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युद्ध में अयोध्याः बाबरी ध्वंस से तीन दिन पहले नरसिंह राव कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त करना चाहते थे, लेकिन राज्यपाल ने ऐसा होने नहीं दिया!

आज भी कांग्रेस पार्टी, उसके समर्थक और काफी सारे लोगों को यह लगता है कि बाबरी ध्वंश कराने में तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव की मौन सहमति थी। ऐसा मानने वालों में संघ, भाजपा और हिंदू संगठनों के लोग और कार्यकर्ता भी बड़ी संख्या में हैं। लेकिन जब तथ्य पर नजर डालते हैं तो पाते हैं कि नरसिंह राव तो 6 दिसंबर 1992 से तीन दिन पहले ही कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त करना चाहते थे, लेकिन तत्कालीन राज्यपाल ने इसे होने नहीं दिया। संवैधानिक प्रावधान है कि बिना राज्यपाल की संस्तुति के केंद्र सरकार किसी राज्य में धारा-356 का प्रयोग नहीं कर सकती है।राज्यपाल भी कानून व्यवस्था बिगड़ने पर इसकी संस्तुति करता है, न कि कानून बिगड़ने की आशंका के मद्देनजर। तत्कालीन राज्यपाल ने इसे ही आधार बनाकर प्रधानमंत्री नरसिंह राव की मांग को ठुकरा दिया था। बाद में नरसिंह राव राज्यपाल से इतने नाराज हुए कि उन्होंने उनसे बातचीत ही बंद कर दी थी। ऐसे में नरसिंह राव की पूरी भूमिका को तथ्यों के आलोक में परखने के लिए वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हेमंत शर्मा की पुस्तक ‘युद्ध में अयोध्या’ को पढ़े जाने की जरूरत है।

श्रृंखला-2

बाबरी ध्वंश के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव द्वारा 17 दिसंबर को लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर दिए भाषण के मुख्य बिंदु…

1) मुझे आशा है कि छह दिसंबर को अयोध्या में हुए विश्वासघात और गुंडागर्दी को यह देश जल्दी ही भूल जाएगा। मेरी भगवावन से यही प्रार्थना है। इसकी जरा सी भी याद देश के लिए नुकसानदेह होगी। मैं सभी वर्गों से और पूरे सदन से अपील करता हूं कि वे इस शर्मनाक हादसे को भुलाने में मदद करें।

इंडिया स्पीक्स की टिप्पणी: यहां विश्वासघात, गुंडागर्दी और शर्मनाक हादसे-जैसे शब्द में छिपे निहितार्थ को समझने की जरूरत है।

2) हमारी पहली प्रतिक्रिया मसजिद बचाने की थी। हम उनसे (कल्याण सरकार से) मसजिद बचाने के लिए सुरक्षा बलों को इस्तेमाल करने के लिए कहते रहे। हम यही कर सकते थे। छह दिसंबर को रात 9.10 बजे राष्ट्रपति ने कागजों पर दस्तखत (उप्र सहित चार राज्यों में भाजपा सरकार की बर्खास्तगी को लेकर) कर दिए। शंकरराव चह्वाण (गृहमंत्री) साढ़े सात बजे कागज लेकर राष्ट्रपति (राष्ट्रपति शासन के लिए) के पास गये। उसके बाद से लगातार कार्रवाई हुई है।

इंडिया स्पीक्स की टिप्पणी: यहां संसद के अंदर विवादित ढांचे को बार-बार ‘मसजिद’ कह कर नरसिंह राव मुसलमानों से सहानुभूति बटोरने का प्रयास करते दिख रहे हैं। उनका तात्पर्य है कि वह ‘मसजिद’ बचाना चाहते थे, न कि विवादित ढांचा। साथ ही वह यह भी कह रहे हैं कि सुरक्षा बल कार्रवाई के लिए लिए भेजा था, कल्याण सरकार ने कार्रवाई नहीं होने दिया। जब से राष्ट्रपति शासन लगा यानी जब से उप्र की सत्ता केंद्र के हाथ में आयी, तब से उनकी ओर से लगातार कार्रवाई की गई।

