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भारत की वैक्सीन से डरा पश्चिम, अब उतरा घटिया राजनीति पर!

Sonali Misra. भारत में जब से अपनी वैक्सीन बनी है एवं जब से भारत ने आत्मनिर्भरता की बात करनी आरम्भ की है, तब से विदेशी मीडिया एवं औपनिवेशिक मानसिकता वाले पत्रकारों को एक बेचैनी सी हो गयी है।  और वह हर दिन कोई न कोई ऐसा मुद्दा खोजकर ले आते हैं जिससे वह भारतीयों को नीचा दिखा सकें।

दरअसल एक ऐसी मानसिकता है जो यह मानकर ही चलती है कि वही इस दुनिया में सर्वश्रेष्ठ हैं। यही श्रेष्ठता बोध उनसे अनर्गल बातें करवा रही है। ब्रिटिश पत्रकार एडवर्ड लूस, जो फाइनेंसियल टाइम्स, अमेरिका में नेशनल एडिटर हैं और कॉलमिस्ट हैं, उन्होंने बेहद ही सनसनी खेज ट्वीट 24 अप्रेल को किया था। उन्होंने लिखा कि भारत को वाकई में ही वैश्विक मदद की जरूरत है।

मगर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, ने हाल ही में 30 लाख हिन्दुओं को एक धार्मिक आयोजन में सम्मिलित होने की अनुमति दी है और उन्होंने बहुत बड़ी बड़ी चुनावी रैली की हैं और भारत में स्वास्थ्य मंत्री है जो यह सोचते हैं कि गौ मूत्र ही कोविड का इलाज है। मोदी भारत के स्वास्थ्य को बर्बाद कर रहे हैं।

यह ट्वीट स्वयं में कितना भ्रामक और हिन्दू धर्म के प्रति घृणा से भरा हुआ है। परन्तु जब एडवर्ड लूस की प्रोफाइल पर जाते हैं तो यह स्पष्ट हो जाता है कि वह एक सच्चे बिडेन समर्थक और हिन्दू धर्म (मोदी सरकार) के विरोधी हैं और हर कीमत पर मोदी सरकार को असफल ठहराना ही एडवर्ड का काम है।  दक्षिणपंथ को नीचा दिखाने के पूरे प्रयास हैं और उनकी टाइमलाइन पर हर वह लेख रीट्वीट किया गया मिलेगा जिसमें मोदी सरकार को नीचा दिखाया गया है।

फाइनेंसियल टाइम्स में 26 अप्रेल 2021 को भी एक लेख प्रकाशित हुआ जिसे गिडोन रैशमेन ने लिखा है और शीर्षक है Narendra Modi and the perils of Covid hubris जिसमे पूरी तरह से भाजपा का उपहास उड़ाया गया है।

भाजपा द्वारा इस घोषणा से लेख का आरम्भ किया गया है कि सरकार ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बहुत ही कुशलता से इस बीमारी पर विजय पा ली है और फिर आगे कुछ और नेताओं का उल्लेख किया है जिन्होनें इस बीमारी पर विजय का दावा किया था, जिनमें नाम थे अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन और ब्राजील के राष्ट्रपति जेयर बोल्सोनरो!

यह लॉबी अमेरिका में सफलतापूर्वक सत्ता हस्तांतरण करवा चुकी है। और भारत में भी वह हिन्दुओं को कोसने में लगी हुई है। जबकि यह लॉबी जब देश के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्ष वर्धन पर यह मिथ्या आरोप लगाती है कि वह गौ मूत्र को कोविड का इलाज बताते हैं, तो वह किसी भी तरह का कोई भी प्रमाण नहीं देते हैं और यह भी ध्यान में नहीं रखते हैं कि डॉ. हर्षवर्धन ही वह व्यक्ति हैं।

जिन्होनें कुशलतापूर्वक पल्स पोलियो अभियान को संचालित किया था। और इसीके साथ पश्चिमी मीडिया यह भी ध्यान नहीं दे पाता है कि जिस जापानी इन्फ़लाइटिस से कांग्रेस और सपा जैसी सरकारें हार मान रही थीं, वह बुखार पूरी तरह से गायब हो गया है। और वह किसी और सरकार के कार्यकाल में नहीं बल्कि भगवा वस्त्र पहने हुए एक सन्यासी के नेतृत्व में।

स्वास्थ्य क्षेत्र में सरकार द्वारा किए गए कार्यों को कई सोशल मीडिया यूज़र्स एकत्र कर रहे हैं, और मजे की बात है कि इन उपलब्धियों पर किसी भी विदेशी मीडिया की दृष्टि नहीं जाती है। जब विदेशी मीडिया बार बार देश के स्वास्थ्य ढाँचे पर प्रहार करता है और उसके लिए मोदी सरकार को दोषी ठहराता है तो यही सोशल मीडिया याद दिलाता है कि यह मोदी सरकार है जो प्रधानमंत्री स्वास्थ्य योजना के अंतर्गत 16 एम्स बनवा चुकी है/बनवा रही है। 

फाइनेंसियल टाइम्स में एक और लेख में नरेंद्र मोदी सरकार के कटु आलोचक रहे कथित इतिहासकार रामचंद्र गुहा लिखते हैं कि लोकप्रियता की चाह रखने वाले नरेंद्र मोदी ने विशेषज्ञों की सलाह को अनदेखा किया और वह हारवर्ड से अधिक हार्डवर्क को महत्व देते हैं।

