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अफगानिस्तान में देखने से पता चलेगा कि क्यों करती थी जौहर हिन्दू स्त्रियाँ?

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आज रात अफगानिस्तान से अमेरिकी सेनाएं चली गईं और अब अफगानिस्तान में केवल वह शासन शेष है, जिसमें औरतों का वह शोषण है, जिसकी यादें भारत में अभी तक ताजा है और जिन यातनाओं का बुद्धिजीवी मजाक उड़ाते हैं। मगर जिस प्रकार से वीडियो सामने आ रहे हैं, वह मध्ययुगीन बर्बरता को स्पष्ट करते हैं और बताते हैं कि आखिर क्यों हिन्दू स्त्रियाँ जौहर कर लेती थीं, मगर अपना शरीर तक उन आतताइयों के हाथों में नहीं पड़ने देती थीं।

एक वीडियो में एक अफगानी औरत कह रही हैं कि तालिबानी औरतों के शवों के साथ भी बलात्कार करते हैं। ऐसा नहीं है कि वह औरतों के शवों को छोड़ देते हों।

यही नहीं अफगानी पॉप स्टार आर्याना ने एक इंटरव्यू में कहा कि तालिबानों द्वारा उन्हें पकडे जाने से पहले ही उन्हें गोली मार दी जाए।

आखिर यह क्या डर है जो इन प्रगतिशील मुस्लिमों को मुस्लिम तालिबानों से लग रहा है? शरीर से जुड़ा हुआ यह कौन सा डर है, जो वह खुद को मारने के लिए तैयार हैं, पर उनके हाथ में आने के लिए नहीं।

इससे कुछ पहले चलते हैं, आईएसआईएस द्वारा यजीदियों पर हमला करना और उनकी लड़कियों को सेक्स स्लेव बनाना। कई लडकियाँ ऐसी थीं जिन्होनें अपना चेहरा जला लिया था। एक लड़की जो रिफ्यूजी शिविर में आ गयी थी, उसके मन में इतना डर था कि उसने आहट होने पर ही खुद का चेहरा जला लिया था। इतना ही नहीं मोसुल में तो सेक्स सम्बन्ध न बनाने पर 19 यजीदी लड़कियों को पिंजरे में कैद करके जला दिया था।

मगर दुःख की बात यह है कि उनकी जलती खाल की गंध भी भुला दी गयी जैसे भुला दी गयी है हिन्दू स्त्रियों की वह चीखें जो स्वेच्छा से ही लगाई हुई आग की जलन से निकली थीं। पर उन्होंने ऐसा क्यों किया होगा? क्या कारण है कि पहले हिन्दू स्त्रियाँ ही मात्र स्वयं को इनके चंगुल से बचाने के लिए स्वयं को आग के हवाले कर लेती थीं, पर आज तो यजीदी और स्वयं मुस्लिम लडकियां ही अपने शरीर के तालिबानियों के हाथ में पड़ने से डर रही हैं।

पाठकों को याद होगा कि कुछ वर्ष पहले मिस्र में एक क़ानून की बात हो रही थी जिसमे स्पष्ट था कि मुस्लिम अपनी बीवी के शव के साथ भी सेक्स कर सकते हैं। मरने के बाद छ घंटे तक बीवी के शव के साथ सेक्स किया जा सकता है। हालांकि इस प्रस्ताव का विरोध हुआ था।

दरअसल यह मानसिकता है औरतों को खेती समझने की। इस्लाम में यह स्पष्ट है कि औरतें आदमियों की खेती हैं। और साथ ही जीती गयी औरतें उनकी संपत्ति हैं। ऐसा आज तक समझा जाता है, मिस्र की अल-अजहर यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर सुआद सालेह ने गैर मुस्लिम महिलाओं को लेकर हाल ही में यह बयान दिया था कि चूंकि युद्ध में जीती हुई औरतें आर्मी कमांडर की संपत्ति होती हैं। उन्हें परेशान करने के लिये आप उनके साथ उसी तरह सेक्स कर सकते हैं जैसे पत्नी के साथ करते हैं।

यह तो हुई आज की बात, अब इतिहास में जाते हैं, तो कई उदाहरण मिलते हैं, जहां पर इन हमलावरों की हवस के कारण हिन्दू स्त्रियों ने स्वयं को आग के हवाले करना उचित समझा। क्योंकि इतिहास में उदहारण भरे पड़े हैं कि इन लोगों ने आकर हिन्दू स्त्रियों के साथ क्या किया? जो हमारी इतिहास की पुस्तकों से जानबूझकर छिपाया गया, उसे पहले आईएसआईएस ने प्रैक्टिकल करके दिखाया, पर चूंकि वह काफी दूर थे, तो लोगों ने उस पर ध्यान नहीं दिया, और अब अफगानिस्तान में दिखाया जा रहा है।