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3) राम जहां हैं, वहीं रहने दीजिए। हम दूसरे मुद्दों पर लड़ें। मैं दूसरी पार्टियों से अपील करता हूं, जो समझ रही हैं-भाजपा के लिए-यह उनकी स्थायी जागीर है, यह नहीं होगा।….मैं चाहता हूं, यदि हम धर्मनिरपेक्ष हैं तो गुंडों को गुंडागर्दी का फायदा नहीं उठाने देना चाहिए।

इंडिया स्पीक्स की टिप्पणी: एक तरफ तो नरसिंह राव विवादित ढांचे को ‘मसजिद’ कह कर मुसलमान वोट बैंक को सहला रहे हैं, तो दूसरी तरफ ‘राम जहां हैं, वहीं रहने दीजिए’ यानी राम को टैंट में ही आजीवन रहने दीजिए की उनकी सोच को वह सदन के अंदर बड़ी ढिठाई से प्रकट कर रहे हैं, और इसे वह धर्मनिरपेक्षता का नाम भी दे रहे हैं। यह साफ-साफ हिंदुओं के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा संसद में दिया गया बयान है। यही नहीं, मंदिर आंदोलन में जो लोग संलग्न थे उन सब को वह सदन के अंदर गुंडा व उनके कृत्य को गुंडागर्दी कहते हुए अपनी धर्मनिरपेक्षता को स्थापित करने का प्रयास करते दिख रहे हैं।

हेमंत शर्मा जी की अयोध्या पर दो पुस्तकें एक साथ आयी है। ‘युद्ध में अयोध्या’ और ‘अयोध्या का चश्मदीद’। दोनों पुस्तक कुरियर/डाक से मंगवाने के लिए मोबाइल नंबर- 7827007777 पर फोन, एसएमएस, व्हाट्सअप या मिस कॉल दें।

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4) मेरी पहली प्रतिक्रया यही थी कि यह सब पूर्ण नियोजित ढंग से हुआ है। इसकी जांच हो रही है। इसलिए मैं उसके नतीजे पर कयास नहीं लगाउंगा। लेकिन यह नियोजित नहीं था। यह दुर्घटना नहीं हो सकती। भाजपा सरकार पर भरोसा करने के लिए मेरी आलोचना हुई है। राज्य सरकार पर भरोसा करने का अपराध मैं स्वीकार करता हूं। लेकिन क्या और कोई विकल्प था? जब सुप्रीम कोर्ट भी राज्य सरकार पर भरोसा कर रहा था।

इंडिया स्पीक्स की टिप्पणी: नरसिंह राव कल्याण सरकार पर आरोप लगा रहे हैं कि यह सब पूर्ण नियोजित ढंग से किया गया। जांच रिपोर्ट आने से पूर्व ही उन्होंने यह बयान देकर एक तरह से कल्याण सरकार को खलनायक साबित करने का प्रयास किया, जबकि प्रधानमंत्री के रूप में उन्हें जांच रिपोर्ट का इंतजार करना चाहिए था। दूसरी बात, वह साफ कह रहे हैं कि कल्याण सिंह की सरकार ने उन्हें भरोसा दिया था, जिसका बाबरी ध्वंश के कारण खून हुआ। तो फिर बाबरी ध्वंश में नरसिंह राव की भूमिका कैसे स्वीकार की जा सकती है?

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5) हमने अद्धसैनिक बल भेजे ताकि राज्य सरकार को जब भी जरूरत हो, उनका इस्तेमाल कर सके। राज्य सरकार ने एक बार भी नहीं कहा कि वह इन बलों का इस्तेमाल नहीं करेगी। छह दिसंबर को राज्य के गृह सचिव (जो मुख्यमंत्री के पास बैठे थे) ने कहा, जो दुर्भाग्यपूर्ण है। दोपहर 2.20 बजे आईटीबीपी के महानिदेशक ने गृहमंत्री को बताया कि तीन बटालियन जो अयोध्या की ओर रवाना हुईं, उन्हें रास्ते में रोका गया। सड़क पर अवरोध थे और लोगों ने रास्ता रोक दिया था। साकेत डिग्री कॉलेज के पास सुरक्षा बलों को फिर रोक लिया गया। हलका पथराव भी हुआ। मजिस्ट्रेट ने लिखित आदेश दिया कि वे चापस चले जाएं। सुरक्षा बल की बटालियनें लौट आईं। कमिश्नर से संपर्क किया गया तो उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री का आदेश है कि किसी भी हालत में गोली न चलाई जाए।

इंडिया स्पीक्स की टिप्पणी: नरसिंह राव साफ कह रहे हैं कि उनकी सरकार ने कमिश्नर से संपर्क किया था, लेकिन मुख्यमंत्री ने गोली न चलाने का आदेश दे रखा था। यानी नरसिंह राव सरकार कारसेवकों पर गोली चलवाने तक को तैयार थी?

