जीरो सांसद वाली माया के सामने, मुलायम पुत्र के समर्पण के मायने क्या हैं?

सपा का मतलब है मुलायम सिंह यादव !  मोदी के सामने अपने वजूद को बचाने के लिए  जब उत्तर प्रदेश में बसपा संग सपा ने गठबंधन की घोषणा की तो  मुलायम ने इसका पूरजोर विरोध किया। अखिलेश ने अपने पिता को अनसुना कर दिया। कांग्रेस की चाहत थी उत्तर प्रदेश में सपा बसपा संग उसका गठबंधन हो ताकि नरेंद्र मोदी को दिल्ली पर काबिज होने के लिए उत्तर प्रदेश में रोका जा सके।

अखिलेश खुद कांग्रेस संग गठबंधन चाहते थे। लेकिन मायावती ने साफ कर दिया कि वो कांग्रेस संग यूपी क्या देश में कहीं गठबंधन नहीं करेंगी। उस माया ने जिनसे बंग्लौर में कांग्रेस जेडीएस की सरकार के सपथ ग्रहण में शानदार पोज वाली फोटो खिंचवाई थी। मोदी को हराने के लिए महागठबंधन की सौगंध खाई थी उसने कांग्रेस त्यागने का फैसला किया तो अखिलेश इसे भी घुटने के बल खड़े होकर मानने को तैयार हो गए। अखिलेश ने यह फैसला तब स्वीकार कर लिया जब कि उन पर उनके असली वोट बैंक मुस्लिम समुदाय का दबाव  था। मुस्मिल वोट बैंक हर हाल में यूपी में सपा और कांग्रेस का गठबंधन चाहता था ताकि वोट न बटे लेकिन अखिलेश ऐसा नहीं कर पाए। आखिल किस मजबूरी के शिकार हैं अखिलेश जो एकतरफा माया के फैसले को मानने को मजबूर हैं!

पिछले लोक सभा चुनाव में मोदी की आंधी में उत्तर प्रदेश के सभी राजनीतिक दल उड़ गए। कुल 80 लोक सभा सीट में बस कांग्रेस के युवराज और उसकी मां ही लाज बचा पाई। बसपा का तो सुपड़ा ही साफ हो गया। माया के एक भी चेले चुनाव नहीं जीत पाए। मुलायम सिंह यादव परिवार के प्रभाव वाले सपा के पांच सांसद चुनाव जीत पाए। बाद के उप चुनाव में सपा सांसदों की संख्या दो और बढ़ गई। लेकिन 2019 के लोक सभा चुनाव में मोदी को हराने के लिए सपा बसपा ने जब गठबंधन का फैसला किया तो उसमे निर्णय सिर्फ मायावती ले पा रहीं हैं।

मुलायम पुत्र बस हां जी कर रहे हैं। जीरो सांसद वाली मायावती ने प्रदेश में 38 सीट पर उम्मीदवार खड़ा करने का फैसला किया है। सात सांसद वाले सपा को 37 सीट दिया है। हद तो यह कि सपा के लाख चाहने के बाद भी मायावती ने एक तरफा फैसला ले लिया कि वो कांग्रेस को गठबंधन में शामिल नहीं होने देंगी। माया के सामने मुलायम पुत्र की ऐसी कौन सी गठबंधन की मजबूरी है । जिसके लिए सपा सुप्रीमो घुटने के बल खड़े हैं!

समाजवादी पार्टी का वजूद ही मुलायम सिंह यादव के कारण है। 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले पार्टी का हर फैसला सिर्फ मुलायम लेते थे। बदलते दौर में मुलायम के उम्र पर अखिलेश का फैसला हावी होने लगा। अखिलेश ने अपने पिता के सबसे बड़ी राजनीतिक दुश्मन बसपा सुप्रीमों मायावती से 2019 के चुनाव के लिए गठबंधन का फैसला कर लिया। मुलायम को यह फैसला कतई पसंद नहीं आया। वो खुलेआम अपने बेटे के फैसले का विरोध करने लगे।

संसद में मोदी को दुबारा प्रधानमंत्री बनने की शुभकामना देने वाले मुलायम अपने बेटे अखिलेश पर लाल- पीले होने लगे। माया संग गठबंधन का फैसला करने पर मुलामय ने कहा ‘अखिलेश के हाथ में सीट देना है हमारे हाथ में काटना। वो आखिर मायावती को 38 सीट कैसे दे सकता है। फिर हमारे कार्यकर्ता चुनाव कहां लड़ेंगे। मुलायम के तेवर यहीं शांत नहीं हुए। मुलायम ने कहा हमने समाजवादी पार्टी बनाया अखिलेश का इसमे योगदान क्या है। हमने अपने बूते तीन बार सरकार बनाई। चुनाव जीत कर अखिलेश को कुर्सी पर बैठाया। सांसद हमारे पास हैं’। मुलायम का यह दर्द इसलिए क्योंकि सपा के कार्यकर्ता हैरान हैं अखिलेश ने ये कैसा समझौता कर लिया !

