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एंटनी कमिटी की रिपोर्ट के बाद भी तुष्टिकरण की राजनीति से ऊपर क्यों नहीं उठ रही कॉंग्रेस?

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अमित श्रीवास्तव। झारखंड में कॉंग्रेस छात्र संगठन एनएसयूआई के सात नेताओं को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। उन का दोष बस इतना ही है कि उन्होंने सांगठनिक ग्रुप में जय श्री राम लिखा था। जब देश में श्री राम मंदिर का निर्माण चल रहा हो व केंद्रीय सरकार, देश की सबसे बड़े राजनीतिक दल के नेता व करोड़ो आम जन जय श्री राम का उच्चारण करने को अपना अभिमान मानते हो तो उस समय कॉंग्रेस श्री राम से इतनी दूरी क्यों बना रही है? न सिर्फ दूरी बना रही है अपितु इसका प्रदर्शन भी कर रही है? क्या यह एक रणनीति है? यदि हाँ तो क्या वर्तमान नेतृत्व जो नेहरू परिवार तक सिमट कर रह गया है

इस रणनीति का सदुपयोग करने में सक्षम है? क्या आज कॉंग्रेस नेतृत्व में इतनी परिपक्वता है कि उल्टी ब्यार में तैर कर भी डूबती को नैया पार करा पाएं?
2023 में श्री राम मंदिर के निर्माण कार्य के पूर्ण होने के बाद राजनीतिक हलकानो में यह बात स्पष्ट रूप से मानी जा रही है कि 2024 के चुनाव में मन्दिर के रास्ते सबल व प्रखर हिंदुत्व प्रमुख मुद्दा रहने वाला है। इसके बाद भी कॉंग्रेस तुष्टिकरण से बाज नहीं आ रही। स्थापना काल के कुछ वर्षों के उपरांत से ही कॉंग्रेस के कैडर वोटरों में बड़े जमींदार, मुस्लिम, आदिवासी व ब्राह्मण प्रमुखता से रहे हैं।

दलित वोट काशीराम के उदय के साथ कॉंग्रेस से दूर होते चले गए। 70 के दशक में जनसंघ के बढ़ते जमीनी प्रभाव के विरुद्ध जातिगत राजनीति का सहारा लेकर कॉंग्रेस ने बड़ी चाल तो चली जिसका उसे कुछ वर्षों तक लाभ भी मिला किन्तु कालांतर में अयोग्य नेतृत्व के कारण इन समूहों से कॉंग्रेस का नियंत्रण कम होता गया। आगे की राजनीति में आदिवासी समेत मुस्लिम मतदाताओं में सेंध लगती गई। जातिगत समूहों की राजनीति जहाँ एक तरफ हिन्दू वोटरों में बिखराव का कारण बनी वहीं मुस्लिमों का वोट समुदाय के सदर के माध्यम से एकजुट ही रहा। एक बदलाव यह भी दृष्टिगत है कि अब मुस्लिम मतदाता कॉंग्रेस की जागीर नहीं रहें।

उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह बिहार में लालू यादव जैसे नेताओं के उदय से 90 के दशक की राजनीति में मुस्लिम कॉंग्रेस से इतर इन क्षेत्रिय दलों के साथ खड़े होते चले गए। नरसिंहा राव व सीता राम केसरी प्रकरण व ब्राह्मण नेताओं के अभाव के कारण ब्राह्मणों का मोह भी भंग हो गया यधपि इसकी शुरुआत भाजपा के उदय के साथ हो चुकी थीं वर्तमान परिस्थिति में मुस्लिम उन्हीं के साथ खड़ा होता है जो भाजपा को टक्कर दे सकें। बिहार, बंगाल दिल्ली में हुए चुनाव इसके प्रमाण है। वर्तमान राजनीति में कॉंग्रेस पुनः अपने कैडर वोट मुस्लिम, ब्राह्मण व आदिवासी वोटरों को साधने का प्रयास कर रही है। आगामी उत्तर प्रदेश चुनाव एक प्रयोग के रूप में देखा जा रहा है।

भारतीय राजनीति में मोदी युग के आरंभ के बाद राजनीति की दिशा भी बदली है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, असम की राज्य सरकारों के कुछ फैसलों ने इस बदली राजनीति को बल दिया है। यह बदली राजनीति है गैर भाजपा राजनीतिक दलों का नरम हिंदुत्व की छवि की राजनीति। उत्तर प्रदेश चुनाव पर इस नरम हिंदुत्व का प्रभाव दिखने वाला है। सपा, बसपा व आप जैसे दल अपने मुस्लिम मतदाताओं को रिझाने के साथ साथ हिन्दू वोटरों पर भी नजर रखने वाले हैं। यानी अब तक हिंदुत्व को अछूत मानने वाले राजनीतिक दल हिंदुत्व की ओर भी ललचाई नजरों से देख रहे हैं।

कॉंग्रेस के रणनीतिकार इस आगामी रस्साकशी को भांप कर अपने कैडर को वापस अपनी ओर लाने का प्रयास कर रहे हैं। यही कारण है कि कॉंग्रेस मुखरता के साथ मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति को न सिर्फ स्वीकार रही है अपितु इसका दिखावा भी कर रही है। इसी कड़ी में, कॉंग्रेस इको सिस्टम (पत्रकार, साहित्यकार, पूर्व ब्यूरोक्रेट, जज एवं बुद्दिजीवी) का दलित मामलों पर सक्रिय हों जाना, उत्तर प्रदेश में ठाकुर बनाम ब्राह्मण लड़ाई को हवा देना भी इसी रणनीति का हिस्सा है। यही कारण है अपने बुरे दिनों में भी कॉंग्रेस तुष्टिकरण का त्याग नहीं कर पा रही।

प्रश्न यह भी आता है कि इसका फायदा क्या कॉंग्रेस उठा पाएगी तो उत्तर है नहीं। आज की राजनीति 80 के दशक से बहुत आगे निकल चुकी है। अब मुस्लिम मतदाताओं का दो ही राजनीतिक ध्येय है एक कि भाजपा को हराने वालों के साथ जाना व मुस्लिम नेतृत्व खड़ा करना। ब्राह्मण कॉंग्रेस के साथ जाने को तैयार नहीं है।

इसके दो कारण है एक ब्राह्मण नेतृत्व का न होना व भाजपा की राजनीति में ब्राह्मणों का समुचित समावेश। यही हाल दलित राजनीति का भी है। दलितों के सामने कई विकल्प आज उपलब्ध हैं। मोदी सरकार की कई योजनाओं का सीधा लाभ दलितों तक पहुंचने के बाद दलित मतदाताओं का बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ खड़ा हुआ है जिसे इनकार नहीं किया जा सकता। परिणामस्वरूप कॉंग्रेस के हिस्से कुछ खाया नहीं आने वाला।

यहां हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि वर्तमान कॉंग्रेस नेतृत्व नेहरू परिवार के हाथों में है। जहाँ राजनीतिक परिपक्वता की कमी के साथ साथ आम कार्यकर्ताओं के पहुंच की सुगमता की कमी है। वर्तमान में एक भी ऐसे नेता नहीं है जो नेहरू परिवार को सलाह दे पाए। नेताओं में यस मैन बनने की होड़ ने कॉंग्रेस को इतना कमजोर कर दिया कि लाख कोशिशों व रणनीतिक तैयारियों के बाद भी चुनाव आते आते कॉंग्रेस बिखड़ जाती है। आगामी दस वर्षों तक कॉंग्रेस का भविष्य नहीं दिखता।

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