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केदारनाथ मन्दिर को पुरातात्विक स्मारक बनाना कहाँ तक उचित है?

डॉ0 भगवती प्रसाद। पुरोहित मन्दिर को ज्योंहि आप सरकार के कब्जे में डाल देते हैं त्योंही वह संविधानिक रूपसे सेक्युलर हो जाता है। कल को गौभक्षक पुरातात्विक अधिकारी कहेंगे केदार लिंग पर शहद और घी लगाना बन्द करो! इससे पत्थर का क्षरण होने का खतरा है तो आपको अपनी पूजा बदलनी होगी। अब मन्दिर के अंदर आप भैरव के सरसों के तेल का दिया नहीं जला पाएंगे क्योंकि इससे स्मारक के पत्थर काले हो जाते हैं।

आप कभी भी पुरातत्व विभाग के गौभक्षक अधिकारी को निरीक्षण हेतु मन्दिर में जब चाहे तब जाने से नहीं रोक सकते, भले ही आपका कितना बड़ा अनुष्ठान चल रहा हो। अब आपके श्रद्धा और दर्शनों से पुरातत्व का कोई मतलब नहीं उनके कर्मचारियों का काम तो स्मारक की देख रेख करना है। सायं पूजा 7 बजे गेट बंद, उसके बाद पुजारी हो या रावल किसी के बाप के झांकने की ताकत नहीं। उन्हें इस बात से क्या मतलब कि शिव की रात्रि उपासना होती है। सुबह भी पुरातत्व विभाग का गेट 6 बजे खुलता है। तब तक दर्शन का मतलब नहीं। वे केदार के चारों ओर ईंट गारे और लोहे का पिंजड़ा बना कर कैद कर देंगे।

सफाई के नामपर गौभक्षक पुरातत्व संरक्षक ऐसे कैमिकल से पत्थरों की सफाई करते हैं कि वे पत्थर क्षरित होने लगते हैं। विश्वास न होतो उड़ीसा के लिंगराज और कोणार्क मन्दिरों के पत्थरों को देख लो, हजारों सालों की ये धरोहर पुरातत्व विभाग ने पिछले कुछ सालों में धो कर बर्बाद कर दी है। सरकार के सेक्युलरिज्म का उपयोग जेहादी जमकर कर रहे हैं। पुरातात्विक संरक्षण के नाम पर मन्दिरों का विनाश जेहादी कार्ययोजना का वो हिस्सा है जिसको सरकारी संरक्षण प्राप्त है।

आप क्या कर लोगे? विशेषज्ञ की डिग्री उसके पास है कि आपके पास? पिछले वर्षों में ऐसे ही तुगलकी फरमान उज्जैन के महाकाल मन्दिर से भी सुनने को मिले जब एक पुरातत्वविद ने महाकाल विग्रह पर गङ्गा जल या अन्य जलाभिषेक को रोकने का आदेश जारी किया और कहा केवल डिस्ट्रिल वाटर से ही अभिषेक होगा। हम देशभर में चिल्लाये बड़ी मुश्किल से फरमान वापस हुआ। कल को केंद्र में और राज्य में दोनों जगह जेहादी सेक्युलर सरकार आ गयी तो तब क्या कर लोगे? गोपेश्वर मन्दिर जो 1960 के बाद पुरातत्व विभाग के संरक्षण में चले गया था।

अच्छा खासा मन्दिर 2006 के आसपास यहाँ इनका एक सुपरिटेंडेंट आया बड़ा मीठा बोलने वाला गौभक्षक उसने मन्दिर के पत्थरों को साफ करने के लिए एक से एक कैमिकल मंगवाये नतीजतन लगभग तीन हजार साल से अधिक पुरानी मूर्तियां और लिंग जिनपर वज्रलेप लगा था और चमक इतनी थी कि आदमी का चेहरा दिख जाता था। आज उनका बज्रलेप खाल की तरह उधड़ रहा है। बक्कल निकल रहे हैं। मूर्तियां बर्बाद कर दी हैं।

