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India Speak Daily > Blog > Blog > भाषा और साहित्य > हां मैं मनुवादी हूं।
भाषा और साहित्यविचार

हां मैं मनुवादी हूं।

Courtesy Desk
Last updated: 2024/10/28 at 11:33 AM
By Courtesy Desk 93 Views 22 Min Read
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हेमंत शर्मा :-

हां, मैं मनुवादी हूँ। चौंक गए आप। पर है सौ फ़ीसद सच। मनु का वंशज हूँ। हमारी रगों में उनका खून दौड़ रहा है। हमारे मनु संघर्ष, साधना, प्रेरणा की जीती-जागती मिसाल थे। मनु शर्मा मेरे पिता थे। आज उनका जन्मदिन है। उस साल 28 अक्टूबर और शरदपूर्णिमा साथ-साथ पड़ीं थी। होते तो आज वो सत्तानबे साल के होते। ग़रीबी और अभाव जैसी जो परिस्थितियां किसी सामान्य आदमी को भीतर तक तोड़कर रख देती हैं, उसी ने उन्हें माँजा था। ज्यादा क्रिएटिव और मानवीय बनाया था।

मैं जब भी पलटकर उनके जीवन को देखता हूँ तो मुझे यूनानी देवता सिसिफस की कहानी याद आती है। यह कहानी मुझे प्रभावित करती है। सिसिफस को स्वर्ग से निकाल दिया गया था। क्योंकि उसने परमात्‍मा का कहना मानने से इनकार किया था। उसे दंड मिला कि उसे एक बड़ी-सी चट्टान को घाटी से उठाकर शिखर पर पहुंचना है और शिखर इतना संकरा था कि जब भी वह चोटी पर पहुंचकर चट्टान को नीचे रखता, वह फिर नीचे लुढ़क जाती। सिसिफस वापस हांफता-कांपता पसीने से तरबतर घाटी में जाता और फिर चट्टान उठाता है, यह जानते हुए की चट्टान फिर लुढ़क जायेगी। लेकिन सिसिफस हार नहीं मानता। वह फिर दोगुनी ताकत से चट्टान को उठाकर पहाड़ की चोटी की तरफ बढ़ता। उसके पांव कांपते। शरीर पसीना पसीना होता। पर जैसे ही वह चोटी तक पहुंचता, पत्‍थर फिर लुढ़क कर जमीन पर आ जाता। यह क्रम जारी रहा। जीवन पर्यन्त. पं मनु शर्मा में मुझे हमेशा एक सिसिफस नजर आया। उनके सारे लेखन और सभी उपन्यासों में मुझे सिसिफस की पीड़ा और छटपटाहट नजर आती है। निरन्तर, अनथक, बेपरवाह और यश की कामना के बिना वे भारतीय संस्कृति से जुड़े हर नायक पर लिखते चले गए। कथा दर कथा, उपन्यास दर उपन्यास। वे मिथक में कल्पना के रंग घोलकर इतिहास को जीवन्त कर देते। ऐतिहासिकता और परम्परा के प्रति आस्था उनके डीएनए में था।

इतिहास को फिर से लिखना एक जटिल प्रक्रिया से गुजरना है। कथाकार मनु शर्मा ने अपनी विशिष्ठ शैली में इस प्राचीन कथ्यात्मक विधा को नया जीवन दिया। क्लासिकल युग में रचे गए महाकाव्यों के नायक नायिकाओं के समग्र जीवन को उन्होंने नए ढंग से परिभाषित किया। पौराणिक पात्रों को इस कलयुग में नया जीवन दिया। एक नई पहचान दी. आज की आंखों से उस युग को देखा। पूरी रोचकता और चित्रात्मकता के साथ।