रामचंद्र गुहा की पीड़ा है कि जहां पिछले प्रधानमंत्री कोई सार्वजनिक नीति बनाते समय वैज्ञानिकों एवं अर्थशास्त्रियों की सहायता लेते थे तो वहीं मोदी अपने खुद की अक्ल पर विश्वास करते हैं। और इसीके साथ वह लिखते हैं कि अधिकारी अब अपने नेता और उसकी विचारधारा के प्रति वफादारी दिखाने के लिए ज्यादा ज्यादा राजनीति से भरे हुए जा रहे हैं। और उन्होंने आगे लिखा है कि इस महामारी के कारण लोकतांत्रिक परम्पराओं और मूल्यों का ह्रास हो रहा है।

उन्होंने इस लेख में प्रधानमंत्री को कोविड 19 की प्रथम लहर के दौरान लगाए गए लॉक डाउन की आलोचना है और साथ ही ऑस्ट्रेलिया और भारत के मैच के दौरान खुशी की आलोचना है जिसमें नरेंद्र मोदी जी ने कहा कि भारत ने इस बीमारी के खिलाफ कदम उठाए कि हम स्थिति को नियंत्रित करने की कगार पर है।

इतना ही राम चन्द्र गुहा भी घूम फिर कर पश्चिम बंगाल की चुनावी रैली में आ जाते हैं। वह यह नहीं बताते कि चुनाव तो तमिलनाडु में भी थे और केरल में भी, चुनाव असम में भी थे जहाँ की स्टार प्रचारक प्रियंका गांधी थीं, पर वहां की चुनावी भीड़ की राम चन्द्र गुहा बात नहीं करते।

पश्चिम का लेफ्ट मीडिया पूरी तरह से वही कार्ड खेल रहा है जैसा उसने ट्रंप के साथ खेला था और उसमे उनकी सहायता कर रहे हैं भारत के वह लेखक, इतिहासकार और पत्रकार जो कांग्रेस की चाटुकारिता करके आगे बढ़े थे और जिन्होनें कांग्रेस के शासनकाल में हर वह सुख उठाया था, जिस सुख पर उनका अधिकार था ही नहीं, इस कदम में उनका साथ दे रहे हैं।

भारत के कथित बुद्धिजीवियों से बेहतर भारत के वह प्रशंसक हैं जो भारतीय न होते हुए भी एडवर्ड लूस को यह कहने की हिम्मत कर पा रहे हैं कि वह जिस म्यूटेशन के आने की बात कर रहे हैं, वह म्यूटेशन यूके से आ रहा है, मगर फिर भी हिन्दू आलोचना के लिए यह सनसनी खेज खबर ठीक है।

Patrick Brauckmann इस ट्वीट को पूरी तरह से हिन्दू विरोधी बताते हुए लिखते हैं कि यह सनक से भरी भी औपनिवेशिक हिन्दू के प्रति घृणा से भरी हुई मानसिकता है, जिसके चलते यह ट्वीट किया है। भारत ने पूरे विश्व को वैक्सीन और दवाइयों के साथ मदद की है, और यह उपनिवेशवादी कहता है कि भारत को मदद की जरूरत है। भारत के लोग जो सदियों से आपदाओं का सामना करते हुए आए हैं, वह कोविड से भी उबर कर आएँगे।

इस ट्वीट पर एक यूजर ने आंकड़े देते हुए कहा कि पार्टी दस लाख पर भारत में कोविड से हुई मौतें अमेरिका में हुई मौतों से बहुत कम हैं।  इन पत्रकारों को जहां भारत विरोधी किसान आन्दोलन क्रान्ति का प्रतीक लगता है और वहां पर जुटने वाली भीड़ से उन्हें उम्मीद है कि वह मोदी को पराजित कर पाएंगे तो वह उस भीड़ के विषय में कुछ नहीं कहते हैं।

पर फाइनेंसियल टाइम्स के एसोसिएट एडिटर के इस ट्वीट और राम चन्द्र गुहा के लेख से यह बात एक बार फिर से प्रमाणित होती है कि भारत को वह अभी भी सांप और बंदरों का वही देश मानते हैं, जिसकी छवि आज से सत्तर वर्ष पहले थी। पर अब भारत बदल रहा है, वह वाकई हारवर्ड के बजाय हार्डवर्क पर विश्वास करता है और इस हार्डवर्क से ही भारत जीतकर आएगा।

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Sonali Misra

Sonali Misra

सोनाली मिश्रा स्वतंत्र अनुवादक एवं कहानीकार हैं। उनका एक कहानी संग्रह डेसडीमोना मरती नहीं काफी चर्चित रहा है। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति कलाम पर लिखी गयी पुस्तक द पीपल्स प्रेसिडेंट का हिंदी अनुवाद किया है। साथ ही साथ वे कविताओं के अनुवाद पर भी काम कर रही हैं। सोनाली मिश्रा विभिन्न वेबसाइट्स एवं समाचार पत्रों के लिए स्त्री विषयक समस्याओं पर भी विभिन्न लेख लिखती हैं। आपने आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में परास्नातक किया है और इस समय इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से कविता के अनुवाद पर शोध कर रही हैं। सोनाली की कहानियाँ दैनिक जागरण, जनसत्ता, कथादेश, परिकथा, निकट आदि पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।

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