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पीएम मोदी गए शिंज़ो आबे की जिस अंत्येष्टि में, उस पर जापान में हंगामा क्यों

एक सप्ताह पहले, दुनिया भर से नामी-गिरामी हस्तियाँ ब्रिटेन की क्वीन एलिज़ाबेथ द्वितीय की राजकीय अंत्येष्टि के लिए लंदन में जुटे थे. उनमें से बहुत सारे अब जापान की राजधानी टोक्यो पहुँचे हैं. लगभग सौ देशों के प्रतिनिधि वहाँ मौजूद हैं. मगर ऐसा लगता है कि जापान के लोग इससे बहुत उत्साहित नहीं हैं – इसपर हो रहे भारी ख़र्च की वजह से. ऐसा अनुमान है कि शिंज़ो आबे के अंतिम संस्कार के आयोजन पर 1 .65 अरब येन या 1.14 करोड़ डॉलर यानी लगभग 80 करोड़ रुपये का ख़र्च बैठेगा.

पिछले कुछ हफ़्तों से जापान में इस राजकीय अंत्येष्टि को लेकर विरोध लगातार बढ़ता जा रहा था. ताज़ा सर्वेक्षणों के मुताबिक़ देश की आधी से ज़्यादा आबादी इसे ग़लत मान रही है. इस सप्ताह, एक व्यक्ति ने टोक्यो में प्रधानमंत्री कार्यालय के बाहर ख़ुद को आग लगा ली. और सोमवार को, लगभग 10,000 प्रदर्शनकारियों ने अंत्येष्टि समारोह को रद्द करने की माँग करते हुए टोक्यो में जुलूस निकाला.

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लेकिन दूसरी ओर, इस समारोह के लिए दुनिया भर से जापान के सहयोगी टोक्यो में जुटे हैं. अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन नहीं गए हैं, मगर उन्होंने अपनी उपराष्ट्रपति कमला हैरिस को भेजा है. सिंगापुर के प्रधानमंत्री ली सेन लूंग मौजूद हैं. ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बेनिस, तीन अन्य पूर्व प्रधानमंत्रियों के साथ पहुँचे हैं. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी महारानी की अंत्येष्टि में नहीं गए थे, मगर शिंज़ो आबे की अंत्येष्टि में शरीक़ हो रहे हैं.

इन बातों से शिंज़ो आबे के बारे में पता ये चलता है कि – भले ही दुनिया भर के नेता उन्हें श्रद्धांजलि देने जापान में जुटे हैं – मगर उनके अपने ही देश में बहुत सारे लोग इस बात का विरोध कर रहे हैं. क्यों है ऐसा?

शिंज़ो आबे

  • 8 जुलाई, 2022 को जापान में चुनाव प्रचार करते समय पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या
  • जापान के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहने वाले राजनेता
  • 27 सितंबर को राजकीय सम्मान के साथ अंत्येष्टि, दुनिया भर से टोक्यो में जुटे नेता
  • आबे की राजकीय अंत्येष्टि किए जाने का जापान में विरोध
  • जापान में इससे पहले सामान्यतः राजपरिवार के सदस्यों की ही होती रही है राजकीय अंत्येष्टि

सबसे पहली बात, ये एक सामान्य आयोजन नहीं है. जापान में राजकीय सम्मान से अंत्येष्टि केवल शाही परिवार के सदस्यों की होती है. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, केवल एक ही बार ऐसा हुआ है जब किसी राजनेता की राजकीय अंत्येष्टि हुई है, और वो भी बहुत पहले 1967 की बात है. तो, इस हिसाब से शिंज़ो आबे को राजकीय सम्मान के साथ अंत्येष्टि करना एक बड़ी बात है. ऐसा कुछ हद तक इसलिए भी हो रहा है कि आबे की मृत्यु अलग तरह से हुई.

इस साल जुलाई में एक चुनावी रैली में उनकी गोली मार हत्या कर दी गई. और जापान ने इसका शोक मनाया. जनमत सर्वेक्षणों के अनुसार, आबे कभी भी बहुत लोकप्रिय नहीं थे, मगर वहाँ बहुत कम ही लोग इस बात से इनकार करेंगे कि उन्होंने जापान में स्थिरता और सुरक्षा लाई. ऐसे में उनकी राजकीय अंत्येष्टि का फ़ैसला उनके रसूख़ को भी दर्शाता है. जापान में कोई और प्रधानमंत्री इतने लंबे समय इस पद पर नहीं रहा जितना आबे रहे. और संभवतः, दूसरे विश्वयुद्ध के बाद किसी और राजनेता ने अंतरराष्ट्रीय तौर पर जापान का वैसा प्रभाव नहीं छोड़ा.

आबे के एक पूर्व सलाहकार और राजनीतिक शास्त्र के प्रोफ़ेस काज़ुटो सुज़ुकी कहते हैं, “वो अपने समय से काफ़ी आगे के शख़्स थे.” “उन्होंने बदलते शक्ति संतुलन को समझा, कि एक उभरता हुआ चीन, शक्ति संतुलन को उलट-पुलट करेगा और इस क्षेत्र में बदलाव लाएगा. तो, वो इसकी अगुआई करना चाहते थे.” प्रोफ़ेसर सुज़ुकी ट्रांस-पैसिफ़िक पार्टनरशिप (टीपीपी) का ज़िक्र करते हैं, जो अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की एशिया प्रशांत क्षेत्र में सभी अमेरिकी सहयोगियों को मुक्त व्यापार के लिए एक विशाल मंच के नीचे लाने की एक योजना थी.