आइये अब इतिहास में झांकते हैं,

वैसे तो सबसे प्रख्यात जौहर चित्तौड़ की रानी पद्मावती का माना जाता है, परन्तु रानी पद्मावती का उल्लेख इतिहास में कम और जायसी की “पद्मावत” में प्राप्त होता है। अत: इसकी ऐतिहासिक प्रमाणिकता पर कुछ लोग संदेह व्यक्त करते हैं। परन्तु चित्तौड़ में स्थान है, जहाँ पर यह कहा जाता है कि उन्होंने 16,000 रानियों के साथ जौहर किया था।

मगर जो दूसरा जौहर है वह विश्वासघात की कहानी भी कहता है और हिन्दुओं के साथ हुए एक ऐसे छल की कहानी, जिसमें आक्रान्ता ही मसीहा बन गया। यह कहानी है भारत में हिन्दुओं को मारकर “गाजी” की उपाधि धारण करने वाले बाबर के बेटे अय्याश हुमायूं की। हाल ही में रक्षाबंधन गया है, हिन्दुओं के इस पर्व को इसी हुमायूं के साथ जोड़कर प्रचारित कर दिया गया।

जबकि सत्यता यह है कि हुमायूँ जानबूझकर इस्लामी भाई चारा निभाते हुए बहादुर शाह द्वारा चित्तौड़ के दुर्ग पर किए गए आक्रमण में नहीं गया था।

एस के बनर्जी, अपनी पुस्तक हुमायूँ बादशाह में हुमायूँ और बहादुरशाह के बीच हुए पत्राचार के विषय में लिखते हैं:

कि बहादुरशाह ने हुमायूँ को लिखा कि

चूंकि हम लोग इंसाफ और ईमान लाने वाले हैं, तो जैसा पैगम्बर ने कहा है कि “अपने भाइयों की मदद करो, फिर वह जुल्म करने वाले हों या फिर पीड़ित।” (पृष्ठ 108)

और उसके बाद उसने लिखा कि “खुदा के करम से जब तक मैं इस वतन का मालिक हूँ, कोई भी राजा मुझे और मेरी सेना को चुनौती नहीं दे सकता है।”

यह सलाह दी जाती है कि आप इस पर काम करें “शैतान आपको राह न भटकाए”

यहाँ तक कि जब बहादुरशाह को बाद में भी डर हुआ कि कहीं हुमायूँ न आ जाए, तो उसके वजीर ने उसे आश्वस्त किया कि एक काफिर के साथ कभी भी कोई मुसलमान नहीं आएगा।

और उसका कहना सही था, हुमायूँ नहीं पहुंचा, और रानी कर्णावती ने इस डर से कि उनके अपवित्र हाथ कहीं उनकी देह को अपवित्र न कर दें और कहीं उन्हें भी यौन गुलाम न बना लिया जाए, उन्होंने दुर्ग की सभी स्त्रियों के साथ जौहर कर लिया।

हुमायूँ उसके बाद आया था, और जिसे यह कहते हुए वामपंथी इतिहासकारों ने प्रचारित किया कि जब तक वह आया तब तक सब कुछ खत्म हो चुका था।कर्णावती को यह नहीं पता था कि कुरआन में एक काफिर की मदद तब तक नहीं की जाती, जब तक वह ईमान में नहीं आ जाता।

उसके बाद वामपंथी और राष्ट्रवादी दोनों ही तरह के साहित्यकारों के प्रिय शेरशाहसूरी की बात आती है। तो उसने भी गद्दी पर बैठते ही हिन्दुओं पर आक्रमण किया था और उन्हें मारा था। उसने रायसेन पर आक्रमण किया था और जब उसने देखा कि वह राजपूतों से वीरता से नहीं जीत सकता तो उसने छल और विश्वास घात का सहारा लिया था। राजा पूरनमल ने जब यह देखा कि विश्वासघात के कारण वह घिर गए हैं तो उन्होंने अपनी प्रिय रानी रत्नावली की गला काटकर हत्या कर दी जिससे शेरशाह सूरी की सेना के हाथों जिंदा न लग सके। और फिर राजपूत योद्धाओं ने यही किया।