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वे एक सजग, संवेदनशील और चिंतक नागरिक थे. धर्म, राजनीति, साहित्य और दर्शन के विषयों में उनकी खासी रुचि रही। विचारों में मौलिकता उनकी पहचान थी। पौराणिक पात्रों के मनोविज्ञान को उन्होंने बखूबी समझा। यही सब विशिष्टताएं उन्हें एक सफल साहित्यकार, सहज व्यंग्यकार और चर्चित उपन्यासकार बनाती हैं। देश की आजादी की पूरी लड़ाई उन्होंने अपनी किशोर नजरों से देखी। इसी अनुभव की पृष्ठभूमि पर तीन उपन्यासों की श्रृंखला, ‘घरौंदा’, ‘समय साक्षी है’ और ‘विभाजित सवेरा’ है। यह उपन्यास 1930 से शुरु होकर 15 अगस्त 1947 की आधी रात तक की कहानी कहता है। किन सपनों से आजादी की लड़ाई लड़ी गई, क्या वह मिली? आजाद भारत का सपना, अंग्रेजों का अत्याचारी कुशासन और सांप्रदायिक दंगे। यह श्रृंखला इतिहास भी है और उपन्यास भी। यह उपन्यास स्वंतत्रता आंदोलन की बारीकियों को बनारसी नजर से पेश करता है। आधी सदी के इस महाव्याखान में अनुभूति की सघनता, आत्मीयता और भावुकता के साथ विभाजन का दंश भी है। आजादी की मरीचिका और फिर उसके बाद के खौफनाक सच से परिचय कराते हैं ये उपन्यास। उनकी कृतियों का पहला पाठक मैं ही होता था। या यू कहें, कि प्रूफ रीडर। पिता जी ने कभी दिल्ली की परवाह नहीं की। प्रचार से दूर रहें। उन्हें दिल्ली भाती नहीं थी। इसलिए साहित्य की राजनीति में वे ‘डाउन प्ले’ हुए। बनारस से बाहर जाना उन्हें पसंद नहीं था। बनारस उनकी रगो में बसता था। वे उसे छोड़ दिल्ली आना नहीं चाहते थे। उनका कहना था कि इस उम्र में कौन काशी छोड़ता है। उनके इस हठ की एक वजह यह थी कि बनारस का एक ख़ास किस्म का आर्गेनिक चरित्र है। कोई वहां कुछ दिन रह ले तो उसकी जड़ें उग आती हैं। यही जड़ें उसे बनारस नहीं छोड़ने देतीं। इसीलिए बनारस एक बुरी आदत-सा व्यक्ति को छोड़ता नहीं। फिर दिल्ली से बनारस की क्या तुलना। एक ओर सदियों से सिकुड़ती-फैलती, बनती-बिगड़ती, उजड़ती-बसती दिल्ली। और दूसरी तरफ धर्म,परम्परा और संस्कृति की अनादि अनंत श्रृंखला। जिसका न कभी इतिहास बदला न भूगोल।

दिल्ली को पिताजी एक सराय मानते थे। दुनिया का सबसे बड़ा ट्रांजिट कैम्प. जहां लोग लगातार आते और जाते रहते हैं। वे बताते थे कि डॉ. लोहिया दिल्ली को भारतीय इतिहास की शाश्वत नगरवधू कहा करते थे। डॉ. लोहिया और पिताजी का जन्म अकबरपुर के शहज़ादपुर कस्बे में कोई सौ गज की दूरी में ही हुआ था।दोनों मानते हैं कि दिल्ली ना किसी की रही है ना किसी की होगी। इसका अपना एक बेवफ़ा चरित्र है। मुकाबले में अपने बनारस की आत्मीयता और अड्डेबाज़ी का जवाब नहीं। जहां जुलाहे में भी ब्रह्मज्ञान जागा था। शायद इसीलिए तुलसी ने भी यहीं तन त्यागा था।