2016 में, जब डोनल्ड ट्रंप ने अमेरिका को इससे अलग कर लिया, तो सबको लगा कि ये संधि भी ख़त्म हो जाएगी. मगर ऐसा नहीं हुआ. आबे ने लगाम अपने हाथ में ली, और संधि को कुछ बदला जिससे इसका नाम और जटिल हो गया – कंप्रिहेंसिव एंड प्रोग्रेसिव एग्रीमेंट फ़ॉर ट्रांस-पैसिफ़िक पार्टनरशिप, या सीपीटीपीपी. ये नाम बड़ा ही अजीब है, मगर इससे इस बात का इशारा मिला कि जापान एशिया की फिर से अगुआई करने का इच्छुक है. उन्होंने क्वाड बनाने में भी अहम भूमिका निभाई जिसके लिए अमेरिका, जापान, भारत और ऑस्ट्रेलिया ने हाथ मिलाया.

2014 में, तत्कालीन प्रधानमंत्री आबे ऐसे क़ानून लेकर आए जिन्होंने दूसरे विश्व युद्ध के बाद से शांतिवादी जापानी संविधान की “पुनर्व्याख्या” की. इनके बाद से जापान को “सामूहिक तौर पर आत्म-सुरक्षा” के अधिकार का इस्तेमाल करने की अनुमति मिल गई. इसका मतलब ये हुआ कि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद, पहली बार जापान अपनी सरहद से बाहर किसी सैन्य अभियान में अमेरिका का साथी बन सका. इस क़ानून को लेकर तब बहुत विवाद हुआ, और उसका प्रभाव आज भी महसूस हो रहा है. टोक्यो में शिंज़ो आबे की राजकीय अंत्येष्टि का विरोध करने सड़कों पर उतरे हज़ारों लोग उन पर जापान को युद्ध की ओर ले जाने का आरोप लगाते हैं.

एक प्रदर्शनकारी माचिको ताकुमी ने कहा, “आबे ने जो आत्म-सुरक्षा विधेयक पारित करवाया, उसका मतलब ये है कि जापान अब अमेरिका के साथ फिर लड़ाई कर सकता है, उन्होंने जापान को फिर से युद्ध की ओर मोड़ा, इसलिए मैं उनकी राजकीय अंत्येष्टि का विरोधी हूँ.” जापान युद्ध के सदमे में रहा एक देश है. मगर वहाँ के लोग केवल परमाणु बमों के हमलों की यादों से नहीं, बल्कि दूसरी वजहों से भी आबे से नाराज़ हैं.

जापान के दूसरे विश्व युद्ध के बाद आए संविधान में साफ़ लिखा है कि जापान “युद्ध छेड़ने का अधिकार त्यागता” है. आबे को यदि उस स्थिति में बदलाव करना था तो उन्हें पहले जनमत सर्वेक्षण करवाना चाहिए था. मगर, वो इसके बदले क़ानून लेकर आए और संविधान की “पुनर्व्याख्या” करवाई. टोक्यो की सोफ़िया यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर कोइची नाकानो कहते हैं, “आबे को एक ऐसा व्यक्ति माना जाता है जो लोगों को लेकर जवाबदेह नहीं था. उन्होंने जो भी किया, वो संविधान के सिद्धांतों के उलट किया. उन्होंने लोकतंत्र के सिद्धांतों के विरोध में ऐसा किया.”

मगर उनके समर्थकों की नज़रों में, लोग असल बात को नहीं पकड़ पा रहे. शिंज़ो आबे ने किसी भी और अंतरराष्ट्रीय नेता से पहले चीन के बढ़ते ख़तरे को भाँपा, और फ़ैसला किया कि जापान, अमेरिका-जापान गठजोड़ का एक पूर्ण सदस्य बनेगा. उनके पूर्व सलाहकार सुज़ुकी बताते हैं, “आबे ने पहले ही देख लिया कि चीन उभरेगा, और अमेरिका इस क्षेत्र से पैर पीछे खींचेगा. तो अमेरिका को यहाँ लिप्त रखने के लिए उन्होंने सोचा कि हमें ख़ुद की रक्षा करने के लिए ताक़त जुटानी होगी.”

फिर से हथियारबंद और सक्षम जापान को अमेरिका निश्चित तौर पर सराहेगा, एशिया के भी बहुत सारे देश ऐसा करेंगे, जो उन्हीं की तरह चीन को लेकर चिंता में हैं. आबे ने ऑस्ट्रेलिया और भारत में दोस्ती की संभावनाएँ देखीं. उनकी हत्या के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने देश में एक दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया.

मोदी

मगर एक देश है जहाँ आबे की मौत का शोक नहीं मनाया जा रहा, जहाँ उन्हें बार-बार युद्धोन्मादी बताया जाता है. वो देश है चीन. और तभी उसने महारानी की अंत्येष्टि में अपने उपराष्ट्रपति को लंदन भेजा, मगर आबे की अंत्येष्टि में एक ऐसे पूर्व विज्ञान और तकनीक मंत्री को भेजा है जिसका नाम चीन के बाहर किसी ने नहीं सुना.

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