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India Speak Daily > Blog > धर्म > सनातन हिंदू धर्म > सूर्य का उत्तरायण होना और खरमास का दख्खिन लगना
सनातन हिंदू धर्म

सूर्य का उत्तरायण होना और खरमास का दख्खिन लगना

ISD News Network
Last updated: 2025/01/15 at 5:08 PM
By ISD News Network 28 Views 24 Min Read
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हेमंत शर्मा। पृथ्वी का एक चक्र पूरा. सूर्य उत्तर हो गया. और खरमास (खराब दिन) दक्खिन. जिन लोगों को मृत्यु की प्रतीक्षा थी वे अब शरीर छोड़ सकते हैं. महाभारत काल में भीष्म ने यही किया था. आज से सूर्य उत्तरायण हो जाते हैं. शास्त्रों में उत्तरायण के समय को देवताओं का दिन और दक्षिणायन को देवताओं की रात कहा गया है. मकर संक्रांति एक तरह से देवताओं की सुबह होती है. देवता भी नई सुबह के इंतज़ार में रहते हैं. हर रात की सुबह होती है. दक्षिणायन यानी दक्खिन का सूर्य अच्छा नहीं माना जाता. इसीलिए नाराज़गी में काशी में एक शास्त्रोक्त लोकोक्ति है- ‘दक्खिन लग जाना’.

मकर संक्रांति प्रकृति का सम्मान है. यह खेतिहर समाज का उत्सव है. सूर्य की प्रखरता तो होती है. सूर्य ऊर्जा, प्रकाश और जीवन का स्रोत हैं. ऋग्वेद में सूर्य को आत्मा का पोषक और समस्त सृष्टि का आधार कहा गया है. ऐसा माना जाता है कि इस दिन सूर्य उपासना से रोग, शोक और दरिद्रता का नाश होता है. ख़ास नक्षत्र समूहों के साथ सूर्य जुड़ता और हटता है. एक से हट दूसरे से जुड़ने को ही संक्रांति कहते हैं. कहा जाता है कि इस वक्त सूर्य की किरणें पानी पर पड़ती हैं तो पानी में एक ख़ास जीवनी शक्ति आती है. इसी कारण संक्रांति में स्नान का विधान है. साल में बारह संक्रांति पर्व होते हैं. बारह राशियों के बारह पर्व. इनमें दो संक्रांति ख़ास है. मकर और मेष. लोक में एक को खिचड़ी और दूसरे को सतुआन कहते हैं.

मकर संक्रांति से सूर्य उत्तर में अवस्थित होता है. पृथ्वी सूर्य से छ: महीने तक दाएँ रहती है और सूर्य उत्तर में. यह शुभ माना जाता है. दक्षिण की दिशा यम की है. मृत्यु की. मकर संक्रांति से दिन बड़ा होना शुरू होता है. लोक में कहावत है बबुआ से दिन लहुरा,खिचड़ी से दिन जेठ. ऐसे वक्त में हम उत्सर्ग करते हैं अपनी प्रिय वस्तु का. हम अपनी पंसद की चीजे बॉंटते हैं. ख़ुशी या पदार्थ. यही दान है. हमारे भीतर का उत्सव भाव. यह भोजन भी हो सकता है वस्त्र भी. तभी तो संक्रांति दान का पर्व भी है.

कुरूक्षेत्र में भीष्म पितामह ने इसी रोज देह त्यागी थी. महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति को ही चुना. बाणों की शैय्या पर लेटे वे उत्तरायण की प्रतीक्षा कर रहे थे. मकर संक्रांति पर ही उन्होंने जीवन त्यागा. कहते हैं कि उत्तरायण में देह त्यागने वाली आत्माएं कुछ पल के लिए देवलोक चली जाती हैं और फिर उन्हें पुनर्जन्म के चक्र से छुटकारा मिलता है. मकर संक्रांति के दिन ही गंगा भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से सागर में जाकर मिली थीं. इसलिए मकर संक्रांति पर पश्चिम बंगाल के गंगासागर में मेला भी लगता है.

