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गोरखनाथ जी कौन हैं ?

समय का प्रवाह भी बड़ा विचित्र है जिसमें बहकर कई हीरे, मोती, रत्न एवं चंदन के पवित्र और सुगंधित तरु अनन्त समुद्र में समा जाते हैं। योगीराज गुरु गोरखनाथ या गोरक्षनाथ जी भी ऐसी ही एक विभूति थे, अध्यात्म का ऐसा ही एक शीतल, सुगन्धित और पवित्र चंदन थे जिसका तिलकमात्र आध्यात्मिक चेतना का आविर्भाव कर देता था।

समय के साथ भारत इन्हें लगभग भूल सा चला है। इसमें बहुत कुछ योगदान मुगल व अंग्रेजी शासन का है और कदाचित योग साधना की कतिपय जटिलताओं का भी।

योगसाधना के क्षेत्र में सम्भवतः पतंजलि के बाद योगी मत्स्येंद्रनाथ के समर्थ शिष्य गोरखनाथ ही हैं जिन्होंने अष्टांग योग के विविध प्रयोग और उपयोग के द्वारा यौगिक पद्धति की अद्भुत एवं विलक्षण क्षमता से जनसाधारण का परिचय कराया।

 वेद कहते हैं –

शरीरमाद्यम् खलु धर्मसाधनम्

गोरखनाथ जी ने एक प्रकार से इसी थिअरी का प्रैक्टिकल करके दिखाया।

शरीर में कितनी शक्तियाँ छिपी हैं, कितने सुप्त केन्द्र अवस्थित हैं, कैसे इनको जागृत और सक्रिय किया जा सकता है। फिर कैसे इनका आध्यत्मिक के साथ ही सांसारिक उन्नयन और विकास के लिए प्रयोग किया जा सकता है — गुरु गोरखनाथ ही इसके प्रथम एवं सर्वसमर्थ अवतारी महाशिक्षक थे।

योग के विविध आयामों, प्रक्रियाओं एवं प्रयोगों की तो एक तरह से उन्होंने झड़ी ही लगा दी थी। उन्हें यौगिक विज्ञान का हम थॉमस एडिसन या अल्बर्ट आन्स्टाइन भी कह सकते हैं !निस्संदेह ऐसा कह सकते हैं !!

उनका प्रभाव सुदूर तिब्बत, नेपाल आदि से लेकर तमिलनाडु और श्रीलंका तक तथा पूर्व में भारत से बाहर के म्यांमार आदि देशों और पश्चिम में  अफगानिस्तान आदि देशों में भी रहा। नानक, मीरा, कबीर, दादू, जायसी, फरीद आदि पर उनकी स्पष्ट छाप है या एक प्रकार से ये महापुरुष गोरख के अलौकिक ज्ञानालोक के व्यख्याता से प्रतीत होते हैं।

योग की आठों सिद्धियाँ यथा- अणिमा, महिमा, लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशीत्व और वशीत्व पर उनका पूर्ण अधिकार था। हठयोग के तो वे प्रणेता ही माने जाते हैं। उन्होंने बुद्ध की भाँति धर्म को न केवल सर्वजन सुलभ कर दिया अपितु धार्मिक या पंथगत विवादों को भी अज्ञान का आडम्बर तथा धर्म के मूल को न समझ पाने की भूल कहा।

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि उन्होंने कुरान और हजरत मोहम्मद साहब पर भी अपनी बहुत ही स्पष्ट राय रखी है, जो इनके जैसा पहुँचा हुआ कोई सिद्ध पुरुष ही रख सकता है। इन्होंने कहा कि मोहम्मद साहब ने आध्यत्मिक छुरी की बात कही है लेकिन उनके उपदेशों का मिथ्या अर्थ निकालते हुए उनके अनुयायियों ने इस आध्यात्मिक छुरी को भौतिक छुरी समझ लिया !! जरा सोचिए कितनी गहरी और कितनी ऊँची बात गोरखनाथ जी ने कही है !

