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शासक की तर्जनी पर घूमता अदृश्य सुदर्शन चक्र क्यों नहीं चलता ?

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विपुल रेगे। राज कुंद्रा का पोर्न मूवी प्रकरण सामने आने के बाद मीडिया में ऐसे समाचार आ रहे हैं कि कुंद्रा के नेटवर्क को ध्वस्त करने का श्रेय महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को जाता है। कुंद्रा की बदमाशियां सामने लाने के कार्यक्रम को उद्धव सरकार ने ‘ऑपरेशन क्लीन’ का नाम दिया है। तीन वर्ष पुरानी महाअघाड़ी सरकार को अब जाकर चिंता सताने लगी है कि पालघर के जघन्य हत्याकांड से लेकर सुशांत की संदिग्ध हत्या और वहां से आगे एंटीलिया वसूली प्रकरण में उनकी छवि जनता के बीच बहुत खराब हो चुकी है।

वैसे तो भारत के नागरिक की स्मरण शक्ति संसार में सबसे अधिक क्षीण मानी जाती है। चार साल के अत्याचार पर एक माह की लोक-लुभावन योजनाएं भारी पड़ जाती है। महाराष्ट्र की सरकार के पिछले दो साल ऐसे निकले हैं, जैसे हम बॉलीवुड की कोई ऐसी फिल्म देख रहे हैं, जिसमे एक आततायी मुख्यमंत्री अपने नागरिकों पर कहर ढाता है। अपने विरुद्ध बोलने वालों के कार्यालय पर बुलडोजर चलवाता है।

अपितु ठाकरे प्रोडक्शन की इस फिल्म में नायक नहीं है। जो नायक बनने चले, उन्हें सबक सिखाया गया। केंद्र से खुलकर लोहा लिया और भारी भी पड़े। इस अहंकारी सरकार ने केंद्र सरकार के हर मामले में अड़ंगे डाले हैं, जैसे बंगाल की सरकार कर रही है। इस बात की बहुत चर्चा चली कि केंद्र में बैठी शक्तिशाली सरकार बंगाल और महाराष्ट्र के आगे नरम रुख क्यों अपना लेती है।

महाराष्ट्र में ड्रग्स इन बॉलीवुड और सुशांत सिंह राजपूत की संदिग्ध हत्या के मामले में केंद्र इस आततायी सरकार का कुछ नहीं बिगाड़ सका। पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों ने राष्ट्रपति शासन लगाकर कितनी बार लोकतंत्र का गला घोंटा, इसका कोई हिसाब ही नहीं है। आज की केंद्र सरकार अपने दामन पर ऐसा कोई दाग लगाना नहीं चाहती कि उसे भी लोकतंत्र का हत्यारा घोषित कर दिया जाए।

केंद्र और महाराष्ट्र सरकार के बीच युद्ध पटल पर नहीं दिखाई देता किन्तु वह सतह के नीचे लगातार चल रहा है। देश को आश्चर्य है कि मुकेश अंबानी के घर के सामने विस्फोटक रखने और उनसे फिरौती मांगने वाले आज तक सामने नहीं आए हैं। आखिर इस सरकार को किस सीमा तक जाकर छूट दी जाने वाली है? महाराष्ट्र में घेरा डालकर बैठी केंद्रीय एजेंसियों की समीक्षा एक बार हमारे गृह मंत्री को करनी चाहिए।

यदि वे समीक्षा करेंगे तो उन्हें पता चलेगा कि ड्रग्स इन बॉलीवुड, सुशांत की हत्या, पालघर में साधुओं की निर्मम हत्या, एंटीलिया प्रकरण में ये केंद्रीय एजेंसियां अब तक एक बाल नहीं उखाड़ सकी है। केंद्र सरकार ने अब तक वे काम कर दिखाए हैं, जो किसी पूर्व की सरकार ने नहीं किये। इस सरकार से देश को बड़ी अपेक्षाएं हैं।

किन्तु जहाँ कानून-व्यवस्था और सख्ती की बात आती है, ये सरकार अन्य राज्य सरकारों के सम्मुख झुकती दिखाई देती है। महाराष्ट्र के मामले में लगातार हम यही देखते चले आ रहे हैं। उद्धव ठाकरे और उनकी सेना को देश के लोग आज एक आततायी राजा के रुप में जानते हैं। एक ऐसा राजा, जिसे अपना सिंहासन बचाए रखना है। लोकसेवा उसका उद्देश्य कभी रहा ही नहीं। भारत हमेशा से अवतारवाद में विश्वास करता चला आया है।

केंद्र के मुखिया को इस देश की अधिकांश जनता एक अवतार के रुप में देखती आई है। फिर जब एक ऐसा अवतारी छवि का शासक देश के भाग्य को तय कर रहा है तो उसकी तर्जनी पर घूमता अदृश्य सुदर्शन चक्र क्यों नहीं चलता ?

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Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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