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दानिश सिद्दीकी पर पंचमक्कारों का दोगला चेहरा क्या है!जनता का कहना

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चित्रांश सक्सेना। फोटोजर्नीलिस्ट दानिश सिद्दीकी के देहांत पर जहाँ उनहें कुछ लोग श्रद्धांजलि देते हुए नज़र आए वहीं कुछ लोगों ने उनकी हत्या के पीछे उग्रवादियों और पूर्व कर्मों को दोषी मना है। भारत के पंचमक्कारो और वामपंथी पत्रकारों के चलाए जा रहे एजेंडा को जनता ने साफ ढंग से देखा। पुलितज़र जैसे काले पुरस्कारों से नवाज़े दानिश सिद्दीकी की हत्या पर उन्हीं के खेमे से पत्रकारों ने वामपंथी रीतियों के साथ एक बार फिर मौत का व्यापार बना लिया है। जिस प्रकार वामपंथी मीडिया और ट्विटर बुद्धिजीवियों ने इस अवसर को भी तालिबान आतंकवाद को सफ़ेद दिखाने और सरकार पर प्रहार करते हुए प्रोपेगंडा फैलाने करने का माध्यम बना लिया।

हलाकि पंचमाक्कार गिरोह के इन सभी पत्रकारों ने अपने किसी भी बयान में तालिबान को हत्या का दोषी नहीं ठहराया। उन्हीं के खेमे से शांतिधूर्थ रवीश कुमार ने अपने लेख में ये लिखा कि “बन्दूक से निकली उस गोली को मैं हज़ार लानते भेज रहा हूँ”। इसी के साथ कुछ धूर्थ पत्रकारों ने कोरोना काल में जलती चिताओं का व्यापार करने वाले दानिश सिद्दीकी को शहीद का दर्जा भी दे दिया।

आज पत्रकार गिरोह से युवा छात्रों से खास बातचीत में इंडिया स्पीकस डेली ने इस विषय पर बात करी। उनका कहना था “मोहम्मद ज़ुबैर का राइट विंग पर दानिश सिद्दीकी से घृणा करने का आरोप लगाना केवल आधा सही है। राइट विंग इसलिए नफरत करता है क्योंकि उन्होंने चिताओं के साथ व्यापार किया।” एक ने आगे अजीत अंजुम के ट्वीट पर कहा “जो व्यक्ति खुद अपनी इच्छा से अफ़ग़ानिस्तान गया हो, उसे अपनी गलती के कारण मृत्यु प्राप्त हुई है। क्या नरेंद्र मोदी, अमित शाह के पास खाली समय है सबकी गलतियों पर औरबिटूरी लिखें?”

उत्तर प्रदेश में सरकार को फासिस्ट कहकर प्रदेश में चिताओं की जलती फोटो लेने के पश्चात जब दानिश अफ़ग़ानिस्तान पहुंचे तो वहाँ उन्होंने सरकार और असल देखा। जहाँ पत्रकारिता करना भी जनता को भारी पड़ता है। हितेन का कहना था “जिस सरकार ने माइनॉरिटी बजट में इजाफा कर अल्पसंख्याको को अत्यधिक सुविधा प्रदान करी है। सरकार पर फासिस्म का झूठा आरोप लगाना इनके एजेंडा में फिट होता है क्योकि सरकार हिन्दू एकत्रित करने और वोट बटोरने में सफल रही”।

इस दोगले बयान पर जनता का कहना था जब रोहित सरदाना की मौत पर आप उनका चरित्र उछालते नहीं चूंक रहे थे तो आज आप कुछ लोगो को ऐसे करने से कैसे बोल सकते हैं? समर्थ का कहना है कि “जब आपने लोगों की चिताएं शेयर करी हैं तब कोई दिक्कत नहीं लेकिन किसी और ने करी तोह आप सबको धर्म अधर्म का पाठ पढ़ा रहे हैं”। वे आगे कहते हैं कि “जब आप कुछ गलत करेंगे तो वही आपको वापस मिलता है। इन्होंने भी वही झेला, और अब आप सबको धर्म अधर्म का पाठ पढ़ा रहे हैं।”

वामपंथी पत्रकार और पंचमक्कारो ने दानिश को शहीद का दर्जा देते हुए उन्हें निडर बताया जिसने लिबरल प्रोपेगंडा को फैलाने में दिल्ली दंगों में हिन्दू दंगाई से लेकर उ.प्र. में जलती चिताओं की तस्वीरों तक कोई कसर नहीं छोड़ी। इस पूरी वार्ता से हमें पत्रकारिता की निष्पक्ष प्रस्तुतीकरण का मेहत्त्व ज्ञात होता हैं जिसे आज के युग में कुछ पत्रकारों द्वारा महत्वपूर्ण नहीं समझा जाता।

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