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किसान पूरे देश में इस त्यौहार का स्वागत करता है. त्योहार एक पर नाम अनेक. कहीं संक्रांति, कहीं पोंगल ,कहीं लोहड़ी ,कहीं बीहू, कश्मीर में शिशुर सेंक्रात, जम्मू के कुछ हिस्सों में माघी संक्रांति, हिमाचल प्रदेश में माघी साजी, उत्तराखंड में उत्तरायणी, घुघुतिया त्योहार,गुजरात में उत्तरायण पर्व, कर्नाटक में एलु बिरोधु, केरल में विलक्कू, मणिपुर में कंग्सुबि, झारखंड में टुसू पर्व, ओडिशा में मकरचौला, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में पौष संक्रांति, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भोगी पंडुगाई, मध्यभारत, छत्तीसगढ़, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, बिहार, दिल्ली में मकर संक्रांति या खिचड़ी कहा जाता है.

बचपन से मेरे लिये संक्रांति का मतलब स्नान, दान और पंतगबाजी ही थे. मेरे एक चचा थे जो दीपावली के बाद संक्रांति को ही स्नान करते थे. उसके बाद दान. हमारी परंपरा में हर व्यक्ति अपनी हैसियत के मुताबिक़ दान करता है. गीता में दान को कर्तव्य कहा गया है-

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे

देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्‌॥

जो दान कर्तव्य समझकर, बिना किसी उपकार की भावना से, उचित स्थान में, उचित समय पर और योग्य व्यक्ति को ही दिया जाता है, उसे सात्त्विक (सतोगुणी) दान कहा जाता है.

पर यह दान दबाव और अश्रद्धा से नहीं हो सकता. इसके लिये कहा गया है-

अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्‌

असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह॥

हे अर्जुन! बिना श्रद्धा के यज्ञ, दान और तप के रूप में जो कुछ भी सम्पन्न किया जाता है, वह सभी “असत्‌” कहा जाता है, इसलिए वह न तो इस जन्म में लाभदायक होता है और न ही अगले जन्म में लाभदायक होता है.

तुलसी बाबा इसके महत्व को बताते हैं-

तुलसी पंछिन के पिये, घटे न सरिता-नीर

दान दिये धन ना घटे, जो सहाय रघुवीर.

तुलसीदास जी कहते हैं— श्रद्धा और प्रसन्नता पूर्वक दान करने से हमारा धन घटता नहीं बल्कि शुक्ल पक्ष के चंद्रमा की तरह धीरे-धीरे बढ़ता रहता है.

पर मुझे आज तक यह नहीं समझ आया की मकर संक्रांति का पतंग बाजी से क्या सम्बन्ध हैं. मेरी जान मकर संक्रांति पर पतंग में लटकी रहती थी. मुझे पतंग उड़ाना नहीं आता था. मैं दूसरों की उड़ायी पतंग पर ही हाथ आज़माता था. पतंग की बात आते ही मुझे एक ऐसे व्यक्ति की याद आती है जो आज बहुत बड़े आध्यात्मिक व्यक्ति हैं. ये व्यक्ति हमारे लिए पतंग लूटते थे. जीवन में कुछ ऐसे लोग होते हैं जो आप के जीवन में गहरे धँसे होते है. कहानी दिलचस्प और रोमांचक है. देश में रामजन्मभूमि आन्दोलन चरम पर था. विश्व हिन्दू परिषद और साधु संतों ने प्रधानमंत्री नरसिंह राव को चारों तरफ़ से घेर लिया था. नरसिंह राव मंदिर को लेकर नरम थे. वे मंदिर बनवाना तो चाहते थे मगर विश्व हिन्दू परिषद को अलग थलग करके. इसके लिए नरसिंह राव ने चन्द्रास्वामी से मिलकर एक सरकारी न्यास बनवाने का फ़ैसला लिया. इस न्यास में ऐसे संत रखे जाने थे जो विश्व हिन्दू परिषद के मुख़ालफ़ी थे.

