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महाकाल शिव के तांडव का महापंडित रावण और महर्षि पतंजलि से अनसुना संबंध!

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आदित्य जैन। आपकी रुचि संस्कृत में है क्या? या आपकी रुचि संगीत में है? या आपकी रुचि इस बात को समझने में है कि महान काव्यों की रचनाएं कैसे हुई? या आप कुछ नया जानने की रुचि रखते हैं? तो आप महापंडित तपस्वी अंहकारी रावण की लड़ाई महायोगी तपस्वी महर्षि पतंजलि से करा दीजिए। अब आप सोच रहे होंगे कि इनको कहां ढूंढे? अभी तो यह इस धरती पर होंगे नहीं ! है ना ? यही सोच रहे हैं ? तो मैं आपको बता दूं कि आज भी इनकी चेतना इस जगत में विद्यमान है। कहां विद्यमान है ? इनकी महान रचनाओं में आप इनकी चेतना के दर्शन कर सकते हैं ।

उससे पहले मैं आपको महादेव शिव के बारे में कुछ बताना चाहता हूं। शिव तांडव करते हैं। यह दो प्रकार का होता है । एक क्रोध से भरा हुआ और दूसरा आनंद से भरा हुआ। क्रोध से भरे तांडव वाले शिव को रूद्र कहते हैं, जिसने महाबलशाली रावण को कुछ पलों में ही परास्त कर दिया था। आनंद से भरे तांडव वाले शिव को नटराज अर्थात कलाओं का राजा कहते हैं जो अपने डमरू को बजाकर ही संस्कृत भाषा के व्याकरण की उत्पत्ति कर देते हैं। इसी प्रकार अलग – अलग समय में शिव, रूद्र, नटराज, भैरव, महाकाल आदि रूपों में प्रकट होते हैं ।

एक बार दक्ष प्रजापति के यज्ञ में अपनी भार्या सती द्वारा अग्नि में विलीन होने पर भी शिव तांडव दिखाकर भारत में 52 शक्ति पीठों की स्थापना के उत्प्रेरक बने थे।आज हम महादेव शिव पर रचित दो स्तोत्रों के विचार सौंदर्य व लालित्य को देखेंगे । रावण की रचना ” शिव तांडव स्तोत्र ” को प्रथम बार पढ़कर देखिए। जीभ लड़खड़ा जाएगी। जीभ, तालु, दांत और होंठ और मन के उपयुक्त तालमेल के बिना आप इस स्तोत्र का सही उच्चारण नहीं कर पाएंगे। जब कुछ दिनों में सही उच्चारण होने लगेगा तो फिर इस स्तोत्र की लय पकड़नी मुश्किल होगी ।

अभ्यास के द्वारा आप लय भी पकड़ लेंगे और फिर आपको शिव तांडव स्तोत्र को पढ़ने में आनंद आने लगेगा । प्रारम्भ में , नदी में तैराकी सीखने में मुश्किल होती है। सजगता, अनुशासन, निरंतरता के साथ सीखना पड़ता है। एक दिन जब तैराकी के सारे पाठों का अभ्यास हो जाता है तो फिर गंगा, कावेरी, महानदी या ब्रह्मपुत्र आदि नदियों में तैरने का आनंद आता है और जब आनंद की अभिव्यक्ति होती है तो माइकल फेलेप्स जैसे तैराक ओलंपिक में ढेरों स्वर्ण पदक जीत लेते हैं या बाल योगी नील कंठ वर्णी जैसे तैराक नदी की धारा के सहारे ही तैरते हुए एक शहर से दूसरे शहर पहुंच जाते हैं ।

वस्तुत :जब अभ्यास त्रुटि रहित होता है तो शिव तांडव स्तोत्र के उच्चारण में खुशी मिलती है । शिव तांडव स्तोत्र के प्रतिपाद्य विषय महादेव शिव है । दशानन का नाम रावण भी महादेव शिव ने दिया था । अंहकारी दशानन को महादेव शिव ने भयंकर दर्द से भीषण चीत्कार करने को विवश किया । इसी विवशता में उसने सामवेद की स्तुति गानी प्रारम्भ की ।

दशानन ने यह स्तुति भयंकर दर्द के कारण भीषण चीत्कार से गाया था और इसी भीषण चीत्कार को संस्कृत भाषा में ” राव: सुशरूण: ” कहा जाता है। रावण का तात्पर्य ‘भीषण चीत्कार करने पर विवश शत्रु’ है। लेकिन इस स्तोत्र के गायन के बाद उसे बड़ी राहत मिली। इसी प्रकार महादेव शिव पर एक स्तोत्र का सृजन और किया गया है। वह भी शिव तांडव स्तोत्र की तरह अपनी रचना में, गायन विधि में बहुत विशिष्ट है।

