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सलमान स्वीकार क्यों नहीं करते कि अब सिंहासन उनका नहीं रहा

विपुल रेगे। सलमान ख़ान को ये स्वीकार करने में कितना समय लगेगा कि उनका सिंहासन अब उनका नहीं रहा। जब आप शिखर पर पुराने होते जाते हैं, तो वहां फिसलन बढ़ने लगती है। आपके पैरों की ग्रिप पहले जैसे नहीं रह जाती। इसके बाद भी आप शिखर नहीं छोड़ते। सलमान के साथ कुछ ऐसा ही हो रहा है। राधे की बड़ी असफलता के बाद लगता है कि वे बौखला गए हैं। फिल्म समीक्षक केआरके पर उन्होंने मानहानि का मुकदमा ठोंक दिया है। सलमान को ऐसा लगता है कि उन्हें बूढ़ा अभिनेता कहने पर वे किसी के भी विरुद्ध एफआईआर करवा सकते हैं।

किसी भी सुपर सितारे के लिए बहुत मुश्किल होता है कि वह वास्तविकता स्वीकार करते हुए मुख्य भूमिकाओं वाली फिल्मों से स्वयं को दूर कर ले। यदि वह ऐसा करता है तो जनमानस में उसके प्रति एक सकारात्मक संदेश जाता है। ख्यात व्यक्तियों के लिए सम्मानजनक विदाई आवश्यक है, फिर भले ही वह एक खिलाड़ी हो या नेता। हालाँकि भारत में सिंहासन छोड़ने की परंपरा कभी नहीं रही।

यहाँ तो व्यक्ति को सिंहासन से खींचकर उतारा जाता है। सलमान ख़ान ने केआरके के विरुद्ध छवि खराब करने का मामला दर्ज करवाया है। सलमान के मुताबिक केआरके ने उनकी फिल्म का रिव्यू करके उनकी छवि को आघात पहुंचाया है।अब तो केआरके से ऐसा भी कहा जा रहा है कि भाई से माफ़ी मांग लेना ही अच्छा होगा।

सलाह देने वाले ने आशंका व्यक्त की है कि केआरके क्षमा नहीं मांगते तो कहीं उनकी दशा विवेक ओबेरॉय और अरिजीत सिंह जैसी न हो जाए। माना जाता है कि अमेरिका में स्टार सिस्टम चार्ली चैप्लिन, मैरी पिकफोर्ड और डगलस फेयरबैंक्स ने शुरु किया था। भारत में स्टार सिस्टम दिवंगत अभिनेता अशोक कुमार ने शुरु किया था। उनकी फिल्म किस्मत कलकत्ता के एक थियेटर में दो वर्ष तक चलती रही।

बॉलीवुड को समझ में आया कि एक सितारे की छवि पर भी फिल्म चलाई जा सकती है, फिर भले ही फिल्म स्तरीय न हो। अशोक कुमार से सिंहासन दिलीप कुमार-देव आनंद-राज कपूर ने साथ साझा किया। इसके बाद राजेश खन्ना इंडस्ट्री के नए सुपरस्टार बने। यहाँ से बॉलीवुड में मानसिकता बनी कि सुपर स्टार को फिल्म में ले लेना ही काफी है। इस मानसिकता ने सुपर सितारों के अहंकार में भी चौगुआ वृद्धि की।

अमिताभ बच्चन के आते-आते सुपर स्टार का सिंहासन ही सब कुछ हो गया था। अमिताभ का कद इतना ऊंचा हो गया था कि उसकी परछाई सह कलाकारों को निगलने लगी थी। यहाँ से सुपर स्टार का एक और गुण सामने आया। अब वह सह कलाकारों का रोल कटवाने और बढ़वाने का काम भी करने लगा। सुपर स्टार का सिंहासन जब शाहरुख़ खान से होता हुआ सलमान खान के पास पहुंचा तो तस्वीर ही बदल गई। पूरी फिल्म इंडस्ट्री का केंद्र एक ही व्यक्ति बन चुका था।

अब वह न केवल साथी कलाकारों का रोल कटवाने लगा, बल्कि पाकिस्तानी कलाकारों को काम दिलवाकर भारतीय कलाकारों का कॅरियर बर्बाद करने लगा। कितना अंतर है हॉलीवुड और बॉलीवुड के स्टार सिस्टम में। वहां स्टार होते हुए भी कलाकार टीम वर्क में विश्वास करता है। अभिनय के पितामह अल पसिनो को ही ले लीजिये। वे अपने किरदार की तैयारी के लिए ही एक वर्ष का समय ले लेते हैं।

सलमान खान जैसे लोगों को पता करना चाहिए कि अल पसिनो इतने बड़े वैश्विक सितारे क्यों बने हुए हैं। निश्चय ही साथी कलाकारों को दुःख देकर तो नहीं बने होंगे। यदि केआरके सलमान ख़ान को ये बता रहे हैं कि उनकी उम्र अब ठुमके लगाने की नहीं रही, तो क्या इसे डिफेमिनेशन का केस मान लेना चाहिए। अशोक कुमार से चला सिंहासन सलमान खान तक पहुँचते-पहुँचते पूर्णतः बदल गया। इस सिंहासन का अर्थ था, लोग आपसे बहुत प्रेम करते हैं और अब इसका अर्थ हो गया है, मुझे इंडस्ट्री पर शासन करना है।

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Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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