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आप समृद्ध दक्षिण भारतीय सिनेमा का मुकाबला केवल कंटेंट से ही कर सकते हैं

विपुल रेगे। दक्षिण भारत के अनुशासित फिल्म उद्योग से मुंबई के अनियंत्रित और अनुशासनहीन फिल्म उद्योग में आकर कार्य करना एक दुष्कर कार्य है। तेलुगु फिल्मों के बड़े सितारे अल्लू अर्जुन की ‘पुष्पा’ हिन्दी पट्टी में बहुत सराही जा रही है। इसके बाद समाचारों में लगातार ये कहा जा रहा है कि अल्लू अर्जुन बॉलीवुड जॉइन कर सकते हैं। यदि वे बॉलीवुड में आते हैं तो सबसे अधिक निराशा उनके हिन्दी बेल्ट के प्रशंसकों को होने वाली है। अभी से ही उनके प्रशंसक कह रहे हैं कि अल्लू को बॉलीवुड में नहीं आना चाहिए।

यदि दक्षिण भारत से मुंबई में आकर काम करने वालों का कॅरियर देखा जाए तो बहुत कम नाम मिलेंगे, जो सफल हुए हो। शुरुआती दौर में रजनीकांत (अँधा क़ानून) और चिरंजीवी ( प्रतिबंध और आज का गुंडाराज) को सफलता मिली लेकिन उसे ‘वन टाइम वंडर’ माना जा सकता है। इसके बाद इनकी फ़िल्में नहीं चली। 

नागार्जुन की ‘खुदा गवाह’ नहीं चली। मोहनलाल, मम्मूटी, सिद्धार्थ, सूर्या, राणा दुग्गाबत्ती, पृथ्वीराज और माधवन सहित जाने ऐसे कितने नाम हैं, जिनको हिन्दी पट्टी में बड़ी सफलता नहीं मिली। प्रश्न ये उठता है कि जो लोग तेलुगु , तमिल और मलयालम में ढेरो सफल फिल्म देते हैं, वे हिन्दी पट्टी में फेल क्यों हो जाते हैं। हिन्दी में शौर्यहीन हो जाने का सबसे बड़ा कारण यहाँ बनने वाली फिल्मों का कंटेंट है।

विगत बीस वर्ष से हिन्दी पट्टी में अच्छे कंटेंट का स्थान ‘स्टार सिस्टम’ ने ले लिया है। हिन्दी फिल्म उद्योग में बेनामी पैसा इंजेक्ट होता रहा है और ये संदेह है कि काले धन को फिल्मों में पैसा लगाकर सफ़ेद किया जा रहा है। जब मोहनलाल या मम्मूटी जैसा अभिनेता हिन्दी निर्देशकों के साथ कार्य करता है तो उसे दक्षिण वाला वातावरण नहीं मिलता। स्क्रिप्ट पर काम नहीं होता।

निर्देशक सोचता है कि उसे स्टार के नाम पर फिल्म चलानी है। स्टार सिस्टम पूरी फिल्म पर भारी पड़ता है। वे दक्षिण के अभिनेता के साथ कार्य करते हुए अपनी शैली बदलेंगे, ये सोचना भी मूर्खता है। यही कारण है कि दक्षिण से आए अभिनेता यहाँ अपनी पैठ नहीं जमा पाते हैं। पिछले वर्ष अल्लू अर्जुन ने एक इंटरव्यू में कहा था कि वे बॉलीवुड का हिस्सा बनना चाहते हैं।

‘पुष्पा’ हिट होने के बाद कुछ फिल्म निर्माता उनसे संपर्क में हैं किन्तु अल्लू ने अब तक कोई जवाब नहीं दिया है। ‘पुष्पा’ हिट होने के बाद बॉलीवुड के उन लोगों को चिंता हो गई है, जिन्होंने अघोषित रुप से बॉलीवुड को कब्जे में ले रखा है। अल्लू अर्जुन को हिन्दी फिल्मों का ऑफर उनके साथ एक छुपा षड्यंत्र भी हो सकता है। बॉलीवुड संसार की एकमात्र इंडस्ट्री है, जहाँ पर किसी सितारे को फ्लॉप करवाने के लिए भी एक फिल्म बनाई जा सकती है।

किसी कलाकार को गिराने के मामले में बॉलीवुड के लोगों का इतिहास रहा है। दक्षिण के एक निर्देशक बॉलीवुड आए और कुछ वर्ष में उनकी धार ही खो गई। प्रभुदेवा की बॉलीवुड में धमाकेदार एंट्री हुई थी। सलमान को लेकर उन्होंने दक्षिण भारतीय फिल्म ‘पोकिरी’ का हिन्दी रीमेक ‘वांटेड’ बनाकर तहलका मचा दिया था। इसके बाद प्रभुदेवा बॉलीवुड के ही होकर रह गए।

उन्होंने आठ हिन्दी फ़िल्में निर्देशित की लेकिन इनमे से दो ही सफलता का मुंह देख सकी। यहाँ भी प्रभुदेवा को स्टार सिस्टम के अनुरुप कार्य करना पड़ा। अल्लू अर्जुन बॉलीवुड आते हैं तो उनको ध्यान रखना होगा कि यहाँ कंटेंट का कोई मूल्य नहीं है। यहाँ सबसे पहले स्टार आता है और उसके इर्दगिर्द फिल्म बनाई जाती है। यहाँ कथा सबसे निचले दर्जे पर आती है।

‘पुष्पा’ के हिट होते ही बॉलीवुड हिल गया है। वह जानता है कि दक्षिण भारत के सिनेमा का कोई तोड़ उसके पास नहीं है। अब तो वह उनकी हिट फिल्मों पर रीमेक भी नहीं बना सकता क्योंकि दक्षिण भारतीय सिनेमा ने अपने द्वार ‘पुष्पा’ द्वारा यहाँ के लिए खोल दिए हैं। अल्लू अर्जुन को बॉलीवुड का हिस्सा बनाकर उन्हें बेकार कर देने की ट्रिक हमेशा काम नहीं आने वाली है। आप समृद्ध दक्षिण भारतीय सिनेमा का मुकाबला केवल और केवल कंटेंट से ही कर सकते हैं। और कोई उपाय है ही नहीं। 

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Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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