पत्रकारिता के मूल सिद्धांत को दरकिनार करने वाले सुप्रीम अदालत को नैतिकता और कानून का पाठ पढ़ा रहे हैं!



Manish Thakur
Manish Thakur

 

 

भारत के मुख्य न्यायाधीश को नैतिकता का पाठ इनसे जरुर सिखना चाहिए! कानून क्या है! आईपीसी में अभियुक्त की परिभाषा क्या है! भारत की सुप्रीम अदालत और उसके मुख्य न्यायाधीश को उनसे यह भी सिखना चाहिए कि ‘हम भारत के लोग’ वाले संविधान में जनता को सर्वोच्च मानकर जनता द्वारा चुनी सरकार के मुखिया और  संवैधानिक रुप से तीसरे सबसे अहम पद पर बैठे व्यक्ति से न्याय के सर्वोच्च पद पर बैठे न्यायमूर्ति को कितनी देर और कहां बैठना चाहिए। उन्होने अपनी खबर से साबित कर दिया कि भारत के प्रधानमंत्री कई केस में आरोपी हैं। भारत के मुख्य न्यायाधीश को यह सब उनसे सिखना चाहिए जिन से नैतिकता की कोई आस नहीं। जिनने कभी पत्रकारिता के न तो मूल सिद्धांत को माना। न देश के कानून और अदालत को। वे आसमानी सूत्र से खबर तैयार कर रहे हैं कि भारत के प्रधानमंत्री एक अभियुक्त हैं! सुप्रीम कोर्ट के अभिय़ुक्त !

वे सवाल करते हैं..देश का मुख्य न्यायाधीश उनके साथ कैसे बैठ सकते हैं। वे वायर जैसे वेब मीडिया के माध्यम से सवाल उठा रहे हैं, 25 नवंबर को देश के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई BIMSTC देशों के न्यायाधीशों के लिए आयोजित भोज में एक अभियुक्त प्रधानमंत्री को कैसे बुला सकते हैं! आसमानी सूत्रों से दशकों तक सत्ता के लिए पत्रकारिता करने वाले गिरोह ने सत्ता के खिलाफ पत्रकारिता का अदम्य साहस दिखाते हुए सुप्रीम कोर्ट को सवालों के घेरे में लिया। भ्रम और फरेब की पत्रकारिता करने वालों ने फिर नया परसेप्सन गढ़ा है…..पत्रकारिता के आधारभूत मान्यता को खारिज कर कानून और नैतिक से नाता न रखने वाले खुद को पत्रकार कहते हैं और उन्हे पत्रकारिता का सम्मान भी चाहिए!

 

जब देश अपनी ही चुनी सरकार के खिलाफ भष्टाचार के आंदोलन में आजादी के बाद से लेकर सबसे उग्र था तब वे कालजयी पत्रकार जो इन खबरों से हट कर देश के लिए खाने के नाम पर “जायका’ चाटने को पत्रकारिता कह रहे थे! मजदूर कैसे दिल्ली में एक ही कमरे में गुजर बसर करते हैं उस पर ‘रविश की रिपोर्ट’ के नाम से फीचर स्टोरी कर रहे थे। सरकार के बचाव में सेना के विद्रोह करने की आशंका से फर्जी स्टोरी गढ़ रहे। 12 साल से बस गुजरात दंगा को इतिहास का एक मात्र दंगा व सोहराबुद्दी नामक गैंगेस्टर के इंकाउंटर को देश का एकमात्र एनकांउटर साबित कर रहे थे। उनके लिए कुछ भी नहीं बदला। तब सत्ता के खिलाफ जनता के आक्रोश को दिगभ्रमित करने के लिए कोर्ट और कानून को खारिज कर रहे थे। आज अपने उन्हीं आकाओं के लिए कोर्ट और कानून को खारिज करते हुए पत्रकारिता का राग अलाप रहे हैं। यह कहते हुए कि पत्रकारिता का मतलब है सत्ता के खिलाफ चलना है। वे जो आजाद भारत के सबसे भ्रष्ट सरकार के लिए सालों तक काम कर रहे थे। सुप्रीम कोर्ट तक के आदेश को खारिज कर रहे हैं। किसी के अभियुक्त होने के लिए नई आईपीसी तैयार कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और देश के प्रधानमंत्री के एक साथ किसी सरकारी कार्यक्रम में बैठने को अनैतिक करार देने के लिए आसमानी सूत्र गढ़ रहे हैं ! इन्हे उस कहावत पर भरोसा था कि झूठ सौ बार बोलने से सच हो जाता है। इसीलिए वे आज भी सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चले गुजरात दंगा मामला व गैंगेस्टर सोहराबुद्दी मामले में निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश तक खारिज करते हुए खुद फैसला सुना रहे हैं। भारत के सुप्रीम अदालत को अब नैतिकता और कानून का पाठ उनसे सिखना है जिनने पत्रकारिता के पूरे चरित्र को अनैतिक बना दिया …!