पिता जी को गए सात साल हो गए। पर मुझे कभी नहीं लगा की वे मेरे साथ नहीं हैं। लिखने पढ़ने बोलने बतियाने में वे हमेशा साथ रहे। मशहूर शायर निदा फाजली का लिखा मैं जी रहा हूं, “मैं जब भी लिखने के लिए कलम काग़ज़ उठाता हूँ, उन्हें बैठा हुआ अपनी ही कुर्सी पे पाता हूँ। तुम्हारे हाथ मेरी उँगलियों में साँस लेते हैं”। मैनें अपने भीतर उन्हें बहुत संभालकर, और सहेजकर रखा हुआ है। वे अक्सर मेरी तेज चलती सांसों में ठहरकर मुझसे बातें करते हैं। मैने वो क़लम बहुत संभाल के रक्खी है जो पिता जी प्रयोग किया करते थे। मेरे अध्ययन कक्ष में टंगी उनकी शेरवानी, घड़ी, छड़ी, चश्मा सब मुझसे बातें करते हैं। वे कभी कभी अल्बम से दबे पांव बाहर आ मुझे रास्ता दिखाते हैं।

अपने आलोक कहते हैं, “घर की बुनियादें, दीवारें, बामो-दर थे बाबू जी। सबको बांधे रखने वाला ख़ास हुनर थे बाबू जी। भीतर से ख़ालिस जज़्बाती और ऊपर से ठेठ पिता… अलग अनूठा अनबूझा-सा एक तेवर थे बाबू जी”। सिर्फ़ आलोक ही नहीं, मित्र यश मालवीय भी लगता है पापा के बारे में ही लिख रहे हैं, “तुम छत से छाए, ज़मीन से बिछे, खड़े दीवारों से, तुम घर के आँगन, बादल से घिरे, रहे बौछारों से। तुम अल्बम से दबे पांव जब बाहर आते हो, कमरे कमरे अब भी अपने गीत गुंजाते हो. तुम बंसत होकर प्राणों में बसे, लड़े पतझारों से। तुम ही चित्रों से, फ़्रेमों में जड़े, लदे हो हारों से। यदा कदा वो डांट तुम्हारी मीठी-मीठी सी. घोर शीत में जग जाती है, याद अंगीठी सी। तुम्हीं हवाओं में खिड़की से हिले, बहे रसधारों से। तुम ही फूले हो, ओंठो पर खिले कचनारों से”।

पिता शाश्वत होते हैं। सदैव रहते हैं। यह जीवन का सत्य है। मृत्यु की तरह।. मृत्यु को आना है। वह आती है किंतु वह पिता को आपसे अलग नहीं कर सकती। दुनिया में सबसे शक्तिशाली मानी जाने वाली मृत्यु भी पितृत्व की चौखट पर घुटने टेक देती है। हार जाती है। पिता हर स्थितियों में साथ होते हैं। कभी संतान के लिए ख़ुद की शक्ल में, तो कभी संतान के लिए संतान की शक्ल में। वे कहीं नहीं जाते- “धड़कते साँस लेते रुकते-चलते, मैंने देखा है, कोई तो है जिसे अपने में पलते मैंने देखा है”। अब उन्हे मैं अपने बच्चों में पलते देख रहा हूँ।

संस्कृत में कहते है- ‘य: पाति स पिता’ अर्थात जो रक्षा करता है वह पिता है। माता के बाद संसार में यदि कोई वंदनीय है तो वह है पिता। साम ब्राह्मण में कहा गया है- हे पुत्र! तू अंग-अंग से उत्पन्न हुए तेज और हृदय से उत्पन्न हुआ है, इसलिए तू मेरी आत्मा है। वह उसके सौ वर्ष तक जीवित रहने की कामना करता है। वह पुत्र को प्राप्त करके अपने को धन्य समझता है और उसे अपना प्रतिनिधि मानता है।

