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क्या मंदिर के उल्लेख से ही भड़क पड़ती है लिबरल जमात?

Sonali Misra. पिछले दिनों दो घटनाएं हुईं। दोनों ही घटनाओं में दो बच्चे संलग्न थे। दोनों ही घटनाओं में खून बहा और दोनों ही घटनाओं में हिन्दू और मुसलमान का एंगल था।  मगर एक बात है कि बुद्धिजीवियों (वाम और दक्षिण पंथी दोनों ही) में दोनों ही घटनाओं को लेकर एक सन्नाटा पसरा रहा। 

कर्नाटक के कलबुर्गी जिले में एक चौदह साल का लड़का, हिन्दू और उस पर दलित, उसने इस नाज़ुक उम्र में प्यार करने की गलती कर दी। दरअसल यह गलती तब होती है जब उसे प्यार हिन्दू लड़की से न होकर मुस्लिम लड़की से हो जाए।

और जय भीम-जय मीम का नारा देने वाले यह क्यों नहीं समझा पाते कि मुस्लिम परिवार भी अपनी बेटी को दलित लड़के के हाथ सौंप दें। खैर मामला यह है कि एक चौदह वर्ष का लड़का बात करने के लिए एक मोबाइल फोन लड़की को दे देता है और फिर वह गायब हो जाता है।

पांच दिनों के बाद जब वह लड़का मिलता है तो निर्जीव लाश के रूप में! क्षतविक्षत! ऐसे में यह एक खबर आती है और गायब हो जाती है और जैसे ही पता चलता है कि उसका खून उसकी मुस्लिम मित्र के घरवालों ने किया तो वह दिल्ली के दारे में प्रवेश नहीं कर पाती। अब क्या करें एजेंडा ही ऐसा है, कि जब तक एजेंडा न दिखे, हम बोलते नहीं है।

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अब आते हैं, दो दिन पहले हुई एक घटना पर। दिल्ली के पास गाज़ियाबाद में डासना शक्तिपीठ है। डासना एक मुस्लिम बहुल क्षेत्र है और जहाँ पर हिन्दू अब नाम मात्र के शेष हैं।  वहां पर कई वर्षों से चोरी और हिन्दुओं के आराध्यों की मूर्तियों के साथ गन्दी हरकतों के साथ साथ मुस्लिम समुदाय के युवकों द्वारा हिन्दू लड़कियों के साथ छेड़छाड़ की भी घटनाएं हो रही हैं। ऐसा दावा मंदिर के पुजारियों ने किया है। 

इसी मंदिर में दो दिन पहले एक लड़के की पिटाई का वीडियो सामने आया, जो पीटने वाले ने स्वयं पोस्ट किया था।  इस वायरल वीडियो में एक युवक एक लड़के का हाथ पकड़े है और उसका नाम पूछता है।

नाम सुनने के बाद उसकी पिटाई करना शुरू करता है। हालांकि वीडियो में एक और व्यक्ति की आवाज़ है जो बार बार उससे ऐसा करने से मना कर रहा है।  वह वीडियो किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को झकझोर देगा।

कोई भी उस वीडियो को नहीं देख सकता है। और यही हुआ, इस वीडियो को लगभग सभी ने असंवेदनशील बताया। क्योंकि उस वीडियो में बच्चे ने कहा था कि वह पानी पीने के लिए वहां आया था।

अब पानी पीने को लेकर यदि कोई ऐसा कदम उठाएगा तो स्पष्ट है कि बुराई होगी ही। पूरे एक दिन तक वह वीडियो और हमारे रचनाकारों की संवेदना फेसबुक पर तैरती रही।  क्योंकि इसमें मंदिर सम्मिलित था और मंदिरों के प्रति इनकी घृणा रह रह कर फूटती रहती है। 

एक घटना के पीछे की कहानी न जानकर हिन्दू धर्म को गाली देना एक फैशन है और यह फैशन क्या राष्ट्रवादी और क्या वामपंथी दोनों ही मंदिरों को लेकर आक्रामक हो जाते हैं। वामपंथियों का तो यह स्पष्ट स्टैंड है, परन्तु राष्ट्रवादी लेखक? उन्हें ऐसा लगता है जैसे मंदिरों की बुराई करके वह उनके मध्य स्वीकृत हो जाएँगे। और इस स्वीकृति को प्राप्त करने के लिए वह और भी अधिक जोर शोर से लिखने लगते हैं, उन मंदिरों के विरुद्ध, जिनके साथ क़ानून पहले ही अन्याय कर रहा है। खैर वह विषयांतर हो जाएगा।

