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भविष्य में कोई अधिकारी ‘आउट ऑफ़ बॉक्स’ जाकर अपराध से लड़ने का इरादा करेगा ?

विपुल रेगे। क्रूज़ ड्रग्स केस अब इतिहास बनने की ओर अग्रसर है। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने इस केस से अंतरराष्ट्रीय कड़ियाँ जोड़ने का दावा किया था। इस केस का वही हश्र होने जा रहा है, जो सुशांत सिंह राजपूत की संदिग्ध हत्या, दिशा सालियान की निर्मम हत्या, ड्रग्स इन बॉलीवुड केस का हुआ था। अब प्रश्न ये है कि किसी देश का फिल्म उद्योग इतना ताकतवर और प्रभावशाली हो सकता है कि सीबीआई, एनसीबी और ईडी जैसी केंद्रीय जाँच एजेंसियां उसके सामने घुटने टेकते दिखाई दे। देश की राजनीति और ताकतवर सरकार भी उसके समक्ष निर्बल सिद्ध हो रही है।

 

भारत देश में अब एकता कपूर और करण जौहर को राष्ट्रीय सम्मान दिया जाता है तो आश्चर्य नहीं होता और न किसी प्रकार की पीड़ा होती है। जब सरकार ऐसे लोगों को पुरस्कृत करना चाहे तो किया भी क्या जा सकता है। महाराष्ट्र एक ऐसा किला बन चुका है, जहाँ केंद्र सरकार की किसी भी प्रकार दाल नहीं गलने दी जा रही है। उद्धव ठाकरे सरकार ने शपथ लेने के पहले दिन से केंद्र के विरुद्ध असहयोगात्मक रवैया अपना रखा है।

जब ऐसा होता है तो राजनीति में टेढ़ी चाल चलने वाले घोड़े सक्रिय हो जाते हैं। कहने का मतलब है कि सत्तारूढ़ दल यदि किसी अन्य राज्य में विपक्ष की भूमिका में है तो वह आक्रामक होकर सड़कों पर आता है। हालाँकि पालघर प्रकरण से ही भाजपा महाराष्ट्र में कहीं दिखाई नहीं दी। वह आज भी सड़क पर नहीं है। बहुचर्चित एंटीलिया प्रकरण में भाजपा का विरोध देखने को नहीं मिला।

 उनके नेता प्रतिपक्ष पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस यूँ तो खामोश रहते हैं लेकिन जब नवाब मलिक उन पर निजी हमला करते हैं तो वे भाजपा के आधिकारिक मंच से प्रेस वार्ता कर उसका उत्तर देते हैं। निश्चय ही ये सब आलाकमान से छुपा नहीं है। अब तो कहा जाने लगा है कि महाराष्ट्र भाजपा शिवसेना के साथ फिक्सिंग कर आराम से बैठी हुई है। महाराष्ट्र भाजपा शिवसेना सरकार के कार्यकाल की समालोचना नहीं कर रही है।

इसके क्या छुपे कारण हो सकते हैं ? समीर वानखेड़े के साथ जो हो रहा है, वह देश के अन्य कर्त्तव्यनिष्ठ अधिकारियों को कड़वा सबक सीखा गया है। क्या भविष्य में कोई अधिकारी इस तरह ‘आउट ऑफ़ बॉक्स’ जाकर सिस्टम और अपराध से लड़ने का इरादा करेगा ? शायद कभी नहीं। जिस ढंग से वानखेड़े और उनके परिवार पर लांछन लगाए गए हैं, उससे  सिद्ध होता है कि भारत में यदि आप ईमानदारी से कार्य करेंगे तो सबसे पहले सरकार ही आपको समर्थन देने से पीछे हट जाएगी।

एक कबाड़ बेचने वाला देश की केंद्रीय एजेंसी के बड़े अधिकारी पर लांछन पर लांछन लगाए जा रहा है, इससे अधिक शर्म की बात और क्या होगी। संसद के शीतकालीन सत्र मे केंद्र सरकार नारकोटिक्स ड्रग्स बिल पेश करने जा रही है। इस बिल के अनुसार कम मात्रा में भांग, गांजा और ड्रग्स जैसे नशीले पदार्थ रखने वाले लोग अपराध के दायरे में नहीं आएंगे। क्या केंद्र सरकार ने अरयान खान और उसके जैसे युवाओं को नए वर्ष का तोहफा दिया है ?

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Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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