ऋग्वेद पृथ्वी को माता और आकाश को पिता कहता है। ऋग्वेद के सुंदर मंत्र (6.70.5-6) में माता पृथ्वी व पिता आकाश की स्तुति है। कहते हैं, “मधुनो द्यावा पृथ्वी मिमिक्षितां मधुश्रुचुता मधु दुधे मधुव्रते. द्योश्च पृथ्वी च पिन्वतां पिता माता”। मतलब माता पृथ्वी व पिता आकाश हमारे जीवन को मधुरस और मधुव्रत से भर दें। ऋग्वेद के एक अन्य मंत्र (7.101.3) में भी आकाश पिता हैं।

ऋग्वेद पिता और पुत्र के संबंधों को महत्वपूर्ण बताता है- स नः पितेव सूनवे स्वस्तये भव (1.1.9) – जिस प्रकार पिता पुत्र का कल्याण की कामना करता है, वैसे ही अग्नि हमारा ध्यान रखे। एक अन्य मंत्र कहा गया है- आहिष्मा॑ सू॒नवे॑ पि॒तापिर्यज॑त्या॒पये॑, सखा॒ सख्ये॒ वरे॑ण्यः(1.26.3)- अर्थात् अग्नि हमारी सहायता वैसे ही करे जैसे पिता पुत्र की करता है, बंधु बंधु की करता है, सखा सखा की करता है।

महाभारत के वनपर्व में यक्ष-युधिष्ठिर संवाद में भी माता व पिता के विषय में प्रश्नोत्तर हुए हैं जिसमें यक्ष युधिष्ठिर से प्रश्न करते हैं कि ‘का स्विद् गुरुतरा भूमेः स्विदुच्चतरं च खात्. किं स्विच्छीघ्रतरं वायोः किं स्विद् बहुतरं तृणात्’। अर्थात् पृथिवी से भारी क्या है? आकाश से ऊंचा क्या है? वायु से भी तीव्र चलनेवाला क्या है? और तृणों से भी असंख्य (असीम-विस्तृत) एवं अनन्त क्या है? इसके उत्तर में युधिष्ठिर ने यक्ष को बताया कि ‘माता गुरुतरा भूमेः पिता चोच्चतरं च खात्. मनः शीघ्रतरं वाताच्चिन्ता बहुतरी तृणात्’। अर्थात् माता पृथ्वी से भारी है। पिता आकाश से भी ऊंचा है। मन वायु से भी अधिक तीव्रगामी है और चिन्ता तिनकों से भी अधिक विस्तृत एवं अनन्त है।

वाल्मीकि रामायण में कहा गया है –
“ज्येष्ठो भ्राता पिता वापि यश्च विद्यां प्रयच्छति।
त्रयस्ते पितरो ज्ञेया धर्मे च पथि वर्तिनः॥”
(किष्किन्धा काण्ड)
यानी बडा भाई, पिता और अन्य जो कोई विद्या देता है, वह गुरु है- ये तीनों धर्म मार्ग पर स्थित रहने वाले पुरुषों के लिए पिता के तुल्य माननीय हैं।

महाभारत (266/21) में ‘पिता’ की महिमा का बखान करते हुए कहा गया है:
पिता धर्मः पिता स्वर्गः पिता हि परम तपः.
पितरि प्रितिमापन्ने सर्वाः प्रीयन्ति देवताः

मतलब- ‘पिता’ ही धर्म है, ‘पिता’ स्वर्ग है और पिता ही सबसे श्रेष्ठ तपस्या है। ‘पिता’ के प्रसन्न हो जाने से सभी देवता प्रसन्न हो जाते हैं। इसके साथ ही कहा गया है कि ‘पितु र्हि वचनं कुर्वन न कन्श्चितनाम हीयते’ अर्थात ‘पिता’ के वचन का पालन करने वाला दीन-हीन नहीं होता।