यही कारण है कि उन्होंने सारे भारत भर में विदेशी आक्रांताओं द्वारा अपने स्वार्थी सैन्य एवं राजनैतिक उद्देश्यों  के लिए धर्म की गलत व्याख्या कर इसे एक हथियार बनाने के षड्यंत्र को जनता की मदद से बहुत हद तक कुंद कर दिया था।

इनकी सिद्धि और प्रसिद्धि तो ऐसी थी कि तत्कालीन नेपाल नरेश ने जब इनके साथ घमंड में आकर दुर्व्यवहार किया तो इन्होंने उसे शाप दिया कि अभी से ठीक सातवीं पीढ़ी में तुम्हारा राज ध्वंस हो जाएगा और सच में ऐसा ही हुआ। जब वीरेंद्र वीर विक्रम शाह के बेटे ने ही पूरे राजपरिवार के प्राण ले लिए और स्वयं भी मृत्यु को प्राप्त हो गया !!

आज का गोरखपुर उन्हीं के नाम पर बसा नगर है !गोरखपीठ उन्हीं की पीठ है, योगी आदित्य नाथ इसी योग पीठ के महंत और सन्त हैं। इनके जीवन और क्रियाकलापों पर गोरखनाथ जी का ही दर्शन और तेज दिखता है।

यही कारण है कि हिन्दू और मुस्लिम, ब्राह्मण और हरिजन, नर और नारी, धनी और निर्धन सभी इस पीठ के प्रति अत्यंत श्रद्धा रखते हैं। शिष्य परम्परा से योगी आदित्यनाथ वस्तुतः गोरखनाथ जी के ही प्रतिनिधि हैं।

इनके माध्यम से गोरखनाथ जी ही न्याय एवं कल्याण का धर्मदंड धारण किये हुए हैं जिसमें करुणा भी है, सेवा भी है, कोमलता भी है तो कठोरता भी। आज चुनाव की वेला में यह उत्तरप्रदेश का सौभाग्य ही है कि उसे आज इस गोरखपीठ को इसके वर्तमान महंत के माध्यम से अपनी सेवा एवं पुष्पांजलि अर्पित करने का अवसर मिला है।

स्मरण रहे कि इंद्र के अत्याचार, घमंड तथा भीषण वृष्टि एवं वज्रपात से गोकुल को बचाने के लिए जब भगवान कृष्ण ने गोवर्द्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा उंगली पर उठा लिया था। तब जनता ने भी अपने हाथ लगा दिये और श्रीकृष्ण के बाल-गोपालों ने भी अपनी-अपनी लकुटिया पर्वत उठाने में लगा दी तथा जिससे जो बन पड़ा अपना सहयोग दिया।

अर्थ यह है कि जब कोई हमारी भलाई के यज्ञ में लगा हो तो हमें केवल दर्शक नहीं बने रहना चाहिए बल्कि इस जनकल्याण यज्ञ में अपनी आहुति और समिधा भी अवश्य देनी चाहिए। यही धर्म है !! गोरखनाथ जी जनता की रक्षा के लिए एकबार फिर गोवर्द्धन उठा रहे हैं, तो ऐसे में क्या हम भी आगे बढ़कर अपना हाथ उनकी सेवा में नहीं लगाएंगे ?

धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो ! प्राणियों में सद्भाव हो, विश्व का कल्याण हो !

अतः हे अर्जुन ! तुम किनके लिए मोह और शोक करते हो ? उनके लिए जो तुम्हारे परिवार या जाति के हैं ?

यदि तुम इनके लिए सोच रहे हो तब तुम सन्मार्गी कहाँ हो, तुम तो आगे बढ़कर इन कुमार्गियों को दंड देने का यश प्राप्त करो — क्योंकि मार तो इन्हें मैं पहले ही चुका हूँ !

मैं तो केवल और केवल धर्मस्थापना के लिए ही आया हूँ, सगे-सम्बन्धी या कुल-परिवार की स्थापना के लिए नहीं ! अतः तुम भी बिना किसी भ्रम, संशय या दुविधा में फँसे इन आतताइयों का विनाश करो, इस समय यही तुम्हारा एकमात्र कर्तव्य है और यही तुम्हारा एकमात्र धर्म भी !!

 साभारS. Om Prakash

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