इस योजना में सरकार समर्थित नया ट्रस्ट बना. उसका नाम रामालय ट्रस्ट रखा गया. और उसके अध्यक्ष बने जगतगुरू रामानन्दाचार्य रामनरेशाचार्य. रामनरेशाचार्य रामानन्दी पीठ के सर्वोच्च गुरू थे. इनका मुख्यालय बनारस के पंचगंगा घाट का श्रीमठ था. चौदहवीं शताब्दी में इसी मठ में संत रामानन्द रहते थे. जब उन्होंने कबीर को शिष्य बनाने से मना कर दिया था तो कबीर इन्हीं घाट की सीढ़ियों पर लेट गए थे. रात के अँधेरे में, रामानन्द के पॉंव कबीर की छाती पर पड़ा और उनके मुँह से निकला राम राम. बस कबीर ने इसी को गुरू मंत्र मान लिया.

रामनरेशाचार्य उन्हीं रामानंद की पीठ पर आसीन है. रामनरे़शाचार्य के रामालय ट्रस्ट का अध्यक्ष बनते ही लगा कि सरकार मंदिर बनवा देगी. और आन्दोलन विहिप और संघ के हाथ से चला जाएगा. रामानन्दाचार्य की पीठ सगुण राम भक्ति शाखा की सर्वोच्च पीठ है. देशभर में सबसे ज़्यादा साधु इसी सम्प्रदाय के हैं. इनके साधु को बैरागी कहते है. रामानन्द ही रामभक्ति धारा को समाज के निचले हिस्से तक ले गए. यह उन्हीं की घोषणा थी कि “जात पात पूछे नही कोई, हरि का भजे से हरि का होई“. उन्हीं के १२ प्रमुख शिष्यों ने उनका सम्प्रदाय चलाया जिसमें सभी जाति वर्ग के लोग थे. इनमें योगानन्द (ब्राह्मण ) पीपा (क्षत्रिय) कबीर (जुलाहा), रैदास(चमार), सेना(नाई), और धन्ना(धोबी) थे. रामानन्दाचार्य ने सामाजिक तौर पर ये क्रांतिकारी व्यवस्था 14वीं शताब्दी में ही दे दी थी.

केन्द्र सरकार इस ट्रस्ट को ज़मीन सौंपने के लिए अध्यादेश की तैयारी करने लगी. यह नरसिंह राव का मास्टर स्ट्रोक था. लगा अब यह आन्दोलन संघ परिवार के हाथों से गया. मैं रामजन्मभूमि आन्दोलन कवर करने वाला अगली पंक्ति का रिपोर्टर था. इस दौरान रामनरेशाचार्य से कई दफ़ा फ़ोन से तो बात हुई पर मैं इससे पहले उनसे मिला नही था. जनसत्ता के लिए उनका एक इंटरव्यु लेना था. फ़ोन पर तय हुआ की बनारस के पंचगंगा घाट पर श्रीमठ में हम मिलेंगे.

मैं लखनऊ से बनारस पहुँचा. पंचगंगा घाट के मठ में वे थे नहीं. मुझसे कहा गया बैठ जाइए वे आने वाले हैं. तब तक शिष्यों ने मुझे बाबा जी की गद्दी, चारपाई, कमरे, खड़ाऊँ सब जगह सिर नवा दिया था. तभी एक शिष्य ने कहा महाराज जी आ रहै हैं. मैने देखा गंगा में दो स्टीमर आ रहे है. महाराज उस पर लाव लश्कर के साथ सवार हैं. मैं नीचे घाट पर आ गया. महाराज मोटरवोट से उतरे. किसी ने उनके कान मे धीरे से कहा दिल्ली से आए हैं शर्मा जी. स्वामी रामनरेशाचार्य ने मुझे कहा आइए. वे आगे बढ़े ही थे कि फिर मुड़े और मेरी आँख मे झॉंक कर देखा. मेरे भीतर बिजली सी कौंधी. उन्होने बड़े धीरे से कहा ‘छोटू जी’. मैं आश्चर्यचकित. मैंने कहा ‘छोटा बाबा’. वो मेरे गले लग गए. शिष्यगण अचरज में भरत मिलाप सा दृश्य देख रहे थे. ये हुआ क्या? मुझे बीस बरस बाद छोटा बाबा मिले थे. बचपन में हम साथी थे. वे मेरे लिए पतंग लूटते थे. सलीम जावेद की किसी फ़िल्म के दृश्य की तरह वे मेरा हाथ तेज़ी से पकड़े सीढ़ियाँ चढ़ रहे थे. लग रहा था कहीं मैं फिर से न बिछड़ जाऊँ.

