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मायावती-अखिलेश के समय चले इसलामिया स्कूलों को योगी ने किया दुरुस्त, सेक्युलरों और वामियों की नजर में यही है लिंचिंग!

मुसलिम तुष्टीकरण का प्रभाव कितना खतरनाक हो सकता है इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि यूपी में कई सरकारी स्कूलों के नाम बदलकर इसलामिया कर दिया गया। इतना ही नहीं इन स्कूलों में पूरी इसलामिक पद्दति से पढ़ाई होती थी और भाषा भी उर्दू कर दी गई थी। इतना ही नहीं इसलामिक पद्दति के अनुरूप स्कूल की छुट्टी भी रविवार की जगह शुक्रवार (जुम्मे) के दिन कर दी गई थी। यूपी में अलग से इसलामिक पद्धति की शुरुआत मायावती के शासनकाल से बताया जा रहा है। अब जब मामला योगी सरकार के संज्ञान में आया है तो प्रशासन सारे स्कूलों पर सख्ती कर उसे दुरुस्त कर रहा है। देश के सेक्युलर और वामी ब्रिगेड इसे ही लिंचिंग कहते हैं। हो न हो कल से ये लोग फिर हल्ला करना शुरू कर सकते हैं कि उत्तर प्रदेश में योगी सरकार मुसलमानों पर जुल्म ढा रही है। सवाल उठता है कि मुसलमानों की इस करतूत पर अभी तक किसी सेक्युलर पत्रकार की नजर क्यों नहीं गई?

मुख्य बिंदु

* रविवार की बजाय शुक्रवार को होती थी छुट्टी, इसलामिक पद्धति से होती थी पढ़ाई, भाषा भी हो गई थी उर्दू

* मायावती और अखिलेश के शासनकाल में उत्तर प्रदेश के कुछ स्कूल निकल पड़े थे इसलामिक राह पर

इस मामले में जब देवरिया स्थित नुरूपूर सरकारी स्कूल के प्रधानाध्यापक से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि इस स्कूल में उनकी नियुक्ति 2008 में हुई थी, लेकिन रविवार की बजाय शुक्रवार को स्कूल में छुट्टी होने, उर्दू भाषा में काम होने तथा इसलामिक पद्दति से पढ़ाने का काम उनके आने के पहले से हो रहा था। इसका मतलब साफ है कि प्राथमिक स्कूलों को इसलामिक आचरण से चलाने का खेल मायावती के शासनकाल से शुरू होकर पूर्व मुख्यमंत्री तथा सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के कार्यकाल तक बेरोक-टोक चलता रहा है। यह तो स्पष्ट है कि ऐसा काम बिना शासन और प्रशासन की मिलीभगत से चल ही नहीं सकता। अब सवाल उठता है कि आखिर इन दोनों पूर्ववर्ती सरकारों की मंशा क्या थी? जिस प्रकार बसपा और सपा मुसलमानों के वोट हासिल करने के लिए किसी हद तक जाने को आतुर दिखते हैं उसे देखकर तो यही लगता है कि इन्हीं दोनों की सरकारों ने मुसलमानों के तुष्टिकरण के तहत अपने मजहब के हिसाब से स्कूल संचालित करने की इजाजत दी है।

कितनी कमाल की बात है कि बसपा और सपा जैसी पार्टियों के लिए देश नहीं वोट महत्वपूर्ण है। अपने वोट के लिए मायावती और अखिलेश यादव प्रदेश और देश को दांव पर लगाने से भी नहीं चूकेंगे। उन्होंने पहले जातियों में बांटा और अब दो समुदायों के बीच में खाई चौड़ी करने पर तुले हैं। इन लोगों का ध्येय भी एक ही है कि प्रदेश का बेड़ा गर्क हो तो हो, लेकिन मुसलमानों के वोट बैंक पर कोई आपत्ति नहीं आनी चाहिए।

गौरतलब है कि कई वर्षों से उत्तर प्रदेश के देवरिया और महाराजगंज जिले के कई सरकारी स्कूलों का नाम बदलकर इसलामिया कर दिया गया। यहां पढ़ाई-लिखाई से लेकर सारे काम इसलामिक पद्धति से होते थे। इन स्कूलों में शिक्षा-शिक्षण की भाषा भी उर्दू कर दी गई थी। तथा स्कूलों की साप्ताहिक छुट्टी रविवार की बजाए शुक्रवार कर दी गई थी। सालों से चली आ रही इस इसलामिक व्यवस्था को न पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने बदलने का प्रयास किया न ही अखिलेश सरकार ने। नहीं तो ऐसे कैसे हो सकता है कि कोई सरकारी स्कूल सरकारी आदेश के खिलाफ जाकर मजहबी कानून लागू करे।

अगर योगी सरकार ने इसलामिक कानून से चलने वाले स्कूलों के खिलाफ कार्रवाई की है तो जांच के बाद इसका भी खुलासा करना चाहिए कि इन प्राथमिक स्कूलों को इसलामिया बनाया किसने? आखिर किसके आदेश पर रविवार की बजाए शुक्रवार को स्कूल बंद होने लगा? स्थानीय लोगों ने कई बार स्कूलों की शिकायत की लेकिन कहीं उनकी सुनवाई नहीं हुई। इससे भी स्पष्ट होता है कि इस प्रकार का निर्णय स्थानीय स्तर पर नहीं लिया गया होगा। निश्चित रूप से इस प्रकार का निर्णय ऊपर से लिया होगा।

URL: Yogi government takes action against primary school who converted into an Islamic institution

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