पिता जी अपना जन्मदिन नहीं मनाते थे। वे दादी के चार बच्चों के बाद पहले जीवित बेटे थे। इसलिए दादी किसी टोटके के चलते उनका जन्म दिन नहीं मनाती थी। यह सिलसिला बरसों चलता रहा। बाद में जब शरद पूर्णिमा को पुरू पैदा हुए तबसे पापा अपना जन्मदिन शरद पूर्णिमा को मनाने लगे। घर में उत्सव होने लगा। इसलिए शरद पूर्णिमा से अपना तीन पीढ़ी का रिश्ता बन गया।

बनारस से कोई 135 किलोमीटर दूर अकबरपुर। उस वक्त फैजाबाद जिले की एक तहसील। अकबरपुर से टोंस नदी पार करने के बाद का कस्बा शहजादपुर। शहजादपुर जुलाहों, राजभरों और दलितों का मोहल्ला था। सिर्फ थोड़े से घर ब्राह्मणों और खत्रियों के थे। बात1928 की शरद पूर्णिमा की है। पं. बालगोविन्द उपाध्याय को यह सूचना दी गयी कि उन्हें पौत्र पैदा हुआ है। बालगोविन्द उपाध्याय के चार बेटे थे। विश्वनाथ उपाध्याय, रघुनाथ प्रसाद शर्मा, सरयू प्रसाद उपाध्याय और बटुक प्रसाद उपाध्याय। रघुनाथ प्रसाद उपाध्याय आर्य समाज के प्रभाव से रघुनाथ प्रसाद शर्मा हो गए थे। वे अकबरपुर में आर्य समाज के संस्थापकों में एक थे।

किवदंती थी की शहज़ादपुर के उस हिस्से में वंश परम्परा आगे नहीं बढ़ती। इसलिए डॉ लोहिया को उनके पिता कोलकाता ले गए। मेरी दादी के चार बच्चे भी पिता जी से पहले काल कलवित हुए। जन्म लेते ही पिता जी को चेचक हुई। महामारी फैली थी। परेशान हैरान दादी उन्हें मालगाड़ी में लेकर बनारस आ गयी। क्योंकि चेचक के रोगी को तब सवारी गाड़ी में चढ़ने नहीं देते थे। दादी का मायका बनारस में था। अपने नाना जी के यहां उनका पालन पोषण शुरू हुआ। पर विपदा चौतरफा आती है। यकायक नाना जी चले गए।