सबसे बुरा हाल त्रिशूल का है स्कन्दपुराण नागरखण्ड की मानें तो यह त्रिशूल उसी परशु का यष्टि दण्ड वाला भाग है जिस परशु से भगवान परशुराम ने हहैय्य क्षत्रियों का वध किया था। पुराणों ने इस त्रिशूल की दिव्य महिमा का गायन किया है। मैंने इसके लोहे को चाँदी की तरह चमकते देखा लेकिन आज त्रिशूल का भी वज्रलेप उतर गया और आज वह जंग लगकर सड़ रहा है। युगों की विरासत खत्म करके रख दी। गोपेश्वर मूल रूप से विष्णु/कृष्ण मन्दिर था जिसका प्रमाण मैंने “रुद्रमहालय गोपेश्वर” पुस्तक में दिया है।

इस मंदिर के बाहर उत्तर में चरण पादुका चौंरी थी, जिसमें भगवान विष्णु की चरण पादुका के साथ अनेक देवी देवताओं की मूर्ति युगों से प्रतिष्ठित थी पुरातत्व विभाग ने सुरक्षा के नाम पर चबूतरा ही उखाड़ दिया। मूर्तियों को उखाड़ कर एक अंधेरे कोने में फेंका गया है। जिसको वे देखने तक नहीं देते। यही हाल गोपेश्वर मन्दिर के आग्नेय में स्थित नवदुर्गा मन्दिर का भी है। पुरातत्व विभाग ने सरक्षण के नाम पर मन्दिर की मूर्तियां उखाड़ कर पतानहीं कहाँ फेंकी हैं। मैंने कई बार उनसे नव दुर्गा की मूर्ति दिखाने के लिए कहा लेकिन सुरक्षा के नाम पर उन्होंने दिखाई नहीं।

तब 1999 के आस पास चमोली के SP ने एक पीतल की दुर्गा की मूर्ति यहां पर रखी। मन्दिरों को पुरातत्व विभाग के पास संरक्षण हेतु देना ऐसा ही है जैसे गाय को रक्षा के लिए कसाई के हाथों सौपना है। अरे मूर्ति स्थापना का विधान है, उसमें प्राण प्रतिष्ठा होती है। बड़ा अनुष्ठान होता है तब जाकर मूर्ति में प्राण या शक्ति आती है, वह सुफल दायक होती है। जब तुम मूर्ति को उखाड़ दोगे तो क्या उस अधिष्ठान की शक्ति या देवत्व बना रह पायेगा? क्योंकि पीठ का अधिष्ठाता अकेले नहीं होता उसके मूल में पीठ की अधिष्ठात्री शक्ति होती है।

अधिष्ठात्री शक्ति की अपनी सेना होती है। कहाँ भैरव रहेगा, कहाँ नन्दी रहेगा, कहाँ भूम्याल रहेगा, कहाँ, कीर्तिभिमुख रहेगा, कहाँ योगिनियां रहेंगी, कहाँ बीर रहेंगे, कहाँ प्रमथ आदि गण रहेंगे, कहाँ यम रहेगा, उनकी उपयुक्त पर्व पर पूजा उपासना विधि विधान का पुरातत्व के किसी अधिकारी को ज्ञान हो तो सामने आये। मेरी चुनौती है कि केदार की या किसी भी शिव मंदिर की देवपंचायत के बारे में एक भी पुरातत्वविद को पूजा अनुष्ठान के बारे में जानकारी हो बता दे! हम केदार मन्दिर के पुरातत्व विभाग द्वारा अधिग्रहण का विरोध नहीं करेंगे!

अगर पुरातत्व विभाग को हिन्दू धार्मिक मान्यताओं और परम्पराओं का ज्ञान नहीं है तो पुरातत्व विभाग किस बात का संरक्षण करेगा? पत्थरों के ढेर का? सरकार मकबरे, मजार, कब्र, स्मारकों और मन्दिरों को एक ही तराजू में कैसे तोल सकती है। आज पुरातत्व विभाग और सरकार हक हकूक धारियों को सब्जबाग दिखाकर मन्दिर का अधिग्रहण कर लेगी लेकिन कल क्या हाल होगा? मन्दिर से जुड़ें लोगों को उन ज्योतिर्लिंगों के मन्दिरों से पूछना चाहिए जो पुरातत्व विभाग के कब्जे में हैं। लोग सरकार से पुरातत्व का नियंत्रण खत्म करने की गुहार लगाते लगाते थक गए लेकिन अपने कब्जे की प्रॉपर्टी कोई क्यों छोड़े? अभी आम आदमी मन्दिर परिसर में फ़ोटो खिंचवाता है नाच लेता है झूमता है।

