मीडिया मॉनिटरिंग के बारे में झूठ क्यों बोल रहे पुण्य प्रसून वाजपेयी?

फेक न्यूज के नाम पर एबीपी न्यूज चैनल से इस्तीफा देकर निकले या निकाले गए पुण्य प्रसून वाजपेयी की ‘झूठ की खेती’ अभी भी खत्म नहीं हुई है। इस बार उसने मोदी सरकार की मीडिया मोनिटरिंग को लेकर झूठ फैलाने के लिए एक पोस्ट लिखा है। उसके इस पोस्ट से लगता नहीं कि उसे इस विषय में गहरी जानकारी है, या यूं कहें कि बेसिक जानकारी भी है। आइये आपको बताते हैं कि वह कितना झूठ बोलता है? उसकी यह मनगढ़ंत कहानी ऐसी है कि अगर कहानी के पात्र बदल दिए जाएं तो किसी पर फिट बैठ जाएगी? झूठी कहानी की पहली पहचान यही होती है कि पात्र बदलो कहानी फिट! जबकी सच्ची कहानी में पात्र बदलते ही सारी चीजें गड्डमड्ड हो जाती हैं। तो आइये पुण्य की पापी कहानी के झूठ से परिचय कराते हैं।

उसका पहला झूठ- मोदी सरकार मीडिया मॉनिटरिंग सेंटर से 15-20 लोगों निकालने का मन बना चुकी है।

सच यह है कि मीडिया मॉनिटरिंग सेंटर में मॉनिटरिंग करने वालों को कांटेक्ट पर रखा जाता है, उनमें से किसी की भी नौकरी स्थायी नहीं होती है, इसलिए कांट्रैक्ट खत्म काम खत्म! ऐसे में निकालने की बात ही नहीं। दूसरी बात यह कि रखने और हटाने का काम अधिकारी करते हैं, मोदी या अमित शाह नहीं। जहां तक कांट्रैक्ट खत्म करने की बात है तो कांग्रेस सरकार के समय में अधिकारी के चहेते को छोड़ दें तो अधिकांश लोगों को कांट्रैक्ट तक पूरा नहीं करने दिया जाता था। ये बात सतबरी स्थित मीडिया मॉनिटरिंग सेंटर के बारे में है जिसके बारे में पुण्य प्रसून ने जानबूझ कर छिपाया है और कांग्रेस को बचाने के लिए अपनी अज्ञानता दिखाई है।

दूसरा झूठ – उसने कहा है कि न्यूज चैनलों पर नकेल कसने के लिए मोदी ने गुप्त फौज बनाई है

पुण्य प्रसून को पता हो या नहीं हो लेकिन जानना जरूरी है कि यह काम गुप्त रूप से ही होता है ढिंढोरा पीटकर नहीं। शायद इसलिए तो दिल्ली की सतबरी स्थित मीडिया मॉनिटरिंग सेंटर के बारे में उसने कुछ नहीं बताया। क्यों नहीं बताया इसका खुलासा आगे किया जाएगा? मीडिया मॉनिटरिंग सेंटर में महज टीवी की ही मानिटरिंग नहीं होती बल्कि देश-विदेश के रेडियो प्रसारण का भी दस्तावेज तैयार होता (था)है। ‘था’ इसलिए लिखा है क्योंकि यह बात करीब 15-16 साल पहले की है जब समाचार के लिए रेडियो एक मुख्य और प्रामाणिक श्रोत हुआ करता था। भारत की टीवी मीडिया की तरह नहीं जो
आज तक अपना प्रामाणिक या ठोस साख बना ही नहीं पाया।

तीसरा झूठ उसने यह कहा है कि मोदी सरकार ने मॉनिटरिंग करने वालों को चेताया है कि यहां की सूचना बाहर नहीं जानी चाहिए।

सच यह है कि वहां की सूचना बाहर जाती भी नहीं है क्योंकि यह काम गोपनीय स्तर पर ही किया जाता है। दरअसर उसने अपनी कहानी की बुनियाद ही झूठ पर रखी है, इसलिए इस पर कोई घर नहीं बनाया जा सकता है। चूंकि मीडिया मॉनिटरिंग की शुरुआत विदेशों में भारत को लेकर दिखाई जाने वाली खबरों और भारत के प्रति उस देश की धारणाओं को जानने के लिए हुई थी। जिस देश के साथ हमारे कूटनीतिक संबंध है उस देश के मसलों और मुद्दों को जानने समझने के लिए यह काम शुरू किया गया था। इसी के तहत देश की समस्याओं और घट रही घटनाओं पर नजर रखने के लिए मीडिया मॉनिटरिंग का काम शुरू किया गया था लेकिन वाजपेयी ने अपनी कहानी में सरकार के उद्देश्य को ही बदल दिया।