वाकई अखिलेश का यह फैसला हैरान करने वाला है। उस पर से मायावती के मनमाने फैसले पर सपा सुप्रीमो की चुप्पी कई सवाल पैदा करते हैं। जिस मायावती के पास खुद को राज्यसभा भेजने के लायक विधायक नहीं। लोकसभा में एक भी सांसद नहीं जिस पार्टी के पास, उस पार्टी के सामने अखिलेश के समर्पण के मायने क्या हैं। समर्पण उस मायावती के सामने, जो उनके पिता और उनकी पार्टी की अब तक की सबसे बड़ी राजनीतिक दुश्मन रही हैं। आखिर ऐसा क्या कि सपा 2019 के लोक सभा चुनाव में अपनी स्थापना के बाद से सबसे कम सीट पर लोक सभा का चुनाव लड़ रही है!

मुलायम सिंह यादव ने 1992 में जनता दल से अलग होकर समाजवादी पार्टी बनाई थी। 1990 में बतौर मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश, अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलवा कर मुल्ला मुलायम का तमगा ले चुके मुलायम सिंह यादव। मुलायम के इसी बढते कद से परेशान तब के प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने लालू पर आडवाणी के रथ को रोकने का निर्देश दिया। ताकि यह काम भी मुलायम के हाथों ही न हो। खैर तब तक भारत में मुसलमानों के हृदय सम्राट और देश के सबसे बड़े सूबे में उस ठोस वोट बैंक के मालिक बने चुके थे मुलायम। मुस्लिम वोट बैंक के स्वामी रहे कांग्रेस  जमीन खिसका चुके थे मुलायम।

1996 में उन्हें साईकिल चुनाव चिन्ह मिला। तब से लेकर 2014 तक लोक सभा के हर चुनाव में सपा का प्रदर्शन बसपा से बेहतर रहा। 1996 में सपा को 17 तो बसपा के 11 सांसद थे। 1998 में सपा को 20 तो बसपा के बस 5 सांसद थे। फिर 1999 में सपा के 26 तो बसपा के महज 14 सांसद थे। 2004 के लोक सभा चुनाव में सपा के 35 तो बसपा के मात्र 14 सांसद थे। 2009 के लोकसभा चुनाव में सपा के 23 तो बसपा के 20 सांसद थे। 2014 के मोदी लहर में बसपा हवा में उड़ गई उसके पास जीरो सांसद हैं,सपा के सात सांसद लोक सभा चुनाव जीत कर आए।

मतलब यह कि एक भी बार सपा का कद उत्तर प्रदेश के लोक सभा चुनाव में  बसपा से कमजोर नहीं हुआ। फिर भी मोदी को टक्कर देने के लिए अपने सबसे बडे राजनीतिक दुश्मन के सामने अखिलेश ने समर्पण कर दिया। यह अपने आप में अबूझ पहेली है। मुलामय पुत्र का हर्ष उनके राजनीतिक गुरु चरण सिंह की तरह होता जा रहा है। जैसे चरण सिंह के ने अपना राजनीतिक साम्राज्य तैयार किया और वारिस बेटे को बनाया। मुलायम ने भी वही किया। चरण सिंह का वजूद उनके पुत्र के नक्कारे पन के कारण खत्म हुआ।

मुलायम पुत्र तो उनकी तरह प्रदेश के मुखिया बने। लेकिन मुलामय को पता के भ्रष्टाचार में आकंठ डुबे उनके साम्राराज्य का पतन मोदी काल में तय है। मोदी से टकराने की उनकी हैसियत नहीं। भाजपा के साथ खड़े होने से मूल वोट बैंक तबाह हो सकता है। राजनीतिक वजूद खत्म होने का संकट है। सीबीआई का नकेल ऐसा की सरकार से टकराने की हैसियत नहीं। पुत्र मोह इतना कि राजनीतिक अखाड़े में सबसे बड़े दुश्मन के सामने बेटे को पेश करने का दांव ही पहलवान मुलायम को सुट कर रहा है। मुलामय बेहतर जानते हैं कि जीरो सांसद वाली मायावती के शरण में जाए बिना अखिलेश का राजनीतिक वजूद संकट में है। इसीलिए मायवती के इशारे पर नाचना फिलहाल मुलायम पुत्र की मजबूरी है।

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