अपने अखबार के दफ्तर में और न्यूज रुम में काल्पनीक सूत्र तैयार कर खबर दर खबर गढ़ कर सालों तक फर्जी स्टोरी बनाने वाले वो सब कर रहे थे सिर्फ पत्रकारिता नहीं रहे थे। …इन्हें न जांच एजेंसी की रिपोर्ट माननी है। न लोअर कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को।

गैंगस्टर सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले में सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में बनी एसआईटी जांच के बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर ही  गुजरात के मामले की सुनवाई के लिए महाराष्ट्र में विशेष अदालत गठित किया गया।  विशेष अदालत ने लगभग लंबी सुनवाई के बाद इस मामले में भाजपा के वर्तमान अध्यक्ष अमित शाह समेत 14 आरोपियों को बरी कर दिया। इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। लेकिन मामले की लंबी सुनवाई करने वाले जज बृजभूषण लोया की मौत इस दौरान तब हो गई जब वे अपने एक साथी जज की बेटी की शादी में गए थे। हादसे के तीन साल बाद जज लोया के एक दूर के एक रिश्तेदार के बयान के आधार पर उनकी मौत को मीडिया के एक गिरोह ने हत्या साबित कर दिया। बिना किसी पक्ष को जाने। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दाखिल कर दिया गया। कुछ दिनो बाद इंडियन एक्सप्रेस अखबार ने लोया के पोस्टमार्टम रिपोर्ट,उनके पुत्र और पत्नी के बयान,लोया के साथ उस समय मौजूद साथी जजों। उनकी मौत के बाद की प्रक्रिया में शामिल हाइकोर्ट के तीनो जस्टिस और अस्पताल प्रशासन की रिपोर्ट के आधार पर खबर छापी की लोया की मौत हर्ट अटैक से ही हुई थी। मामला सुप्रीम कोर्ट में आया सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने जज लोया की एक दिसंबर, 2014 को नागपुर में आकस्मिक मृत्यु के कारणों की जांच विशेष जांच दल को सौंपने के लिए जनहित याचिकाएं ख़ारिज करते हुए याचिकाकर्ताओं की मंशा पर सवाल उठाए थे।

प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस धनंजय वाई. चंद्रचूड़ की पीठ को बॉम्बे लॉयर्स एसोसिएशन की पुनर्वियार याचिका में कोई काम की बात नज़र नहीं आई। पीठ ने अपने आदेश में कहा, ‘हमने सावधानीपूर्वक पुनर्विचार याचिका और संबंधित दस्तावेज़ों का अवलोकन किया परंतु हमें अपने फैसले में हस्तक्षेप की कोई वजह नज़र नहीं आई तद्नुसार पुनर्विचार याचिका ख़ारिज की जाती है।’ शीर्ष अदालत ने लोया की मृत्यु की जांच के लिए दायर सारी याचिकाओं को ख़ारिज करते हुये अपने फैसले में कहा था कि उनकी ‘स्वाभाविक मृत्यु’ हुई थी.

न्यायालय ने यह भी कहा था “ राजनीतिक विरोधियों द्वारा दायर याचिकाएं अपने अपने हिसाब बराबर करने के लिए थीं जो न्यायपालिका को विवादों में लाने और उसकी स्वतंत्रता पर सीधे ही न्याय की प्रक्रिया में व्यवधान डालने का गंभीर प्रयास था”। सुप्रीम कोर्ट ने तो इसे राजनीतिक विरोधियों की याचिका बताया लेकिन इस सच से कैसे इंकार किया जा सकता है कि इसके पीछे बस एक मीडिया गिरोह की भूमिका थी।

इसी तरह सोहराबुद्दीन शेख़, एक संदिग्ध गैंगस्टर और उसकी पत्नी कौसर बी. को कथित रूप से नवंबर, 2005 में अपहरण के बाद गुजरात और राजस्थान के पुलिस दल ने मार दिया था। इस मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो ने अदालत में 38 व्यक्तियों के ख़िलाफ़ कथित फ़र्ज़ी मुठभेड़ का आरोप पत्र दाख़िल किया था। निचली अदालत ने भाजपा प्रमुख अमित शाह सहित 14 व्यक्तियों को इस मामले में आरोप मुक्त कर दिया था। मीडिया के उस गिरोह ने आज तक इसे स्वीकार नहीं किया।

सुप्रीम कोर्ट तक से मामला खारिज होने के बाद फिर से एक नागपुर के एक वकील सतीश ऊके द्वारा बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ में एक याचिका दायर करते हुए लोया की मौत की जांच करवाने की मांग की गई। दूसरी तरफ जिस निचली अदालत ने सोहराबुद्दीन केस में अमित शाह समेत 14 आरोपियों को बरी कर दिया उसी अदालत में दुबारा से याचिका दाखिल कर आरोप मुक्त किए गए लोगो के खिलाफ शिकायक कर मामले को फिर से जिंदा करने की पत्रकारिता की गई। उस मामले को जिसे सुप्रीम कोर्ट तक ने खारिज कर दिया। उसी तरीके से गुजरात दंगा के समय बेस्ट बेकरी हत्याकांड में फैसला आने के बाद सुप्रीम कोर्ट में पुनर्वविचार याचिका दाखिल की गई। जिस मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट की ही निगरानी में ही गुजरात की अदालत में हुई। जिस मामले को 12 साल तक मीडिया ने रोज खबरों में रख जिंदा रखा। उसे तीन साल बाद नए कलेवर सुप्रीम कोर्ट में पेश किया गया। उसी सुप्रीम कोर्ट में रफायल डील मामले में एक याचिका दाखिल की गई। दिलचस्प यह है कि याचिकाकर्ता ने भारत सरकार द्वारा किए गए इस डील में नरेंद्र मोदी पर आरोप लगाया है। अभी अदालत को यह तय करना है कि यह मामला जांच के लायक है या नहीं लेकिन नैतिकता के पैरोकार जो किसी कानून को नहीं मानते याचिका में नामदर्ज देश के प्रधानमंत्री को आरोपी साबित कर सुप्रीम अदालत और उसके मुख्यन्यायाधीश को कटघरे में खड़ा करना चाहते हैं। क्योंकि कानून उनके मुताबिक नहीं चल रहा। पत्रकारिता के नाम पर राजनीति साधने वालों को पत्रकारिता का सम्मान चाहिए!

URL : who the don’t follow the basic rule of law of journalism want to teach supreme court of India

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