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जब तक आप प्रति-प्रहार नहीं करेंगे, उनके आक्रमण और विषैले होते चले जाएंगे

सन 2018 में ‘सेक्रेड गेम्स‘ का पहला एपिसोड ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज हुआ और ये निश्चित हो गया कि वेब सीरीज एक ऐसा हथियार बनने जा रही है, जिसके जरिये हिंदुत्व पर सुलभता से घृणित प्रहार किया जा सकेगा। न केवल हिंदुत्व बल्कि परंपराओं और नियमों से बंधे हिंदू समाज पर अश्लीलता से प्रहार करना भी बहुत आसान होगा। हिंदू समाज का ये दोष है कि वह जागरूक होने में बहुत देर करता है। ‘सेक्रेड गेम्स’ पुरे तीन साल बाद जब वेब सीरीज का बाजार इस तरह की सामग्री से पट गया और इन फिल्मों की अभिव्यक्ति और घृणित होने लगी तो भारत अब जागा है। निर्माता अनुष्का शर्मा की वेब सीरीज ‘पाताल लोक‘ को लेकर सोशल मीडिया पर तीव्र विरोध देखने को मिल रहा है। देखना ये है कि इस प्रचंड विरोध की आंच सरकारी गलियारों तक पहुँचती है या यही धधकती रहती है।

मज़े की बात ये है कि गोरखा समुदाय ने जातिवादी गाली देने के लिए फिल्म निर्माता अनुष्का शर्मा के विरुद्ध प्रकरण दर्ज करवाया है लेकिन देखा जाए तो फिल्म में इतनी आपत्तिजनक सामग्री है कि अब तक इसमें केंद्र सरकार के सूचना व प्रसारण मंत्रालय को दखल दे देना चाहिए था। एक पालतू कुतिया का नाम ‘सावित्री’ रखा गया है। एक ब्राम्हण किरदार बलात्कार करने से पहले कान पर जनेऊ चढ़ाता है। मंदिर के अंदर पुजारी मांस भक्षण कर रहा है। ऐसे आपत्तिजनक दृश्यों से फिल्म भरी पड़ी है। फिल्म का बड़े स्तर पर विरोध हो रहा है लेकिन सरकार इस पर कुछ भी ठोस करने में अक्षम दिखाई दे रही है। ऐसे भी प्रकाश जावड़ेकर के सूचना व प्रसारण मंत्रालय सँभालने के बाद स्थितियां और विकट होती चली गई है।  सेक्रेड गेम्स, लैला, घोल जैसी फिल्मों के आने तक ही सरकार को जाग जाना चाहिए था। माना कि सेंसर बोर्ड इस पर कोई कार्रवाई नहीं कर सकता लेकिन कुछ तो जरुरी कदम उठाए जाने चाहिए। 

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वेब सीरीज के ऐसे आपत्तिजनक कंटेंट को रोकने के लिए सरकार के पास फिलहाल कोई कानून नहीं है। इनके कंटेंट को सेंसर करने के लिए कोई संस्था, कोई विभाग सरकार के पास नहीं है। देशभर से इन वेब सीरीज के खिलाफ शिकायते दर्ज होती हैं लेकिन पुलिस को ये ही समझ नहीं आता कि ऐसी शिकायतों पर कौनसे कानून के तहत एफआईआर दर्ज की जाए।  विगत दो सालों से देश के विभिन्न शहरों से ऐसी फिल्मों के विरुद्ध शिकायतें की गई लेकिन कार्रवाई आगे ही नहीं बढ़ सकी।  कारण कानून ही नहीं है। उधर वेब सीरीज में अश्लीलता और हिन्दुओं पर प्रहार बढ़ते ही चले गए क्योंकि वे जानते हैं कि उनके खिलाफ कार्रवाई करने के लिए सरकार ने अब तक कोई कानून ही नहीं बनाया है। क्या सरकार तब जागेगी, जब दुनियाभर के सामने भारत की छवि पूरी तरह बदल दी जाए। सनद रहे कि ये वेब सीरीज विश्वभर में देखी जाती हैं।  

एक दो मामले जब अदालत पहुंचे तो कोर्ट ने बॉल सरकार के कोर्ट में डालते हुए कह दिया ‘ सरकार इस पर रोक लगाने के लिए कोई योजना बनाए।’ कुल मिलाकर एक सख्त कानून की कमी का फायदा अनुराग कश्यप और अनुष्का शर्मा जैसे फिल्म निर्माता उठा रहे हैं।  नेटफ्लिक्स, हॉटस्टार, वूट, जी5 और आल्ट बालाजी पर अत्यंत घातक अश्लील कंटेंट परोसा जा रहा है। वहां से ये कंटेंट पोर्न साइट्स पर अपलोड किया जा रहा है। भारत की छवि को बदलने के पुरे षड्यंत्र किये जा रहे हैं।  दरअसल इसका एक कारण इस प्लेटफॉर्म पर राष्ट्रवादी कंटेंट की कमी भी है। वेब सीरीज पर पौराणिक कहानियों पर कोई फिल्म  देखने को नहीं मिली है। एक पैटर्न बन गया है। हिन्दू आतंकवाद, सेक्स, अपराध, विवाहेतर सम्बन्ध बस यही सब दिखाया जा रहा है। इस षड्यंत्र का निशाना धर्म और उन युवाओं पर है, जो बड़ी संख्या में ये एप डाउनलोड कर इन फिल्मों को देख रहे हैं। यही फ़िल्में कुछ शुल्क पर शहरों और गांवों की वीडियो लाइब्रेरी में सहजता से उपलब्ध हो रही हैं। 

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संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ और सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट विरार गुप्ता का कथन काफी कुछ स्पष्ट कर देता है। वे कहते हैं ‘ नेटफ्लिक्स जैसी विदेशी कंपनियां भारत सरकार की बात को लगातार अनसुना करती रही हैं। वे खुद को अमेरिकी कानून के लिए ही बाध्य मानती हैं। उन पर हमारा किसी भी तरह के दबाव का फर्क नहीं पड़ता।’ सारे मामले की एक ही जड़ है, एक सख्त कानून का अभाव। हमारे बच्चे अपसंस्कृति के प्रभाव में बिगड़ रहे हैं। उनका तो यही उद्देश्य है कि हमारे धर्म और हमारी युवा पीढ़ी को दिग्भ्रमित कर भारत को निर्बल बना दे। वे जानते हैं कि ये काम हमारी श्रेष्ठ संस्कृति पर प्रहार कर किया जा सकता है। जब तक आप कानून बनाकर प्रति-प्रहार नहीं करेंगे, उनके आक्रमण और विषैले होते चले जाएंगे।

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Vipul Rege

Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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