तो जैसे ही वह वीडियो सामने आया, तो शोर शुरू हो गया।  यदि उसे केवल पानी पीने के लिए मारा गया, तो यह सृष्टि का जघन्यतम अपराध है। इससे अधिक जघन्य कुछ हो नहीं सकता, कुछ भी नहीं। क्योंकि प्यासे को पानी पिलाना हमारे यहाँ सबसे पुण्य कार्य माना गया है। परन्तु क्या यह वास्तव में पानी पीने को लेकर ही घटना हुई थी? यह थोड़ा विचारना होगा।

इस घटना के बाद कई समाचार चैनलों ने वहां पर साक्षात्कार लिए। जनज्वार को दिए गए साक्षात्कार में वहां पर कार्यरत एक पुजारी ने कई बातें बताईं। लगभग सात मिनट का यह वीडियो है। उसमें वह कह रहे हैं कि मुस्लिम बच्चे यहाँ आते क्यों हैं, वह पूजा करने तो आते नहीं हैं। वह हमारी लडकियां छेड़ने के लिए आते हैं।

फिर आगे वह इसी वीडियो में कहते हैं कि जिस बच्चे की पिटाई की गयी, वह किसी भी हाल में पानी पीने नहीं आया था। पानी पीना होता तो वह बाहर पी सकता था, इतने सारे नल लगे हैं। सामने ही सरकारी नल लगा हुआ है।

यदि पानी पीना होता तो वह वहां पीता।  उन्होंने कहा कि यह लोग (बच्चे बच्चे ही) दिन में यहाँ आते हैं रेकी करने के लिए और फिर रात में सामान चुराकर ले जाते हैं। उन्होंने यह स्पष्ट कहा कि यह बच्चा कोई मासूम नहीं था।   

उन्होंने कहा कि यदि उसे मंदिर में पानी ही पीना होता तो मंदिर में प्रवेश करते ही नल है, वहां से पीता, पर उसने ऐसा कुछ नहीं किया। वह मंदिर में अन्दर मिला है।

यह पूछे जाने पर कि उन्होंने मंदिर में यह बोर्ड क्यों लगाया गया है कि मुस्लिमों का प्रवेश वर्जित है, पुजारी का स्पष्ट कहना था कि ऐसे ही बच्चे बच्चे करके न जाने कितना लोहा यह कबाड़ी चुरा कर ले गए।  मंदिर में सामने ही शिव लिंग है। उस शिव लिंग की ओर इशारा करके उन्होंने कहा कि इसी शिव लिंग पर उन्होंने ऐसे ही बच्चों को गंदे कार्य करते हुए पकड़ा है।

जब उनसे गंदे कार्य के विषय में पूछा गया तो उन्होंने कहा “जैसे मूत्र करना, थूकना, बकरियों से वहां पर मल करवाना आदि। उन्होंने कहा कि इन्हीं लोगों के चक्कर में मंदिर प्रशासन को गेट लगवाना पड़ा और यह बोर्ड भी लगवाना पड़ा कि यहाँ पर मुसलमानों का प्रवेश वर्जित है।”

हालांकि बाद में पुजारी ने यह भी कहा कि उन्होंने कभी भी उन मुसलमानों को मंदिर आने से नहीं रोका है, जो तालाब के पानी से चर्म रोग ठीक करने आते हैं, जैसे मान्यता है। उन्होंने कहा कि आज भी कई मुसलमान इस तालाब में स्नान करके गए होंगे। 

जब उनसे इस पत्रकार ने पूछा कि उन्होंने किस अधिकार से यह बोर्ड लगवाया है तो उन्होंने कहा कि यह शासन और प्रशासन के साथ बात करके ही लगाया गया था और यह बोर्ड आज का नहीं है अपितु आज से सात आठ वर्षों से है।