तब आपकी वही स्थिति होगी जो चीन में जाकर कैलास मानसरोवर के दर्शन में होती है। मन्दिर परिसर में फ़ोटो खींचने पर भी पुरातत्व विभाग 500 रु लेगा।
अभी पण्डे पुरोहित हक-हकूकधारी अपनी झोपड़ियां/मकान बना कर गुजर बसर कर ले रहे हैं। पुरातत्व विभाग के अधिग्रहण के बाद आप केदार में एक भी मकान बना के दिखा दो तो मान जायें। पुरातत्व विभाग से परमीशन मिलनी नहीं है और बिना परमीशन के मकान सरकार जब चाहे तब तोड़ दे। असलियत में तो केदार मन्दिर का पुरातत्व विभाग द्वारा अधिग्रहण केदार के पण्डों की अक्ल दुरुस्त करने की कार्ययोजना का हिस्सा लगता है। क्योंकि हर तरह से सबसे ज्यादा नुकसान इन्हीं को होना है।

अभी मन्दिर समिति के लोगों पर रौब झाड़कर जब चाहो मन्दिर में घुस जाओ। तब मन्दिर समिति की चलनी नहीं है। पुरातत्व वाले जब चाहे कस लें। आप ज्यादा बात करेंगे तो वे कहेंगे। देहरादून या दिल्ली ऑफिस से आप हमको आर्डर करवा के ले आयें हम वही मानेंगे। सच्चाई यह है कि केंद्र सरकार के विभाग राज्य सरकार को कुछ मानते नहीं। राज्य सरकार की शिकायत कूड़ेदान में। मन्दिर समिति के माननीयों का जलवा आज तो चल सकता है, लेकिन अगर मन्दिर पुरातत्व विभाग लेता है तो कल यही लोगों की गालियां खाएंगे और खुद को कोसेंगे।

दूसरी बात जहां तक मेरी समझ है मेरे पास केदार के जनमेजय द्वारा बनाये गए मन्दिर का इतिहास है। पहली बार मैंने ही अपनी पुस्तकों से यह तथ्य उजागर किया और बाद में देश के मूर्धन्य विद्वानों ने मेरी बात को प्रमाणित किया। रावलों का भी 3700 साल का इतिहास मिलता है। मेरा सवाल है कि जब स्थानीय लोग शताब्दियों से मन्दिर का प्रबन्ध संचालन और संरक्षण कर रहे हैं, तो सरकार को अब इसमें हस्तक्षेप की जरूरत क्यों आन पड़ी है? मुझे तो नियत में खोट और अज्ञानता दिख रही है।

कभी आप देवस्थानम बोर्ड के जरिये देवभूमि की आस्थाओं पर प्रहार करते हैं तो कभी पुरातत्व विभाग से मन्दिरों के अधिग्रहण द्वारा। क्या आपसे पहले की सरकारें, प्रशासन, नीति निर्माता या जनता इतने मूर्ख थे कि उन्हें अपने तीर्थ मन्दिरों के संरक्षण का होश नहीं था? देवभूमि के लोग केंद्र सरकार में भी महत्वपूर्ण पदों पर रहे लेकिन किसी ने ऐसी धृष्टता नहीं की। यह मन्दिरों का संरक्षण नहीं बल्कि भक्षण और देवभूमि के प्रति साज़िश है।

सनातनी हिन्दू होने के नाते अगर सच बयाँ न करता तो मुझे पाप लगता। क्योंकि यह श्री बद्रिकाश्रम क्षेत्र है इसके अधिष्ठाता भगवान नारायण हैं। नारायण ही सत्य हैं और सत्य ही नारायण है। इसलिए सच लिखना मेरी मजबूरी है। बाकी तो साहब हम गुलाम हैं। सत्य बोलने पर भी जेल डाल दिये जाते हैं। शायद हिन्दुत्व यही होता होगा।

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