6) छह दिसंबर से तीन दिन पहले राज्यपाल ने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा कि केंद्र को राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने के बारे में नहीं सोचना चाहिए। उन्होंने यह भी लिखा था कि ऐसी कोशिश हुई तो बाबरी मसजिद की सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी।

इंडिया स्पीक्स की टिप्पणी: अतः जो लोग आज तक यह आख्यान बनाते आए हैं कि नरसिंह राव ने मौन रहकर विवादित ढांचे को ढहाने में मदद की, वह स्वयं नरसिंह राव की इस स्वीकारोक्ति को पढ़ें कि वह तो 6 दिसंबर से तीन दिन पहले ही कल्याण सरकार को बर्खास्त करने का मन बना चुके थे? लेकिन राज्यपाल ने कह दिया कि इस बारे में सोचना भी नहीं चाहिए।

यहां भी नरसिंह राव ‘मसजिद’ की सुरक्षा के लिए ही चिंतित दिखे! बार-बार विवादास्पद ढांचे को देश का प्रधानमंत्री सदन में ‘मसजिद-मजसिद’ कहते रहे, लेकिन किसी बुद्धिजीवी ने इस पर सवाल नहीं उठाया कि क्यों आप एक विवादित ढांचे को ‘मसजिद’ के रूप में सदन के पटल पर स्थापित कर मुसलमानों को खुश करने का प्रयास कर रहे हैं?

सुप्रीम कोर्ट ने यह तय कर दिया कि अयोध्या मामले में सुनवाई केवल जमीन विवाद पर होगी, अन्य किसी भी चीज पर नहीं। वहीं अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए संत समाज अनशन पर बैठ चुका है। संत समाज का मानना है कि राष्ट्रपति व केंद्र सरकार से लेकर उप्र तक में भाजपा की सरकार है। ऐसे में वह यदि मंदिर निर्माण के लिए अभी भी कानूनी दांव-पेंच में उलझी रहेगी तो यह हिंदू समाज को स्वीकार्य नहीं होगा।

धधकती अयोध्या को समझने के लिए India Speaks daily वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हेमंत शर्मा की पुस्तक ‘युद्ध में अयोध्या’ शीर्षक से ही एक श्रृंखला शुरु कर रहा है, ताकि छोटे-छोटे टुकड़ों में आज की पीढ़ी अयोध्या और उससे जुड़े इतिहास, महत्वपूर्ण घटनाएं व उसके सच को जान-समझ सके। यह पूरी श्रृंखला प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हेमंतजी की पुस्तक ‘युद्ध में अयोध्या’ पर आधारित है। आजादी के बाद अयोध्या से जुड़ी पांच बड़ी घटनाओं में से चार के हेमंतजी न केवल गवाह रहे हैं, बल्कि उस दौर में जनसत्ता के लिए उसकी रिपोर्टिंग भी की है। यही नहीं, अयोध्या मसले पर बातचीत के कई पक्षों के साथ प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से हेमंत जी शामिल रहे हैं। इसलिए इस किताब के तथ्य एक तरह से अयोध्या की गवाही हैं।

क्रमशः

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नोट- यह हेमंत शर्मा जी की किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ में तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव के भाषण( पेज-419 से 421) से कुछ अंश लिए गये हैं। कल घटनाक्रम को जोड़ते हुए नरसिंह राव की भूमिका पर हेमंत शर्मा जी ने जो लिखा है, वह पाठकों के लिए प्रस्तुत किया जाएगा।

इंडिया स्पीक्स डेली युद्ध में अयोध्या पुस्तक के आधार पर इसी नाम से अयोध्या पर श्रृंखलाबद्ध तथ्य-परक खबरों का प्रकाशन कर रहा है। अन्य खबरों को पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक ओपन करें-

युद्ध में अयोध्या: बाबरी एक्शन कमेटी और इसलामपंथी-वामपंथी इतिहासकारों ने किस तरह अयोध्या मामले को उलझाने का खेल खेला, इसे एक उदाहरण से समझते हैं!

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