँ!

इतने दिनों से दिल्ली बॉर्डर को रोके रख कर आम लोगों की समस्याओं से उन्हें लेना देना नहीं है। पर फिर भी वह डटे हुए हैं, इसी आस में कि वह सुबह कभी तो आएगी जब नरेंद्र मोदी सरकार गिरेगी और वैसे ही हिंसा फैलेगी जैसे अभी पश्चिम बंगाल में फ़ैली हुई है और फिर वह हिंसा का वही दौर दोहरा सकें, जो अभी पश्चिम बंगाल में फैला हुआ है।

विभिन्न स्रोतों से यह ज्ञात हुआ है कि अब तक पचपन से अधिक भाजपा कार्यकर्ताओं की जानें जा चुकी हैं, लूटपाट जारी है और अभी पश्चिम बंगाल भाजपा किसी प्रकार अपने कार्यकर्ताओं के साथ खड़े होने की कोशिश कर रही है, पर यहाँ पर लड्डू बंट रहे हैं! इन लड्डुओं में खून लगा हुआ है, कथित किसान भाइयों! बहुत ज्यादा खून! अपनी महत्वाकांक्षा में इतने निर्दयी मत हो जाइए, जरा इन वीडियो पर नज़र डालिये और फिर सोचिये कि क्या लड्डू बांटना सही था?

हालांकि पश्चिम बंगाल के राज्यपाल ने राज्य के डीजीपी को क़ानून व्यवस्था सामान्य करने के निर्देश दिए हैं:

कल निर्वाचित हुई भाजपा विधायक चन्दना बौरी ने भी गृह मंत्री अमित शाह से गुहार लगाते हुए कहा कि बंगाल में कल 28 भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है @narendramodi जी @AmitShah जी कृपया हमे सुरक्षा दीजिए.!!

गृहमंत्री जी और प्रधानमंत्री जी पर अब यह निर्भर करता है कि वह अपने कार्यकर्ताओं के साथ खड़े होते हैं या फिर एक बार फिर से निराश करते हैं 

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Sonali Misra

Sonali Misra

सोनाली मिश्रा स्वतंत्र अनुवादक एवं कहानीकार हैं। उनका एक कहानी संग्रह डेसडीमोना मरती नहीं काफी चर्चित रहा है। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति कलाम पर लिखी गयी पुस्तक द पीपल्स प्रेसिडेंट का हिंदी अनुवाद किया है। साथ ही साथ वे कविताओं के अनुवाद पर भी काम कर रही हैं। सोनाली मिश्रा विभिन्न वेबसाइट्स एवं समाचार पत्रों के लिए स्त्री विषयक समस्याओं पर भी विभिन्न लेख लिखती हैं। आपने आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में परास्नातक किया है और इस समय इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से कविता के अनुवाद पर शोध कर रही हैं। सोनाली की कहानियाँ दैनिक जागरण, जनसत्ता, कथादेश, परिकथा, निकट आदि पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।

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