नाना जी की मृत्यु के बाद 5 भाई बहनों का यह परिवार फिर सड़क पर आ गया रघुनाथ प्रसाद शर्मा जी आर्य समाज, हिन्दी आन्दोलन, स्वराज आन्दोलनों में सक्रिय रहते थे। उनका परिवार की देखभाल से कोई खास मतलब नहीं था। हिन्दी आन्दोलन में वे लाहौर जेल में बंद रहे। परिवार की गाड़ी फिर पटरी से उतर गयी। पूरे परिवार की जिम्मेदारी बड़े बेटे मन्नू पर आ गयी। गरीबी और अभाव भरे बचपन में ही परिवार चलाने की जिम्मेदारी नई चुनौती थी। इसके चलते कबीरचौरा मिडिल स्कूल से आठवीं पास करने के बाद मन्नू की पढ़ाई छूट गयी। पैसा कमाने के लिए वे कभी मूंगफली बेचते तो कभी फुटपाथ पर बैठ गमछा बेचते। कपड़े की दुकान पर सिलाई भी की। इसीलिए आठवीं के बाद सारी पढ़ाई ‘प्राइवेट’ की। दिन में फुटपाथ पर दुकान लगाते और रात को पढ़ते। भाग्य ने फुटपाथ पर ही पलटा खाया। गमछे की दुकान पर ही बेढब जैसा गुरू मिला। उन्होंने ही अक्षरपथ पर चलना सिखाया। कृष्णदेव प्रसाद गौड़ बेढब बनारसी बनारस के रईस बुद्धिजीवी थे। कवि, लेखक, व्यंगकार, गोष्ठीबाज, और डीएवी कालेज के प्रिंसिपल के साथ ही गहरे दोस्तबाज थे। उनकी आवभगत ने उनके घर को साहित्य का केन्द्र बना दिया था। बेढब जी पारखी थे। उन्होंने ‘मन्नू’ को फुटपाथ से उठाया, और झाड़ पोंछकर अपने टेबल पर पेपरवेट सा सजा लिया। बेढब जी हास्य गद्य के पहले लेखक थे। डीएवी कालेज के प्रिंसिपल थे। बेढब जी ‘मन्नू’ को अपने घर ले गए। कुछ लिखने को दिया। लेखन प्रतिभा देख मन्नू को अपने लेखन के लिए रिसर्च में लगाया। बेढब जी ने अपनी लाइब्रेरी सहजने का काम भी मन्नू को दिया। मशविरा दिया कि अब गमछा बेचना बंद करो। लिखना पढ़ना शुरू करो। जिसकी तुम्हारे भीतर प्रतिभा है। उन्होंने कहा- मैं कालेज में तुम्हें अध्यापक तो नहीं बना सकता क्योंकि यह अख्तियार प्रबन्ध समिति को है पर मैं तुम्हें चतुर्थ श्रेणी में रख सकता हूं। जीवन का यह निर्णायक मौका था। गुलाम भारत में मनु शर्मा डीएवी कालेज में चपरासी बने। लेकिन बेढब जी ने उनसे काम लाइब्रेरी में ‘बुक लिफ्टर’ का लिया। भाग्य ने उन्हें यह मौका दिया था ज्ञान के सागर में गोता लगाने का। इस अवसर को उन्होंने उपलब्धि में तब्दील कर दिया। डीएवी कालेज में कोई लाइब्रेरियन नहीं था इसलिए लोगों ने धोखे में उन्हें ही लाइब्रेरियन समझा। फिर क्या था, शर्मा जी लाइब्रेरी में किताबों की दुनियां में डूबने उतराने लगे। वह सब पढ़ गए जिस पर बाद में उन्होंने लिखा। लेखन का पौराणिक रुख कैसे हुआ। इस पर भी एक किस्सा है।

1950 के बाद चक्रवर्ती राजगोपालाचारी भारत सरकार में मंत्री बने। बनारस के गांधीवादी नेता टीएन सिंह उनसे मिलने गए। साथ में पिता जी को ले गए। टीएन सिंह पिता जी को बेढब जी जैसा ही स्नेह करते थे। टीएन सिंह बाद में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और पश्चिम बंगाल के राज्यपाल भी बने। टीएन सिंह ने पिता जी का राजगोपालाचारी से परिचय कराया- यह बालक प्रतिभावान है। डीएवी कालेज की लाइब्रेरी में काम करता है। राजगोपालाचारी चौकें, कहा ‘तब तो खूब पढ़ते होगे। काले चश्मे के भीतर से झांकती उनकी आंखों ने पूछा रामायण, महाभारत पढ़ी है? घबड़ाहट में पिता जी ने जवाब दिया “जी, महाभारत पर लिखी आपकी कमेंटरी पढ़ी है।” राजगोपालाचारी गम्भीर आवाज में बोले, “मैं अपनी किताबें पढ़ने के लिए नहीं कह रहा। व्यास की महाभारत पढ़ी है या नहीं?” पिताजी का उत्तर ना में था। राजगोपालाचारी बोले, “जिसने महाभारत नहीं पढ़ी उसने कुछ नहीं पढ़ा।” बस वही क्षण था जब महाभारत और उस पर लिखी सारी टीकाएं उन्होंने पढ़नी शुरु कर दी। उन्होंने उसी वक्त एक अमेरिकन सीरिज भी पढ़ी ‘लिविंग बायोग्राफी ऑफ ग्रेट लीडर’। पिताजी कहते थे कि इस सीरिज से ही उन्होंने ‘कृष्ण की आत्मकथा’ की शैली तय की।

