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डंके की चोट पे कहती हूँ, हाँ मैं मराठा हूँ, उखाड़ो, मेरा क्या उखाड़ोगे

तो युद्ध दोनों ओर से खुल गया। एक तरफ तेज़ तर्रार पहाड़ी कंगना रनौत हैं तो दूसरी ओर खड़ी है महाराष्ट्र की मगरूर सरकार। ये कॉम्बिनेशन किसी बॉलीवुड की फिल्म की तरह है, जिसमे एक वीरांगना राज्य के अहंकारी मुख्यमंत्री को चुनौती दे रही है। वैसे तो ये समर तय था, बस बारूद लगाने की देर थी और वह चिंगारी शिवसेना के संजय राउत ने फूंक दी। उस चिंगारी को भड़काने का काम महाराष्ट्र के गृहमंत्री अनिल देशमुख ने कर दिया। पहले ही महाराष्ट्र सरकार सुशांत सिंह राजपूत प्रकरण को लेकर जूझ रही थी कि उद्धव ठाकरे के सिपहसालार की जुबान फिल्म उद्योग की दबंग पहाड़ी कन्या के सामने फिसल गई। अलोकप्रियता के शिखर पर विराजमान ये सरकार अपने लिए नित नए गड्ढे खोद रही है। कंगना के संवैधानिक अधिकार को चुनौती देकर उन्होंने अपनी बिगड़ती लोकप्रियता को संभालने के बजाय खाई में धक्का देकर गिरा दिया है।

पहाड़ी कन्या कंगना बेबाक हैं। उनकी निर्भिकता और बात कहने के साहस ने उन्हें आम जनमानस में बहुत लोकप्रिय बना दिया है। वे आज इतनी ख्याति पा चुकी हैं कि इस समय राजनीति की चौसर पर बेझिझक कदम रख सकती है लेकिन इस दोधारी तलवार को म्यान में रखने का साहस भी तो चाहिए।

उनके भीतर एक ज्वालामुखी धधक रहा था। कई वर्षों से संचित पीड़ा का लावा अर्नब गोस्वामी को दिए इंटरव्यू में फूट पड़ा। इस लावे को दबाए रखने का उनका कोई इरादा भी नहीं था। और अब कंगना माउंट फूजी का ज्वालामुखी बन गई हैं, जो सैकड़ों वर्ष बाद फट पड़ा है। सुशांत की संदिग्ध हत्या के दुःख ने उनको उद्वेलित कर दिया था।

और अब राज्य के मुख्यमंत्री के नग्न बेशर्म बयान के बाद वे खुलकर इस सरकार के खिलाफ उतर आई हैं। महाराष्ट्र सरकार को चलाने वालों में इस राजनीतिक दृष्टि का नितांत अभाव दिखाई देता है कि जब आप चारों ओर से घिरे हो तो विनम्रता का छाता खोलने में ही भलाई है।

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हिमाचल प्रदेश के मंडी के छोटे से गांव सूरजपुर की जन्मी इस क्षत्रिय कन्या के पीछे आज सारा राष्ट्र खड़ा हो गया है। इस असीम लोकप्रियता को पाने के लिए उन्होंने बहुत कुछ खो दिया है। उनके विज्ञापनों की कमाई छिन गई क्योंकि वे बेबाकी से इंडस्ट्री के गंदेपन को उंघाड़ती रहीं।

उनसे इस कदर भेदभाव किया गया कि फिल्म इंडस्ट्री के बहुत से निर्देशक उन्हें काम देने से कतराने लगे। सुशांत और दिशा की मौत के बाद कंगना को डर था कि उनके साथ भी ऐसा कुछ किया जा सकता है, सो उन्हें मुंबई छोड़ मनाली जाना पड़ा। इतना कुछ खोने का साहस इंडस्ट्री में किसी कलाकार ने नहीं दिखाया है।

यहाँ तक कि इंडस्ट्री के महानायक सुशांत प्रकरण पर सिर्फ इसलिए नहीं बोले क्योंकि प्रकरण की मुख्य संदिग्ध उनके साथ अगली फिल्म में दिखाई देने वाली थी। जाहिर है इंडस्ट्री में व्यावसायिक हित सर्वोपरि होते हैं।

महाराष्ट्र के गृहमंत्री अनिल देखमुख कहते हैं ‘कंगना को महाराष्ट्र में रहने का अधिकार नहीं है’। ये कहने का अधिकार उनको कौन देता है। अनिल देशमुख एक युवा सितारे की हत्या में संदिग्ध एक अभिनेत्री को सुरक्षा देने के लिए चार वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भेजते हैं और दूसरी तरफ फिल्म उद्योग की एक प्रतिभाशाली अभिनेत्री को कहते हैं कि वह राज्य में नहीं रह सकती।

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कंगना के पोस्टर पर चप्पलें मारी जा रही है। जैसा कि मैंने लिखा ये सरकार गलती पर गलती करती जा रही है। पहले सुशांत केस सीबीआई को सौंपने पर अड़ियलपन दिखाया गया। बिहार के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को क्वारंटीन किया गया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कमियों का जिम्मेदार भी इसी सरकार को माना जा रहा है।

मुंबई की सड़कों पर ‘वॉक ऑफ़ शेम’ के द्वारा कंगना, संवित पात्रा, सुधीर चौधरी, अर्नब गोस्वामी को अपमानित किया गया। मुंबई के नागरिक विश्व के आदर्श नागरिकों में माने जाते हैं लेकिन इस सरकार ने उनके सम्मान का मान नहीं रखा। कर्मठ मुंबई पुलिस को निजी हितों के लिए इस्तेमाल किया गया।

संजय राउत और अनिल देशमुख के पटाखों का जवाब कंगना ने मिसाइल दागकर दिया है। उन्होंने लिखा किसी के बाप का नहीं है महाराष्ट्र, महाराष्ट्र उसी का है, जिसने मराठी गौरव को प्रतिष्ठित किया है। और मैं डंके की चोट पे कहती हूँ, हाँ मैं मराठा हूँ, उखाड़ो, मेरा क्या उखाड़ोगे। राजपूताना  उबल पड़ा है।

कंगना ने चुनौती दी है कि वें 9 सितंबर को मुंबई आ रही हैं। महाबली के अखाड़े में उसको चुनौती देने की पहल कंगना ने कर डाली है। इसके बाद क्या होगा इसकी कल्पना ही की जा सकती है। महासमर में तलवारें म्यान से बाहर निकल आई हैं। उधर सुशांत के हत्यारों की ओर जाँच एजेंसियों के कदम मजबूती से बढ़ते जा रहे हैं।

राष्ट्र महाराष्ट्र की सरकार से दो निर्दोष लोगों की मौत का हिसाब मांग रहा है और हिसाब देने के बजाय सरकार एक संदिग्ध को बचाने का काम कर रही है। ऐसे में कंगना प्रकरण को तूल देना इस सरकार की सेहत के लिए खतरनाक हो सकता है क्योंकि इस राजपूताना तलवार की  मुठ शेष राष्ट्र के हाथ में है।

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Vipul Rege

Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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