ऊपर पहुँचते ही हम दोनों एक कमरे में. बाहर से किसी के आने पर पाबन्दी. हम दोनों एक दूसरे को अपनी अपनी जीवन यात्रा सुना रहे थे. छोटा बाबा ने बताया कैसे न्याय दर्शन में एमए करने के बाद वे इस सम्प्रदाय के गुरू के शिष्य बने. और मठ के गुरू ने उन्हें अपनी गद्दी सौंपी. उन्होंने कहा, एमए करते वक्त मैं आपकी माता से मिलने कभी कभी पियरी जाता था. एकदम से पूछा माता जी कैसी है? मैने कहा अब वो नही हैं. चार महीने पहले ही गयीं. वे रोने लगे. मैने किसी साधु को पहली बार रोते देखा. छोटाबाबा ने कहा घर चलूंगा. मैंने कहा पहले इण्टरव्यु हो जाए. उन्होंने कहा नहीं पहले घर चलेंगे.

रास्ते में छोटाबाबा और मेरे रिश्तों की फ़िल्म चलने लगी. मैं चौथी पाँचवीं में पढ़ता था. मेरे घर के सामने ही रामानन्द सम्प्रदाय का एक मठ था. वहां संस्कृत के कुछ विद्यार्थी रहते थे. उनकी छत बड़ी थी. उस पर आने वाली सारी पतंगें मेरी होती थी क्योंकि मठ के बड़े बाबा जी मुझे बहुत स्नेह करते. बाबाजी मुझे ढेर सारा प्रसाद, चूड़ा दही खिलाते, पतंग देते और हम उन्हें अपनी छत से उड़ाते. मुझे तो उड़ाने आता नहीं था. उड़ाते मेरे बड़े भाई थे. मैं तो केवल ‘भक्काटा’ कह माहौल बनाता था. अद्धा, बद्धा, कंठा, छड़ीला, चांदतारा, करियवा, पोछिल्ला, ये पंतग के सम्प्रदाय थे और माँझा, बध्दी, नख डोर की प्रजाती. हो-हल्ला कर माहौल बनाना मेरा काम था. मठ में सारे बड़े बाबाजी थे. केवल एक बालक था जो मुझसे दो चार साल बड़ा होगा. उसे मैं छोटाबाबा कहता था. छोटा बाबा ठीक सामने वाले कमरे में रहते थे. सिर घुटा हुआ. एक वस्त्र पहनते थे. एक ओढ़ते थे. देखने मे बड़ा रोचक सा ‘स्माल’ बाबा. मुझे उन्हे देखकर ही रोमांच पैदा होता था.