बचपन में मैंने सुना था घर में ‘महाभारत’ नहीं रखते। मेरे घर में महाभारत के सभी संस्करण थे। महाभारत ही नहीं महाभारत पर सारे रिसर्च भी।. महाभारत पर लिखने से पहले उन्होंने महाभारत के सारे कन्ट्रोवर्शियल संर्दभों को समझा। भागवत पुराण, हरिवंश पुराण, विष्णु पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण जैसी पुस्तकें उनकी आधार पुस्तके थीं। सुखमय महाचार्य की महाभारत कालीन समाज, इरावती कर्वे का युगान्त, सातवलेकर का महाभारत, प्रो. काणे का धर्मशास्त्र, भरत का नाट्य शास्त्र आदि। यानी उन्होंने पौराणिक उपन्यासों को लिखने से पहले महाभारत कालीन समाज,उसकी सामाजिक व्यवस्था, भूगोल, ज्योतिष, आयुर्वेद, संगीत और नृत्य के ग्रन्थों का विशद अध्ययन किया। शायद इसीलिए वे महाभारत कालीन पात्रों की उम्र का भी निर्धारण कर गए। सबसे ज्यादा मेहनत करनी पड़ी गांधारी पर क्योंकि अन्धों के मनोविज्ञान पर तो बहुत लिखा गया पर जिसने दुनियां देखी हो, फूल, तितली, इन्द्रधनुषों की अनुभूति की हो लेकिन बाद में उसने अन्धत्व ओढ़ लिया, इस ओढ़े हुए अंधत्व की मनोदशा पर कैसे लिखा जाय? यह चुनौती थी। इसके लिए उन्होंने डेनमार्क से एक चश्मा मंगवाया। इसे उत्तरी ध्रुव के लोग बर्फ से मुकाबला करने के लिए पहनते हैं। इस चश्मे से उन्हें बीच उम्र में रोशनी जाने और उसकी मनोदशा को समझने में मदद मिली।

कृष्ण के लिए उन्होंने नृत्य और संगीत की भी पढ़ाई की। भरत नाट्यम की पहली मुद्रा होती है प्रणाम। फिर कृष्ण जब पहली मुद्रा बनाते तो उन्हें सिखाने वाला गंधर्व सामने से क्यों हट जाता। इसे समझने के लिए नृत्य शास्त्र में पारंगत होना जरूरी था। महाभारत में कई प्रसंग ऐसे हैं जिन्हें ज्योतिष पढ़े बिना नहीं समझा जा सकता है। जैसे युधिष्ठिर का जन्म जेष्ठा नक्षत्र के चन्द्रमा के तुला के सूर्य में हुआ था। ऐसा जातक चक्रवर्ती राजा भी होता है और उसे भीख भी मांगना पड़ सकता है. उसे नीच भंग राजयोग कहते हैं।

कृष्ण ने उन्हें प्रतिष्ठा दिलायी, पहचान दी,सम्मान दिलाया, नाम हुआ, सम्पन्नता भी बक्सी। एक बुक लिफ्टर से ख्यात साहित्यकार तक का सफर पूरा कराया। तमाम बड़े सम्मान और विशाल पाठक वर्ग मिला। वे हमारे लिए मिसाल तो हैं ही, मशाल भी हैं। कभी उन्हें कोई मलाल नहीं रहा।. वे कहते थे “आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों, नहीं तो बरसों बाद में डायनासोर के जीवाश्म की तरह पढ़ा जाऊंगा।”

साभार हेमंत शर्मा जी के फेसबुक वॉल से।

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TAGGED: 15 अगस्त 1947, भारत सरकार, मनुवादी, वाल्मीकि रामायण, स्वराज आन्दोलन
Courtesy Desk October 28, 2024
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