वैसे भी कहा जाता है कि झूठ के पैर नहीं होते लेकिन वह मोटा होता है, क्योंकि एक छूठ को छिपाने या उसे सच साबित करने के लिए सौ झूठ बोलने पड़ते हैं। इस हिसाब से देखें तो उसकी कहानी भले ही बेसिर पैर की हो लेकिन मोटी बहुत है। अब इतने सारे झूठ का जवाब देने के लिए उतना ही समय भी जाया करना पड़ेगा कि मोदी ने किस चैनल मालिक को धमकवाया या किस चैनल मालिक से खुद को ज्यादा दिखाने का आग्रह करवाया? ये तो पुण्य प्रसून वाजपेयी ही जाने। जो व्यक्ति खुद चौबीस घंटे मोदी के पीछ पड़कर इतना रिसर्च करने में लगा रहता है, वह बताता है कि मोदी ने ज्यादा से ज्यादा टीवी पर दिखने के लिए पूरा मीडिया मॉनिटरिंग सेंटर अपने पीछे लगा लिया है। भई प्रसून जो व्यक्ति तुम्हारे इतने गहरे उतर चुका हो उसे अतिरिक्त मेहनत करने की क्या जरूरत है! तुमने खुद अपने पोस्ट में लिखा है कि तुम्हारे मालिक ने तुमसे मोदी पर कम बोलने या उन्हें कम दिखाने को कहा था, तुमने इसी बात पर ‘इस्तीफा’ दे दिया। अब तुम्ही बताओ क्या सच है, तुम्हारा पूर्व चैनल मालिक का सच या फिर मोदी का मीडिया मानिटरिंग सेंटर पर लगा झूठ?

चौथा और सबसे बड़ा झूठ पुण्य प्रसून ने यह लिखा है कि मीडिया मॉनिटरिंग की व्यवस्था 2008 से शुरू हुई थी जिसे डॉ.मनमोहन सरकार ने शुरू की थी।

सच यह है कि मीडिया मॉनिटरिंग का काम 1999 से चल रहा है। इस दूरदर्शी व्यवस्था की शुरुआत अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने की थी। क्योंकि कांग्रेस में इतनी दूरदर्शिता थी ही नहीं कि यह सोच सके कि विदेश नीति निर्धारित करने में यह व्यवस्था कारगर साबित हो सकती है। यह व्यवस्था घरेलू समस्याओं के निदान करने में भी सहायक हो सकती है। लेकिन पुण्य प्रसून ने यह सच्चाई नहीं बताई क्योंकि उसकी कहानी का आधार ही झूठ है। शायद इसलिए भी नहीं बताई क्योंकि बाद में इसके साथ एक स्याह पक्ष जुड़ता चला गया था, जिसका खुलासा करना पुण्य प्रसून वाजपेयी जैसे कमजोर पत्रकार के बूते की बात ही नहीं है। वाजपेयी के कार्यकाल तक सबकुछ ठीक चलता रहा, लेकिन जैसे ही 2004 में कांग्रेस की सरकार आई उसमें गड़बड़ी शुरू हो गई।

कांग्रेस के सत्ता में आते ही मीडिया मॉनिटरिंग सेंटर को जेएनयू के मुसलिम छात्रों के लिए शरणस्थली बना दिया गया। जेएनयू और मुसलिम होने के नाम पर तरजीह दी जाने लगी। चूंकि कंट्रैक्ट पर काम होता था, और 24 घंटे मॉनिटरिंग होती थी, इसलिए रात की पाली जेएनयू छात्रों के लिए माकूल बैठती था। इसलिए उस मॉनिटरिंग सेंटर में जेएनयू विशेषकर मुसलिम छात्रों को भर दिया गया। इतना तो ठीक था लेकिन बाद में मुसलिम देशों और वहां प्रसारित होने वाली खबरों को लेकर रिपोर्ट में भी घपलेबाजी सामने आने लगी थी। यही वो सच है जो पुण्य प्रसून वाजपेयी सामने नहीं लाना चाहता था इसलिए जानबूझ कर उसने मीडिया मॉनिटरिंग की बात 2008 से शुरू की है।

जहां तक मनमोहन सिंह और अंबिका सोनी की जोड़ी की बात है, तो क्या देश नहीं जानता कि उस दौर में मनमोहन सिंह से ज्यादा महिमामंडन सोनिया गांधी का हो रहा था । पूरा चैनल सोनिया के बलिदान की खबर से पटा रहता था। पुण्य ने ये बताने का साहस क्यों नहीं किया कि उस दौर में कांग्रेस को डॉ मनमोहन सिंह की छवि सुधारने की नहीं बल्कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी की छवि सुधारने की जरूरत थी? जो संविधानेत्तर सत्ता पर काबिज थे। वाजपेयी ने यह क्यों नहीं बताया कि उस समय कांग्रेस में एक से सौ तक में सिर्फ सोनिया गांधी होती थी उसके बाद ही किसी और का नाम आता था। इस बीच में न तो मनमोहन सिंह और न ही अंबिका सोनी आती थी। उस सब का हिस्सा भी सोनिया गांधी के खाते में जाता था।

इस सबके बावजूद मीडिया मॉनिटरिंग का काम अनबरत चलता रहा। वहां देश विदेश के रेडियो पर प्रसारित होने वाली खबरों से लेकर देसी चैनलों तक की निगरानी होती रही, और काफी गुप्त तरीके से होती रही। देश की आंतरिक व्यवस्था पर कभी कोई प्रश्न नहीं उठाया। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी को बदनाम करने के बहाने आज पुण्य प्रसून और सागरिका घोष जैसे पत्रकार देश की आंतरिक सुरक्षा और नीति से खिलवाड़ करने पर उतर आए हैं। सागरिका घोष का नाम इसलिए लिया क्योंकि हाल ही में उन्होंने भी ट्वीट कर इस बात का जिक्र किया था।

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