अकसर जब छोटाबाबा तल्लीनता से पढ़ रहे होते तो मेरी बात नहीं सुनते थे.फिर मै उसके कमरे में ढेला फेंकता. कई बार उन्हें लगा भी. उन्होंने माता जी से शिकायत की. मैंने कहा पतंग नहीं देते. अम्माँ डाँटती थी- “तुम सोचो अपना घर द्वार छोड़कर अकेले रह रहा है. बच्चा है. तुम उसको परेशान करते हो. छोटाबाबा मेरी मॉं का बड़ा प्रिय था. वह अकसर उन्हें भोजन कराती. दान पुण्य के सामान देती. और वस्त्रों का इन्तजाम भी करती. पूर्णिमा और अमावस्या के दिन तो छोटा बाबा के लिए विशेष भोजन बनता था. मुझे लगता है माता कभी कभी उन्हें कुछ पैसे भी देती थी. बस अम्मा का एक ही आग्रह होता बेटा पढ़ के घर लौट जाना. बाबा मत बनना. अभी बच्चे हो, अपना घर बसाना. इन बाबाओं के चक्कर में मत पड़ना. ये तुम्हें साधु बना देंगे. तुम सिर्फ़ इस मठ का पढ़ाई के लिए इस्तेमाल करो. यह सोचते सोचते हम घर आ गए थे.

बाबा जी घर में दाख़िल. पिता जी को देखते ही उन्होंने प्रणाम किया. मैंने उन्हें बताया- ये छोटाबाबा हैं. पापा भी आश्चर्य से उन्हें देख रहे थे. अम्मा के कमरे में पहुँचते ही वे फूट फूटकर रोने लगे. कहा, मैं तो अपनी मॉं का प्यार जानता नहीं था. यही मेरी माँ थी. छोटू जी आपको पता नहीं होगा, मुझे वो पैसे भी देती थीं. आज मैं जो भी हूँ उन्हीं की वजह से हूँ. नहीं तो मैं पढ़ नहीं पाता. वापस लौट जाता अपने गांव. मैंने कहा, महाराज छोड़िए. हर संत का अतीत होता है. इसलिए मैं यह क़िस्सा भी न सुनाता.

पर पिताश्री की किताबों के एक कार्यक्रम में उन्होंने यह क़िस्सा स्वयं सुनाया. पिताजी की तीन किताबों का लोकार्पण बनारस में था. राजनाथ सिंह, मुरली मनोहर जोशी केन्द्रीय मंत्री थे. मुलायम सिंह मुख्यमंत्री थे. ये सब मंच पर मौजूद थे. मंच पर कांग्रेस नेता देवेन्द्र द्विवेदी जी और विद्यानिवास मिश्र भी थे. रामनरेशाचार्य जी समारोह की अध्यक्षता कर रहे थे. उसी समारोह में उन्होंने ख़ुलासा किया. “आज हेमन्त जी राजनीति में बड़े बड़ों की पतंग उड़ाते हैं. बचपन में मैं इनकी पतंग लूटा करता था. यह बात किसी को पता नहीं है.” फिर उन्होंने पूरी कहानी सुनाई. लोग हतप्रभ थे. इस घटना के बाद छोटाबाबा पिताजी से नियमित मिलते. पिताजी की ख़ातिर उन्होंने सामने वाले मठ को फिर से तुड़वाकर बनवाया. मेरे छोटाबाबा आज परमआदरणीय जगतगुरू रामानन्दाचार्य रामनरेशाचार्य हैं. देश के सबसे ज़्यादा साधू वाले सम्प्रदाय जिसके तहत निर्मोही अखाड़े के सर्वोच्च गुरू.

बात संक्रांति की पतंगबाज़ी से शुरू होकर कहॉं पहुँच गयी. सवाल वहीं है आख़िर इस पतंगबाज़ी का इतिहास कहॉं से शुरू होता है. पतंगबाज आज हमारे देश में भले बड़े बड़े हों. पर पतंगबाजी की शुरुआत चीन में हुई, जहाँ इसे पहली बार झोउ राजवंश (1046–256 ईसा पूर्व) के दौरान बनाया गया. इतिहासकारों का मानना है कि मोज़ी (Mozi) और लू बान (Lu Ban) ने पहली पतंग बनाई. मोज़ी एक प्रसिद्ध दार्शनिक और इंजीनियर थे. उन्होंने लकड़ी की पतंग बनाई थी, जिसे “वूडेन बर्ड” कहा गया.

