हिन्दू शुरू से ही बीच वाली गुंबद केनीचे पूजा करते थे: रामलला विराजमान

हिन्दू शुरू से ही बीच वाली गुंबद केनीचे पूजा करते थे: रामलला विराजमान
– हिन्दू पक्ष ने कहा कि ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि १८५८ से पहले विवादित स्थल पर मुस्लिम नमाज पढ़ते थे
– ४०वें दिन की सुनवाई
अमर उजाला ब्यूरो

नई दिल्ली। अयोध्या मामले की सुनवाई केआखिरी दिन हिन्दू पक्षकारों की ओर से कहा गया कि हिन्दू शुरू से ही विवादित स्थल के बीच वाली गुंबद केनीचे पूजा करते थे। बाद में एक रेलिंग बनाकर उसा स्थान को विभाजित कर दिया गया। हिन्दू पक्ष ने यह भी कहा कि मुस्लिम पक्ष के पास ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि विवादित स्थल पर उनका मालिकाना हक था। सुप्रीम कोर्ट ने भाजपा सांसद सुब्रह्मïणयम स्वामी को सुनने से इनकार कर दिया। स्वामी ने इस जगह पर पूजा का अधिकार मांगा था।

चीफ जस्टिस रंजन गोगई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ केसमक्ष रामलला विराजमान की ओर से पेश वरिष्ठï वकील ने कहा कि मुस्लिम पक्षकार का कहना है कि राम चबूतरा, भगवान राम का जन्मस्थान है। दरअसल एक छोटी सी जगह को विभाजित करने की कोशिश है। हिन्दू हमेशा से अंदर के गुंबद के नीचे पूजा करते रहे थे। बाद में वहां पर तमाम प्रतिबंध लगा दिए गए इस कारण हिन्दू वहां पूजा नहीं कर सके। कानून व्यवस्था का हवाला देते हुए एक रेलिंग बना दी गई।

साथ ही उन्होंने कहा कि इस बात के कोई प्रमाण नहीं है कि वहां जमीन खाली थी और मस्जिद  बनाया गया और फिर उसे वक्फ को दिया गया। मुस्लिमों केपास विवादित स्थल पर पूर्ण कब्जा कभी नहीं रहा है। उनकेपास ऐसा कोई प्रमाण नहींं है कि उनकेपास मालिकाना हक है। यह प्रमाण जरूर है कि वर्ष १८५७ से १९३४ के बीच मुस्लिम विवादित स्थल पर नमाज पढ़ते थे। लेकिन इसके बाद भी उन्होंने नमाज पढ़ा, इसका कोई प्रमाण नहीं है। लेकिन हिंदुओंं ने लगातार वहां पूजा की है इसके प्रमाण हैं।

वहीं गोपाल सिंह विशारद के बेटे की ओर से पेश वरिश्ठ वकील रंजीत कुमार ने कहा कि मैं हिन्दू हूं और धर्मग्रंथ जानता हूं। मैं कई मंदिर गया और कैलाश मानसरोवर गया। वहां शिव की पूजा होती है मूर्ति पूजा नहीं है वहां। विवादित स्थल पर हमेशा पूजा होती रही है। वहीं महंत धर्मदास और निर्वाणी अखाड़ा केवकील जयदीप गुप्ता ने कहा कि शेबियत अधिकार उनका है न कि निर्मोही अखाड़े का। निर्मोही अखाड़े की ओर से पेश वकील सुशील कुमार जैन ने कहा कि विवादित स्थल पर हमेशा से मंदिर ही रहा था और अब भी है, भले ही बाबर ने जो किया है। निर्मोही अखाड़ा के पास मंदिर के प्रबंधन का अधिकार था।
वहीं राम जन्मभूमि पुनोरुद्धा समिति की ओर से पेश वरिष्ठï वकील पीएन मिश्रा ने कहा कि मुस्लिम के पास विवादित स्थल पर पूर्ण कब्जे का कोई प्रमाण नहींं है।  उन्होंने कहा कि १९५८ से पहले विवादित जगह पर नमाज पढऩे का कोई जिक्रनहीं है लेकिन १९२८ केगजेटियर में हिन्दुओं द्वारा वहां पूजा करने का जिक्र है। इसकेअलावा विदेशी यात्रियों ने भी कहा है कि उस जगह पर हिन्दू पूजा करते थे। १९५८ केगजेटियर में उस जगह पर नमाज केसाथ-साथ हिन्दुओं द्वारा पूजा करने का भी जिक्र है।

उधर, सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से पेश वरिष्ठï वकील राजीव धवन ने कहा है कि हमारा दावा सिर्फ भीतरी अहाते पर ही नहीं बल्कि बाहरी अहाते पर भी  है। हमारा जो कुछ भी था उसे ध्वस्त कर दिया गया।  मस्जिद और वक्फ को सरकार मानती थी। हिंदुओं का वहां कोई मालिकाना हक नहीं था। उन्हें पूजा का जो अधिकार मिला था वह निर्देश के अनुसार मिला अधिकार था। जहां तक विजेता से संबंधित दलील का सवाल है तो हिंदू भी कई राजा हुए जिन्होंने अन्य जगहों पर फतह किए। वे मुस्लिम आक्रमणकारी से अलग कैसे हो सकते हैं। १८८६ में कमिश्नर ने यह तय किया था कि हिंदुओं केपास विवादित स्थल का मालिकाना हक नहीं है। ये फैसला हिंदू पक्षकारों पर भी लागू होता है। इस मामले में मालिकाना हक हिंदुओं को साबित करना है। मस्जिद वहीं थी और नमाज पढ़े जाते थे। मुस्लिम शांति पूर्वक नमाज पढ़ते थे लेकिन शरारती तत्वों ने मस्जिद को तोड़ दिया। उन्होंने यह भी कहा कि मस्जिद सिर्फ गुंबद तक सीमित नहीं है। इसके आसपास का इलाका भी उनका है।

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