उन्होंने अपने परिवार वालों की हत्या कर दी, क्योंकि उन्हें पता था कि यदि गलती से भी कोई हिन्दू लड़की उनके हाथों में पड़ गयी तो क्या करेंगे वह! THE HISTORY OF INDIA, BY ITS OWN HISTORIANs – THE MUHAMMADAN PERIOD में सर एम एम इलियट TARTKH-I SHER SHAHI के हवाले से लिखते हैं कि जब हिन्दू अपनी स्त्रियों और परिवारों को मार रहे थे तो अफगानों ने हर ओर से हिन्दुओं का कत्लेआम शुरू कर दिया। पूरनमल और उनके साथी बहुत वीरता से लड़े परन्तु वह पराजित हुए और पूरनमल की एक बेटी और उनके बड़े भाई के तीन बेटे अफगानी सेना के हाथों जिंदा लग गए तो बेटी को तवायफ बना दिया और बेटों को हिजड़ा बना दिया, जिससे राजपूतों का वंश समाप्त हो जाए।

चित्तौड़ का तीसरा जौहर अकबर के शासनकाल में हुआ। उसी अकबर के शासनकाल में जिसे इतिहासकारों ने अकबर महान कहा है। वह अकबर इतना महान था कि उसने हेमू को मारकर मात्र चौदह वर्ष में की उम्र में गाजी की उपाधि धारण की थी। विसेंट ए स्मिथ वह द डेथ ऑफ हेमू इन 1556, आफ्टर द बैटल ऑफ पानीपत (The Death of Hemu in 1556, after the Battle of Panipat) में अहमद यादगार को उद्घृत करते हुए लिखते हैं कि “किस्मत से हेमू के माथे में एक तीर आकर लग गया। उसने अपने महावत से कहा कि वह हाथी को युद्ध के मैदान से बाहर ले जाए। मगर वह लोग भाग न पाए और बैरम खान के हाथों में पड़ गए। इस प्रकार बेहोश हेमू को बालक अकबर के पास लाया गया, और फिर उससे बैरम खान ने कहा कि अपने दुश्मन को अपनी तलवार से मारे और गाजी की उपाधि धारण करे। राजकुमार ने ऐसा ही किया, और हेमू के गंदे शरीर से उसका धड़ अलग कर दिया।”

डे लेट (De Laet) की पुस्तक में भी यही विवरण प्राप्त होता है। डच में लिखी गयी पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद स्मिथ ने दिया है जो इस प्रकार है “ हेमू के सैनिक अपने राजा को हाथी पर न देखकर भागने लगे और मुगलों ने अधिकार कर लिया। और बैरम खान ने हेमू को पकड़ कर अकबर के सामने प्रस्तुत किया। अकबर ने अली कुली खान के अनुरोध पर अचेत और आत्मसमर्पण किए हुए कैदी का सिर तलवार से काट दिया और फिर उसके सिर को दिल्ली के द्वार पर लटकाने का आदेश दिया।”

इसके बाद अकबर महान ने पानीपत में मारे गए सैनिकों के सिरों की मीनारें बनवाईं। जो लोग पुरुषों के शवों के साथ यह कार्य करते थे, वह स्त्रियों के शव छोड़ देते क्या? भारत के वीर नागरिक संघर्ष करते रहे।

जब तक वह संघर्ष कर सकते थे, तब तक संघर्ष करते थे और फिर उसके बाद स्त्रियाँ या तो युद्ध करने के लिए मैदान में आ जाती थीं, या फिर वह अपने शवों के साथ यह सब न हो इसके कारण जौहर कर लेती थीं। और जिसे वामपंथी इतिहासकारों ने कायरता कहकर संबोधित किया, वह दरअसल स्वयं को उस अमानवीय अत्याचारों से बचाने के लिए था, जो आज लोगों को प्रत्यक्ष दिख रहा है। जिससे बचने के लिए अफगानिस्तान की औरतें भाग रही हैं।

यहाँ तक कि अकबर ही वह व्यक्ति था जिसने हरम को संस्थागत किया और उसके हरम में पांच हजार से ज्यादा औरतें थीं। और अकबर के बाद ही यह नियम बना कि मुग़ल शहजादियों का निकाह नहीं किया जाएगा।