200 ईसापूर्व तक, पतंग कागज़ और रेशम से बनाई जाने लगी थी. पर पतंगों का इस्तेमाल पेंच लड़ाने के लिए नहीं, पतंगें युद्ध में सैन्य संकेत देने, दुश्मन को डराने, और दूरी नापने के लिए इस्तेमाल की जाती थीं. बाद में पतंगों का उपयोग मौसम का अध्ययन करने और समुद्री यात्राओं में वायु दिशा का पता लगाने के लिए किया गया. हान राजवंश (202 ईसा पूर्व – 220 ईसवी) के दौरान, पतंगों का उपयोग युद्ध में दुश्मनों के क्षेत्र में संदेश भेजने के लिए किया गया.

माओत्से तुंग के नेतृत्व में चीन में सांस्कृतिक क्रांति के दौरान, कई पारंपरिक खेलों और परंपराओं को नकारा गया, लेकिन पतंगबाज़ी को संरक्षित रखा गया. इसे “राष्ट्रीय एकता और परंपरा” को दर्शाने वाले खेल के रूप में प्रचारित किया गया. पतंगबाज़ी के लिए आज भी चीन का वीफांग शहर (Weifang) विश्व प्रसिद्ध है, जिसे “पतंगों की राजधानी” कहा जाता है. यहाँ हर साल अंतरराष्ट्रीय पतंग महोत्सव का आयोजन होता है.

पतंगबाज़ी चीन से कोरिया पहुँची. यहाँ पतंगों का उपयोग धार्मिक और ज्योतिषीय अनुष्ठानों में किया जाता था. युद्ध में दुश्मनों को भ्रमित करने के लिए जलती हुई पतंगों का इस्तेमाल किया गया. बाद में जापान में पतंगबाज़ी बौद्ध धर्म के साथ पहुँची. इसे धार्मिक त्योहारों और फसल कटाई समारोहों में इस्तेमाल किया जाता था. बस जापान में फसल कटाई से ही यह भारत में फसल कटाई के उत्सव में पहुँची. पतंगें बच्चों के जन्म और शुभ अवसरों पर शुभ प्रतीक के रूप में उड़ाई जाती थीं. यहाँ पतंगों को “ताको” कहा जाता है.

भारत में पतंगबाज़ी का आगमन मुगल काल में हुआ. इसे शाही खेल के रूप में देखा गया. बाद में यह जनमानस में लोकप्रिय हो गया. फिर मकर संक्रांति और स्वतंत्रता दिवस जैसे पर्वों से यह परंपरा विशेष रूप से जुड़ गई.

इंडोनेशिया और मलेशिया में पतंगों का उपयोग मत्स्य पालन में किया जाता था. हवा में पतंगों को उड़ाकर मछली पकड़ने का जाल फैलाया जाता था. पतंगबाज़ी सिल्क रूट और समुद्री यात्राओं के माध्यम से यूरोप पहुँची.13वीं सदी में मार्को पोलो के चीन यात्रा से लौटने के बाद यूरोप में पतंगों की जानकारी बढ़ी. बाद में वैज्ञानिक प्रयोगों में इसका उपयोग हुआ. जैसे, बेंजामिन फ्रैंकलिन ने 1752 में पतंग से बिजली के प्रभाव का अध्ययन किया.

18वीं और 19वीं सदी में पतंगों का उपयोग वायुमंडल की संरचना का अध्ययन करने के लिए किया गया. पतंगों को ऊंचाई तक उड़ाकर तापमान, वायु दबाव, और आर्द्रता का निरीक्षण किया गया. वैज्ञानिक अलेक्जेंडर विल्सन (Alexander Wilson) और थॉमस मेलविल (Thomas Melvill) ने 1749 में तापमान मापने के लिए पतंगों का उपयोग किया. उन्होंने एक थर्मामीटर को पतंग से जोड़कर इसे ऊंचाई तक उड़ाया और अलग-अलग ऊंचाई पर तापमान का अध्ययन किया. पतंगों का सबसे प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रयोग बेंजामिन फ्रैंकलिन ने 1752 में किया.