आगे उन्होंने कहा कि इस मंदिर में पहले भी चार बार डकैती हो चुकी है। इसी बात का उल्लेख स्वामी यति सरस्वती जी ने भी क्विंट को दिए गए साक्षात्कार में कहा कि यह गाँव आसपास के गाँवों की कुलदेवी का मंदिर है और यहाँ पर आसपास के गाँवों से लोग आते हैं।

उन्होंने कहा कि यहाँ पर 95% मुस्लिम हैं और केवल 5% हिन्दू।  उन्होंने कहा कि यहाँ पर मुस्लिम गुंडे हिन्दू लड़कियों को छेड़ने आते हैं, और यदि हिन्दू लड़के के परिवार में शिकायत की जाए तो वह परिवार उन्हें डांटता है, जबकि मुस्लिम अपने लड़कों के पक्ष में लड़ने के लिए आ जाते हैं।

फिर उन्होंने आगे कहा है कि यहाँ पर चार बार चोरी हो चुकी है और फिर उन्होंने कहा कि यदि हमारी देवी और महादेव की शास्त्रीय विधि से पूजा करने के लिए यदि कोई मुस्लिम आता है तो स्वागत है।

उन्होंने कहा कि वह किसी भी हाल में अपनी बेटियों का शिकार करने के लिए किसी भी मुस्लिम को नहीं आने देंगे।  उन्होंने अपनी जान पर खतरा भी बताया और कहा कि मुसलमानों ने उन्हें मारने के लिए पंचायत की और जब वह उन्हें मारने में सफल नहीं हुए तो उन्होंने डॉ।

तोमर को मार डाला, सीसीटीवी में सब कुछ स्पष्ट आया। क्विंट पर प्रश्न करते हुए कहा कि उन्होंने कभी भी क्विंट को इस पर कोई डाक्यूमेंट्री करते हुए नहीं देखा।  उन्होंने कहा कि क्विंट झूठी घटनाओं के आधार पर हिन्दू मन्दिरों को बदनाम करने के लिए तो आ जाता है, पर सच्ची घटना को कवर करने नहीं आता। 

उन्होंने जिहादी देशों द्वारा फंडेड मीडिया पर भी प्रश्न उठाते हुए कहा कि अपनी बातों को रखने के लिए हमें लोगों को बुलाना तो होगा ही न! मगर इस मामले पर मंदिर का पक्ष जाने बिना जिस प्रकार लिबरल और राष्ट्रवादी लेखकों में हिन्दू धर्म और मंदिर को कोसने की होड़ शुरू हुई, उसे किसी भी कीमत पर स्वस्थ बहस नहीं कहा जा सकता है।

अभी दो ही दिन पहले हमने मंदिरों के साथ होने वाले अन्याय पर कार्यक्रम किया था, जब इस परिप्रेक्ष्य में देखेंगे तो पाएंगे कि इस समय हिन्दू, हिन्दू मन्दिर सभी एक बार फिर से युद्ध में हैं। क्योंकि लिबरल मीडिया और कथित राष्ट्रवादी लेखक भी एक तरफ़ा ही देखने के आदी हैं।

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Sonali Misra

Sonali Misra

सोनाली मिश्रा स्वतंत्र अनुवादक एवं कहानीकार हैं। उनका एक कहानी संग्रह डेसडीमोना मरती नहीं काफी चर्चित रहा है। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति कलाम पर लिखी गयी पुस्तक द पीपल्स प्रेसिडेंट का हिंदी अनुवाद किया है। साथ ही साथ वे कविताओं के अनुवाद पर भी काम कर रही हैं। सोनाली मिश्रा विभिन्न वेबसाइट्स एवं समाचार पत्रों के लिए स्त्री विषयक समस्याओं पर भी विभिन्न लेख लिखती हैं। आपने आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में परास्नातक किया है और इस समय इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से कविता के अनुवाद पर शोध कर रही हैं। सोनाली की कहानियाँ दैनिक जागरण, जनसत्ता, कथादेश, परिकथा, निकट आदि पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।

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1 Comment

  1. Avatar Jitendra Kumar Sadh says:

    बहुत बेशरम हैं ये मुल्ले

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