इस स्तोत्र की रचना महायोगी पतंजलि ऋषि ने ” नटराज स्तोत्र ” के रूप में की है । शिव सभी कलाओं के राजा है। संसार में ध्वनि की उत्पत्ति भी उनसे हुई है और शिव उन ध्वनियों से परे भी हैं । इसीलिए उन्हें भैरव भी कहा जाता है । नटराज शिव की एक स्थिति है। चार हाथों , दो पैरों वाले शिव की आकृति ओंकार के रूप में हैं। एक उठा हुआ पांव मोक्ष का द्योतक है और बौने या अज्ञान को कुचलने वाला पांव ज्ञान की उत्पत्ति की ओर संकेत करता है ।

डमरू वाला हाथ सृजन का प्रतीक, अग्नि वाला हाथ विध्वंस का प्रतीक, अभय मुद्रा वाला हाथ रक्षा का प्रतीक तथा उठे हुए पैर की ओर संकेत करने वाला हाथ इस संसार के कर्मों के वृत्तीय पथ को दर्शाता है। नटराज की स्थिति इस ब्रह्माण्ड के किसी गहरे सत्य को उद्घाटित करती है। वह सत्य क्या है ? यह मैं आपको नहीं बताऊंगा। सत्य के उद्घाटन की यात्रा आपको स्वयं ही करनी पड़ेगी, उसकी अनुभूति भी स्वयं ही लेनी पड़ेगी, जैसे बादाम आदि मेवों से बनी केसर मिश्रित चावल की खीर का स्वाद किसी दूसरे के वर्णन से नहीं , बल्कि स्वयं के खाने से मिलता है ।

इस नटराज स्तोत्र की विशेषता यह है कि इसकी पंक्तियों में कहीं भी दीर्घ स्वरों जैसे ” आ “, ” ई ” , ” ऊ ” आदि का प्रयोग नहीं किया गया है । फिर भी एक शब्द से दूसरा शब्द इतनी घनिष्ठता और सुन्दरता से जुड़ा है ; जैसे किसी नव वधू के श्रृंगार के सारे गहने – मांग टीका , कंठ हार , कमरबन्ध , वस्त्र आपस में साम्य रखते हैं । इसके गाने का छंद शिखरणी है , जो अपने आप में ही बहुत कर्ण प्रिय है । अब आप रावण और पतंजलि की रचनाओं के लालित्य व काव्य सौंदर्य का युद्ध अपने मन में कराएं। दोनों ही स्तोत्र पढ़ें ।

इनका अभ्यास करें। दोनों ही शिव पर आधारित हैं। दोनों ही स्तोत्र का अपने मन पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन करें। रावण ने शिव तांडव का गायन अहंकार के शमन के बाद किया था और पतंजलि ने नटराज स्तोत्र की रचना चेतना की उच्च अवस्था में की थी। दोनों ही रचनाओं का अपना विशेष महत्व है। जब आप दोनों का युद्ध मन में कराएंगे तो एक नई स्तुति, एक नई रचना की उत्पत्ति स्वत : ही होगी ; जैसे दो काले मेघों के समूह के टकराने पर पृथ्वी की वर्षा रूपी स्तुति अपने आप ही हो जाती है। आपके द्वारा दोनों स्तोत्र का वाचन आपके मनोवैज्ञानिक , भावनात्मक तल को भी ऊर्जा देगा और आपकी आध्यात्मिक उन्नति में भी यह सहायक होता है। काले मेघों के टकराने पर वर्षा रूपी स्तुति की कुछ पंक्तियां —

नाद हो शिव तांडव का ,
डमरू का या त्रिशूल घात का,
नटराज के नृत्य के थाप का ,
या अग्नि प्रज्ज्वलित रात का,
रावण हो या ऋषि पतंजलि,
पर्वत हो या तर्जनी अंगुली,
तू जाप कर – ” ॐ नम : शिवाय “
तू पढ़ – तांडव या नटराज स्तुति
तर जाएगा , तू तर जाएगा,
संभल जाएगा , तू सफलता पाएगा
भैरव की काली – चामुंडा – भवानी से,
महाकाल की पार्वती – सिद्धिदात्री रानी से,
कार्तिकेय भी आएंगे , गणेश भी बन जाएंगे
सृजन पैदा होगा, मौलिकता आएगी
जागृत होकर , शक्तियां तुझमें समा जाएंगी ;
नाद हो शिव तांडव का ,
डमरू का या त्रिशूल घात का ।
तेरा अनवरत जागरण होगा ,
शिव प्रकट के अहसास का ।।

।। जयतु जय जय सत्य सनातन आर्य वैदिक धर्म महाकाल शिव ।।

(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय के दर्शन विभाग के गोल्ड मेडलिस्ट छात्र हैं । कई राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में अपने शोध पत्रों का वाचन भी कर चुके हैं। विश्व विख्यात संस्था आर्ट ऑफ लिविंग के युवा आचार्य हैं। भारत सरकार द्वारा इन्हे योग शिक्षक के रूप में भी मान्यता मिली है। भारतीय दर्शन, संस्कृति, इतिहास, साहित्य, कविता तथा विभिन्न विषयों की पुस्तकों को पढ़ने में इनकी विशेष रुचि है।)

लेखक आदित्य जैन
सीनियर रिसर्च फेलो
यूजीसी प्रयागराज
7985924709

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