अकबर ही वह व्यक्ति था जो किसी भी औरत पर नजर पड़ने पर उसे हरम का हिस्सा बना लेता था। अकबर की अय्याशियों के किस्से बहुत दूर दूर तक फैले थे! मगर चित्तौड़ के दुर्ग पर उसके अधिकार के बाद राजपूत स्त्रियों ने जौहर कर लिया था। इसीलिए जिससे वह मुसलमानों के हरम का हिस्सा न बनें। विसेंट ए स्मिथ अकबर द ग्रेट मुग़ल में पृष्ठ 89 पर लिखते हैं कि दुर्ग पर अंतिम अधिकार से पहले दुर्ग की रानियों ने जौहर किया। हालांकि पहले के जौहरों की तुलना में यह संख्या काफी कम थी, अबुल फजल के अनुसार तीन सौ राजपूत स्त्रियों ने स्वयं को हरम का हिस्सा बनाने से बचने के लिए जौहर कर लिया था।

और उन्होंने सही ही जौहर किया था, क्योंकि अकबर ने उसके बाद बंदी बनाए हुए 8000 राजपूतों की ही हत्या नहीं की बल्कि 40,000 किसानों की भी हत्या का आदेश दिया। जिसमें कई बच्चे भी शामिल थे।

इससे पहले रानी दुर्गावती को अकबर ने हरम में लाना चाहा था, पर रानी दुर्गावती ने अकबर का सामना किया था और जब देखा कि उनका अंतिम समय आ गया है तो उन्होंने जीवित मुग़ल सेना के हाथ में न पड़ कर स्वयं के प्राण स्वयं लेना ही उचित समझा।

जहांगीर, शाहजहाँ की अय्याशियों के किस्सों से इतिहास भरा है। जहाँगीर ने तो नूरजहाँ को पाने के लिए उसके पति का ही खून करा दिया था। शाहजहाँ ने मुमताजमहल की मृत्यु के बाद कहा जाता है कि अपनी ही बेटी के साथ यौन सम्बन्ध बनाए थे।

और जिस व्यक्ति को सबसे पवित्र बनाकर प्रस्तुत किया जाता है, वह औरंगजेब अपने भाई दाराशिकोह से इस हद तक नफरत करता था कि उसने अपने भाई का ही खून नहीं किया था बल्कि उसकी हिन्दू पत्नी राणा दिल को भी हरम में शामिल करना चाहता था। शिवाजी द ग्रांड रेबल में डेविड किनकैड पृष्ठ 114 पर लिखते हैं कि जब औरंगजेब ने उसे अपने हरम में आने के लिए कहा तो उस वीर हिन्दू स्त्री ने अपने चेहरे को चाकू से गोद लिया और कहा “जो सुन्दरता तुम्हें चाहिए, वह है ही नहीं, वह तुम्हें कभी नहीं मिलेगी।”

मुगलों की अय्याशियों की कहानियां इतनी हैं कि उन्हें समेटना संभव नहीं है। मगर यह सत्य है कि यह अपनी औरतों को खेती मानते हैं और काफिर औरतों को माल-ए-गनीमत, इसलिए वह दोनों पर ही अत्याचार करते हैं। हिन्दू स्त्रियों के लिए देह तक का भी आत्मसम्मान अधिक महत्वपूर्ण है, इसलिए उसे बनाए रखने के लिए उन्होंने हर संभव विरोध किया, फिर चाहे दुर्गावती जैसे स्वयं को कटार मारना हो, राणा दिल जैसे चेहरे को खराब करना, या फिर कोटा रानी जैसे आधीनता न स्वीकारना या फिर चित्तौड़ की रानियों के जैसे जौहर करना।

उस समय किया गया जौहर आज तब समझ में आता है, जब अफगानिस्तान में तालिबान के अत्याचारों से पीड़ित मुस्लिम औरतें मर रही हैं या फिर स्वयं को मार रही हैं या फिर भाग रही हैं। और सबसे ज्यादा दुखद यह है कि इन्हीं जंगली लोगों को वाम और इस्लामी इतिहासकारों ने भारत के इतिहास में महिमामंडित किया है। 

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Sonali Misra

सोनाली मिश्रा स्वतंत्र अनुवादक एवं कहानीकार हैं। उनका एक कहानी संग्रह डेसडीमोना मरती नहीं काफी चर्चित रहा है। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति कलाम पर लिखी गयी पुस्तक द पीपल्स प्रेसिडेंट का हिंदी अनुवाद किया है। साथ ही साथ वे कविताओं के अनुवाद पर भी काम कर रही हैं। सोनाली मिश्रा विभिन्न वेबसाइट्स एवं समाचार पत्रों के लिए स्त्री विषयक समस्याओं पर भी विभिन्न लेख लिखती हैं। आपने आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में परास्नातक किया है और इस समय इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से कविता के अनुवाद पर शोध कर रही हैं। सोनाली की कहानियाँ दैनिक जागरण, जनसत्ता, कथादेश, परिकथा, निकट आदि पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।

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