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बहुमत साबित करने से पहले इस्तीफा, चौधरी चरण सिंह से बीएस येदियुरप्पा तक भारत की राजनीति का सफर!

विधानसभा चुनाव परिणाम आने के बाद से कर्नाटक में घटे राजनीतिक घटनाक्रम के तहत आज मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने इस्तीफा दे दिया। उन्होंने बहुमत साबित करने से पहले अपना इस्तीफा सौंप दिया। कर्नाटक के नाटक में जो दिलचस्प मोड़ आया है यह पहली बार नहीं आया है। भारतीय राजनीति में ऐसी घटनाएं होती रही है। इसी प्रकार की एक घटना के तहत पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बनी पहली एनडीए सरकार महज एक वोट के कारण संसद में अपना बहुमत साबित करने से चूक गई थी। हमारा राजनीतिक इतिहास इस प्रकार की घटनाओं से भरा पड़ा है।

मुख्य बिंदु

* कर्नाटक से पहले भी देश में ऐसी कई राजनीतिक घटनाएं घट चुकी है
* चरण सिंह से लेकर चंद्रशेखर तक बहुमत साबित करने से पहले दे चुके हैं इस्तीफा

1979 : पूर्व प्रधानमंत्री चरण सिंह बहुमत भी साबित नहीं कर पाए

आपातकाल के बाद जब देश में आम चुनाव हुआ, तो उसमें पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को मुंह की खानी पड़ी। कांग्रेस की हार की वजह से देश में 30 सालों बाद मोरारजी देसाई के नेतृत्व में गैर कांग्रेसी सरकार बनी थी। शानदार बहुमत के साथ सत्ता में आई जनता पार्टी सरकार में मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने और चरण सिंह को उप-प्रधानमंत्री के साथ गृहमंत्री बनाया गया। लेकिन आपसी कलह की वजह से इस सरकार का पतन हो गया। इंदिरा गांधी ने इस बीच दांव खेला। उन्होंने सीपीआई के साथ बातचीत कर चरण सिंह को समर्थन देने का भरोसा दिया। तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने चरण सिंह को 28 जुलाई 1979 को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई और 20 अगस्त तक अपना बहुमत साबित करने को कहा। लेकिन इंदिरा गांधी ने 19 अगस्त को ही चरण सिंह की सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। चरण सिंह ने भी बहुमत साबित करने से पहले ही अपना इस्तीफा दे दिया।

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1989: भाजपा ने भी गिरा दी थी वी पी सिंह की सरकार
ऐसी ही दूसरी घटना 1989 में तब घटी जब केंद्र में चल लही राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार से भाजपा ने समर्थन वापस ले लिया था। दरअसल साल 1988 में कई पार्टियों ने आपस में विलय कर नई पार्टी जनता दल का गठन किया। वीपी सिंह को इस नई पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया। बाद में इनके साथ कई क्षेत्रीय दलों ने मिलकर नेशनल फ्रंट बनाया। 1989 में हुए चुनाव में नेशनल फ्रंट को अच्छी सीटें तो मिली लेकिन इतनी नहीं की उनकी अपनी सरकार बन जाए। लेकिन भाजपा और वाम पार्टियां दोनों ने बाहर से समर्थन दिया। इस तरह वीपी सिंह के नेतृत्व में केंद्र में राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार बनी। सरकार एक साल चली ही थी कि भाजपा ने लाला कृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में सोमनाथ से अयोध्या तक की रथ यात्रा शुरू कर दी। लेकिन जैसे ही आडवाणी का रथ बिहार के समस्तीपुर पहुंचा, केंद्र के इशारे पर बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। आडवाणी के गिरफ्तार होते ही अटल बिहारी वाजपेयी ने वीपी सिंह की सरकार से समर्थन वापस लेकर उसे गिरा दिया।

1990: राजीव गांधी ने गिरा दी थी चंद्रशेखर की सरकार
जैसे ही भाजपा ने 1990 में वीपी सिंह की सरकार गिराई वैसे ही चंद्रशेखर ने अपने समर्थकों के साथ जनत दल को छोड़कर समाजवादी जनता पार्टी के नाम से एक अलग पार्टी पना ली। 1991 में हुए चुनाव में वैसे तो किसी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला, लेकिन उनकी पार्टी 64 सीटों पर जीत हासिल की। बाद में कांग्रेस के समर्थन से चंद्रशेखर देश के अगले प्रधानमंत्री बन गए। लेकिन सात महीने ही सरकार चली थी कि अचानक कांग्रेस ने जासूसी का आरोप लगाते हुए चंद्रशेखर सरकार से अपना समर्थन वापस लेने की घोषणा कर दी। चंद्रेशेखर ने भी संसद में बहुमत साबित करने की बजाए 6 मार्च 1991 को अपना इस्तीफा दे दिया।

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1999: महज एक वोट से गिर गई थी वाजपेयी सरकार
1998 में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा को पूर्ण बहुमत तो नहीं मिला लेकिन सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने आई। भाजपा ने वाजपेयी के नेतृत्व में अन्नाद्रमुक की मदद से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार बनाई। लेकिन सरकार को चले अभी 13 महीने ही हुए थे कि अन्नाद्रमुक ने सरकार का साथ छोड़ दिया। इसके बाद एनडीए सरकार को सदन में विश्वासमत हासिल करने को कहा गया संसद में हुए शक्ति परीक्षण के दौरान वाजपेयी सरकार एक वोट से मात खा गई। वह शक्ति परीक्षण अपने आप में अनूठा था। एनडीए सरकार जिस एक वोट से गिरी थी वह वोट ओडि़शा के मुख्यमंत्री गिरधर गमांग का। क्योंने उन्होंने तब तक सांसद के पद से इस्तीफा नहीं दिया था। उनका वोट डलवाने के लिए विपक्ष ने विशेष रूप से उन्हें दिल्ली बुलाया था।

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