फ्रैंकलिन ने एक पतंग में धातु की छड़ी और रस्सी के सिरे पर एक चाबी बांधकर इसे आकाश में उड़ाया. उनकी खोज ने यह सिद्ध किया कि बादलों में बिजली होती है और बिजली की रॉड (Lightning Rod) का आविष्कार इसी अध्ययन पर आधारित था. इस प्रयोग से वायुमंडलीय बिजली के स्वभाव को समझने में मदद मिली और इसे विज्ञान की बड़ी उपलब्धि माना गया.

पतंग न होती तो शायद हवाई जहाज न होते. पतंगें, उड़ने वाले उपकरणों की प्रारंभिक प्रेरणा थीं. पतंगों के जरिए वायुदाब, एयरफ्लो (airflow), और लिफ्ट-ड्रैग के सिद्धांतों को समझा गया. यह ज्ञान आधुनिक विमानों और ड्रोन के विकास में महत्वपूर्ण रहा. सर जॉर्ज कैली जिन्हें “आधुनिक वायुयान का जनक” कहा जाता है, ने पतंगों से प्रेरित होकर उड़ने वाले यंत्रों के डिज़ाइन तैयार किए. उन्होंने पतंगों के जरिए एयरोडायनेमिक्स और पवन ऊर्जा के मूल सिद्धांतों को विकसित किया.

फिर भटक गया. चलिए अब लौटिए संक्रांति पर. मकर संक्रान्ति के साथ अनेक पौराणिक तथ्य जुड़े हुए हैं. इसी रोज भगवान आशुतोष ने भगवान विष्णु को आत्मज्ञान दिया था. देवताओं के दिनों की गणना इसी दिन से शुरू होती है. तिल का प्रयोग मकर संक्रांति की परम्परा का अंग है. आयुर्वेद के अनुसार यह शीत ऋतु के अनुकूल होता है. मानव स्वास्थ्य की दृष्टि से तिल का विशेष महत्व है, इसीलिए हमारे तमाम धार्मिक तथा मांगलिक कार्यों में, पूजा अर्चना, हवन, या विवाह में भी तिल की उपस्थिति अनिवार्य रखी गई है.

नई सब्जियां, शाक, नए चावल की साथ बनाई गई खिचड़ी जिसमें नियमतः उड़द की दाल इस्तेमाल होती रही, हालांकि अब तो प्रायः पंचमेली खिचड़ी ही देखने को मिलती है. उड़द की बाद शीत में वर्जित के बाद इसी समय से पुनः आहार में आती है. इनके साथ दही, छाछ, घी, गुड़, तिल, शीत के विरामकाल के बाद शरीर को उर्जा, गर्माहट और सूर्य परिवर्तन के अनुकूल पाचन के लिए ज़रूरी अवयव की तरह आते हैं.

उत्तरायण से हम एक खोल से बाहर निकलते हैं. ये खोल है सूर्य के कम समय और कम तेज होने की परिस्थिति का. इस खोल से निकलकर हम एक नए चक्र में आते हैं. ये चक्र समय का चक्र है. गंगा में नहाना, दान करना, शुद्ध और प्रतिरोधक क्षमता को बल देने वाला आहार ग्रहण करना, प्रकृति की उपासना करना और सूर्य को नमन के साथ उत्तरायण में प्रवेश करने का चक्र. यही मकर संक्रांति को विशिष्ट बनाता है. उत्तरायण कई शीत सीमाओं से निकलना भी है. शीत आलस्य का हो, संकोचों का, संबंधों का, सीखने का, सृजन का. शीत से निकलना चाहिए. पर्व पूर्वक निकलना चाहिए. आइए, शीत से निकलें. उत्तरायण करें. मंगलकामनाएँ।

जय जय

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ISD News Network January 15, 2025
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