Movie Review पाक में भारतीय एजेंट के  वास्तविक मिशन को दिखाती है ‘मिशन मजनू’

विपुल रेगे। सत्तर के दशक में पकिस्तान चोरी-छुपे परमाणु बम बना रहा था। इसे सिद्ध करने के लिए भारत को किसी ‘फिजिकल सबूत’ की ज़रुरत थी। पाकिस्तान की धरती पर जाकर उसकी न्यूक्लियर फेसेलिटी से ऐसा प्रमाण लाना रॉ के जासूसों के लिए बड़ी चुनौती थी। सिद्धार्थ मल्होत्रा और रश्मिका मंदाना की मुख्य भूमिकाओं वाली ‘मिशन मजनू’ उस ऑपरेशन को करीब से दिखाती है। आज इतने वर्ष बाद उस बेहतरीन सीक्रेट मिशन को परदे पर देख विश्वास ही नहीं होता कि सत्तर के दशक में ये मिशन वास्तविक ढंग से पाकिस्तानी धरती पर अंजाम दिया गया था।

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निर्देशक शांतनु बागची की ‘मिशन मजनू’ एक नज़र में मनोरंजक फिल्म है। जिस उद्देश्य के लिए फिल्म को बनाया गया, उसे ये पूरा करती है, यानी दर्शक को भरपूर मनोरंजन और थ्रिल देने में सफल रहती है। फिल्म का एक उद्देश्य और है और वह ये कि युवा दर्शकों को ‘ऑपरेशन कहुटा’ के बारे में पता चले। दोनों ही उद्देश्यों में फिल्म कामयाब है। सन 1968 में रामेश्वर नाथ काओ की पहल पर रॉ का गठन हुआ था।

इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गुप्त जानकारियां एकत्रित करना था। परमाणु कार्यक्रम में भारत तेज़ी से आगे बढ़ रहा था लेकिन पाकिस्तान अब तक कुछ कर नहीं सका था। सत्तर के दशक में रॉ का नेटवर्क संपूर्ण पाकिस्तान में फ़ैल चुका था। इसी समय रॉ को सूचना मिली कि परमाणु वैज्ञानिक एम क्यू खान की मदद से पाकिस्तान रावलपिंडी के कहुटा में परमाणु परीक्षण की तैयारी कर रहा है।

इस सूचना को दुनिया के सामने लाने के लिए एक ‘फिजिकल प्रमाण’ की आवश्यकता थी और तब ही पकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव डाला जा सकता था। ‘मिशन मजनू’ इसी ऑपरेशन को मनोरंजक ढंग से दर्शक के सामने रखती है। कहानी को कुछ बदलाव के साथ फिल्म में पेश किया गया है। अमनदीप अजीतपाल सिंह अपना नाम बदलकर पाकिस्तान में रह रहा है। वह एक रॉ जासूस है और अपने बॉस के आदेश की प्रतीक्षा कर रहा है।

अमनदीप उर्फ़ तारिक अली को यहाँ एक अंधी लड़की नसरीन से प्रेम हो जाता है। तारिक नसरीन से शादी कर लेता है। इस बीच उसे भारत से ‘मिशन कहुटा’ का आदेश मिलता है। ये एक तेज़ भागती मनोरंजक फिल्म है, जिसमे देशभक्ति का फार्मूला भरपूर मिलेगा। निर्देशक ने कहानी कहने के लिए सिनेमेटिक लिबर्टी ली है, यानी कहानी में कुछ काल्पनिक तथ्य डाले हैं।

हालांकि कथा का एक बड़ा हिस्सा वास्तविक है और रॉ के जासूसों की देशभक्ति की सुंदर व्याख्या करता है। मुख्य भूमिका में सिद्धार्थ मल्होत्रा ने अपने चयन को सही सिद्ध किया है। हालाँकि वे अभिनय के बड़े तीस मार खां नहीं है लेकिन अपने कैरेक्टर को स्वाभाविक तरीके से निभाते हैं। ‘मिशन मजनू’ से उन्होंने सिद्ध किया कि वे अपने बल पर किसी फिल्म को सफलता के रास्ते पर ले जा सकते हैं।

इससे पहले उनकी ‘शेरशाह’ जबरदस्त हिट रही थी। ‘मिशन मजनू’ से उनका कॅरियर ग्राफ और ऊपर जाएगा। रश्मिका मंदाना ने पाकिस्तानी लड़की की भूमिका डूबकर निभाई है। उनकी केमेस्ट्री भी सिद्धार्थ के साथ अच्छी लगी है। शारिब हाशमी और कुमुद मिश्रा के किरदार अच्छे बिल्डअप किये गए हैं। एक्शन बढ़िया है। चलती ट्रेन में एक एक्शन सीक्वेंस बहुत जबरदस्त ढंग से फिल्माया गया है। ये सीन फिल्म की यूएसपी है।

निर्देशक ने एक रॉ जासूस की देशभक्ति के साथ एक प्रेमी का एंगल भी लिया है। एक भारतीय प्रेमी देशसेवा करता है और अपने प्रेम का उत्तरदायित्व भी नहीं भूलता, ये इस फिल्म की थीम है। फिल्म को सपरिवार देख सकते हैं। छोटे बच्चे और युवा जान सकते हैं कि पकिस्तान को परमाणु शक्ति संपन्न न बनने देने के लिए हमारे भारतीय देशभक्तों ने कैसे बलिदान दिए थे।

फिल्म की कथा वास्तविक है लेकिन उसके साथ चलती लव स्टोरी के बारे में विश्वास के साथ कहा नहीं जा सकता। संभव है सिनेमेटिक लिबर्टी के मद्देनज़र निर्देशक ने फेब्रिकेटेड तथ्य फिल्म में डाले हैं। हालांकि उससे फिल्म का मज़ा खराब नहीं होता और न इसके पेस में कोई धीमापन आता है। इस वीकेंड आप ये फिल्म परिवार के साथ देख सकते हैं। ऐसा नहीं है कि फिल्म पूरी तरह परफेक्ट है। कुछ छोटी कमियां रह गई हैं लेकिन ‘ऑपरेशन कहुटा’ के बारे में जानने के लिए ये फिल्म देखी जा सकती है।

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Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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