घर के बाहर पड़ा ‘पटाखों का कचरा’ भी ‘ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तान’ से होता है सुंदर!

गुरुवार की दोपहर ‘ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तान’ का पहला शो खत्म होते ही ट्वीटर पर इस फिल्म के नाम से बनने वाले ‘मेमे’ की बाढ़ आ गई। यदि पहले ही शो के बाद ऐसी तीखी प्रतिक्रिया आ जाए तो समझिये फिल्म गहरे संकट में है। यशराज फिल्म्स के बैनर तले बनी ये फिल्म एक ऐसा पटाखा है, जिसकी पैकिंग चमकदार कागज में की गई है लेकिन बारूद घटिया किस्म का है। सन 2005 में आमिर खान की फिल्म ‘मंगल पांडे: द राइजिंग’ फ्लॉप रही थी। इसके बाद से आमिर का कॅरियर लगातार उड़ान भरता रहा था। आज आमिर खान का परफेक्शन मात खा गया। मात खा गया निर्देशक के चयन में।

फिल्म के निर्देशक विजय कृष्ण आचार्य ने हाल ही में इस बात से इनकार किया कि ‘ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तान’ फिलिप मीडोज टेलर के नॉवेल ‘कन्फेशन ऑफ ए ठग’ पर बनी है। सच ही कहा था। ऐसी अजूबी भेल की प्रेरणा वह क्लासिक उपन्यास नहीं हो सकता। फिल्म की कहानी 1795 के भारत की है, जब भारत पर ईस्ट इंडिया कंपनी का राज था लेकिन रौनकपुर अंग्रेजों की पकड़ से दूर था। वहां का सेनापति खुदाबख्श जहाजी (अमिताभ बच्चन) अपने मिर्जा साहब (रोनित रॉय) का और पूरे प्रदेश की सुरक्षा करता था। ईस्ट इंडिया कंपनी का जनरल क्लाइव मिर्जा की हत्या करवा देता है। खुदाबख्श मिर्जा की बेटी जफीरा (फातिमा सना शेख) को बचा लेता है और उसे योद्धा की तरह पालता है। फिरंगी मल्लाह (आमिर खान) ‘आज़ाद’ खुदाबख्श को गिरफ्तार करवाकर अंग्रेज़ों से इनाम पाना चाहता है।

ये कहानी एक विशेष कालखंड को प्रस्तुत करती है इसलिए ट्रीटमेंट अचूक होना चाहिए था लेकिन ऐसा हुआ नहीं। विजय कृष्ण आचार्य की फिल्म ढेर सारी निर्देशकीय गलतियों का पुलिंदा बनकर रह गई। इस कहानी पर एक मनोरंजक फिल्म बनाई जा सकती थी लेकिन निर्देशक ने ऐसी भेल बना डाली जिसमे अंग्रेज़ अधिकारी साफ़ लहज़े की उर्दू बोलता है। जिसमे सुरैया ( कटरीना कैफ) आज के दौर के स्टाइलिश कपड़े पहनकर डांस करती हैं। दर्शक को समझ नहीं आता कि वह एक आइटम गीत देख रहा है या सतरहवीं सदी का मुजरा। फिल्म के प्रारम्भिक सीक्वेंस से ही निर्देशक गलती पर रहे हैं। उनके कैरेक्टर ‘लार्जर देन लाइफ’ हैं। वे अपने किरदारों की ‘कैरेक्टर बिल्डिंग’ नहीं करते, सीधा फ्रेम में ले आते हैं। जब आप कैरेक्टर की खूबियां दिखाए बिना प्रारम्भिक दृश्य से उन्हें महाबली दिखाने लग जाते हैं तो दर्शक को अविश्वसनीय लगता है।

पौने तीन घंटे की फिल्म शुरुआत में थोड़ी बहुत प्रभावित करती है तो अमिताभ बच्चन की जादुई उपस्थिति के कारण। यदि महानायक को निकाल दिया जाए तो इस भंगार में कुछ देखने लायक नहीं बचता। 76 की आयु में वे सहजता से एक्शन दृश्य कर लेते हैं। उनकी असीमित ऊर्जा के आगे आमिर खान बेबस नज़र आते हैं। हालांकि इस निम्न स्तर के स्क्रीनप्ले में अमिताभ के लिए ज्यादा गुंजाइश नहीं थी इसके बावजूद उन्होंने इंटरवल तक फिल्म को अपने बूढ़े लेकिन मजबूत कन्धों पर ढोया है। फिल्म में फिरंगी मल्लाह की एंट्री गधे पर बैठकर होती है। पश्चिम से आयातित आमिर का लुक अजीब है। पूरी फिल्म में वे मूंछों में नज़र आए हैं। हिन्दी फिल्मों का दर्शक अपने प्रिय अभिनेता के लुक को लेकर बहुत जज्बाती होता है। लुक में थोड़ा सा हेरफेर दर्शक को नाराज़ कर देता है।

गोल फ्रेम का चश्मा लगाए आधा विलायती दिखने वाला हीरो जब गधे पर बैठकर एंट्री ले तो ये फिल्म के भविष्य के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। और जब एक बार दर्शक आपका लुक नकार दे तो आप कितना भी अच्छा कर लें, सब अंततः धूल ही होने वाला है। फातिमा सना शेख जफिरा के किरदार के लिए ‘मिसफिट’ साबित हुई हैं। एक्शन करते समय ‘जेस्चर’ क्या होना चाहिए, ये उनको सीखना अभी बाकी है। निर्देशक ने ओवरएक्टिंग करवा करके और लाउडली डायलॉग बुलवाकर उनके किरदार का नाश कर दिया। कटरीना कैफ को वेस्ट किया गया है। मोहम्मद जीशान अय्यूब ने घोर ओवरएक्टिंग का नमूना पेश किया है। फिल्म के वीएफएक्स के बारे में इतना ही कहा जा सकता है कि इससे बेहतर इफेक्ट्स दक्षिण की फिल्मों में मिल जाते हैं, हॉलीवुड से तुलना तो हो ही नहीं सकती।

इरादा तो भारत के गरीब दर्शकों के लिए ‘देसी पाइरेट्स ऑफ़ केरेबियन’ बनाने का था लेकिन दांव उल्टा पड़ गया। सिंगल स्क्रीन के साथ मल्टीप्लेक्स ने भी फिल्म को नकार दिया। ऐसी फ़िल्में अस्सी के दशक में बना करती थी जब दुश्मन के अड्डे पर हीरो नशे के लड्डू गुंडों को खिलाकर आधी जंग यूँ ही जीत लेता था। ऐसा लचर ट्रीटमेंट सिंगल सिनेमा के दर्शकों ने भी अस्वीकार कर दिया। अब सिंगल थियेटर के दर्शकों का भी विकास हो चुका है। वे हॉलीवुड की फिल्मे देखते हैं। आप उन्हें मूर्ख नहीं बना सकते। फिल्म की टिकट दरें बहुत महंगी रखी गई है। पहले शो के बाद सिर में दर्द लेकर दर्शक जब बाहर आया तो उसे महसूस हुआ कि आमिर जिस पर सवारी कर रहे थे, वह गधा दरअसल दर्शक है, जो तीन सौ रूपये खर्च कर ‘कचरा’ देखने गया है। दीपावली की दूसरी सुबह घर के बाहर पड़ा ‘पटाखों का कचरा’ भी ‘ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तान’ से सुंदर होता है।

URL: Thugs Of Hindostan Review: Big B and Aamir Khan’s Film Disappoints Big Time

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Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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