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महाराष्ट्र की राजनीति में पिछले दो महीनों में एक के बाद एक तीन भूचाल आ गए।

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Archana Kumari. जनवरी में सामाजिक न्याय मंत्री धनंजय मुंडे, फरवरी में वन मंत्री संजय राठौड़ और अब मार्च में गृह मंत्री अनिल देशमुख गंभीर विवादों में फंसे हैं। विवादों का मकड़जाल इतना उलझा हुआ है कि तीनों का राजनीतिक जीवन दांव पर लग गया है। इससे शिवसेना- एनसीपी- कांग्रेस की तिकड़ी सरकार की चूलें भी हिल गई हैं।

इनमें से राठौड़ शिवसेना के हैं, जबकि मुंडे और देशमुख शरद पवार की पार्टी एनसीपी के। राठौड़ और मुंडे बंजारा समाज से आते हैं। वहीं, देशमुख विदर्भ के मराठा माने जाने वाले ‘कुणबी’ समाज के हैं। राठौड़ और देशमुख विदर्भ के हैं। दूसरी ओर मुंडे मराठवाड़ा के बीड़ ज़िले के।

मुंडे की एक बड़ी पहचान है कि वह बीजेपी के कद्दावर नेता रहे स्वर्गीय गोपीनाथ मुंडे के भतीजे हैं। चचेरी बहन पंकजा मुडे के साथ उनकी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता सबको मालूम है।

राठौड़ पर पूजा चव्हाण नाम की टिकटॉक स्टार से रिश्ते रखने और उसकी आत्महत्या के लिए जिम्मेदार होने के आरोप हैं। बजट सत्र के पहले जब उन पर दबाव बढ़ गया तो वह अपनी असली पत्नी को लेकर मुख्यमंत्री निवास पर गए और उद्धव ठाकरे को इस्तीफा सौंप दिया। उस समय बंजारा समाज के ‘महंत’ भी वहां थे।

बंजारा समाज के महंत का बहुत दबदबा होता है, इसलिए राजनीतिक दल उन्हें खुश रखते हैं। वह विदर्भ के दिग्रस इलाक़े से शिवसेना के टिकट पर जीते हैं। धनंजय मुंडे पर भी एक युवती के यौन शोषण का आरोप है।

और अब तीसरा और सबसे ताज़ा मामला है गृह मंत्री अनिल देशमुख का। मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह ने देशमुख पर हर महीने सौ करोड़ रुपये की उगाही के लिए दबाव डालने का आरोप लगाया है। मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को इस सिलसिले में अंग्रेज़ी में लिखा आठ पन्ने का लेटर और सुप्रीम कोर्ट में उनकी गुहार मीडिया में बहुप्रचारित हो चुकी है।

मुकेश अंबानी के घर के सामने विस्फोटक रखी कार खड़ी करना, गुजराती व्यवसायी मनसुख हिरेन की हत्या और क्राइम ब्रांच के असिस्टेंट इंस्पेक्टर सचिन वझे की गिरफ्तारी जैसी घटनाएं किसी गहरी साजिश की कड़ियां लगती हैं।

इसके अलावा, अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत और दीव-दमण के सांसद मोहन डेलकर की मुंबई की एक होटल में आत्महत्या भी पुलिस और गृह मंत्री के बीच टकराव का कारण बनी है। यह सारे मामले पुलिस से ताल्लुक रखते हैं और यहीं अनिल देशमुख की गृह मंत्री के रूप में भूमिका के एक्स-रे की ज़रूरत पड़ती है।

अनिल देशमुख का राजनीतिक जीवन बहुत लंबा है। नागपुर ज़िले की नरखेड़ तहसील के वडविहिर गांव में 1950 में उनका जन्म हुआ। यह इलाक़ा काटोल विधानसभा क्षेत्र में आता है। देशमुख परिवार का दबदबा रहा है इस इलाक़े में। अनिल देशमुख और उनके चचेरे भाई और कभी महाराष्ट्र कांग्रेस के अध्यक्ष रहे रणजीत देशमुख का कांग्रेस में आनाजाना रहा है।

एक भाई कांग्रेस में हो तो दूसरा किसी दूसरी पार्टी में चला जाता और फिर सियासी मैदान में लड़ाइयां होतीं। यह सियासी संघर्ष अगली पीढ़ी में भी जारी है।

अनिल देशमुख की प्राथमिक शिक्षा काटोल में और अगली पढ़ाई नागपुर में हुई। उन्होंने एग्रीकल्चर में एमएससी किया है। 20 साल की उम्र से ही राजनीति में आ गए। 90 के दशक में डॉ. श्रीकांत जिचकार जैसे दिग्ग्ज उच्च शिक्षित शख्स को इस विधानसभा क्षेत्र ने देखा है।

जिचकार के पास एमबीबीएस, एमडी, पीएचडी से लेकर डी.लिट् तक इतनी उपाधियां थीं कि गिनने के लिए दसों उंगलियां लगानी पड़ें। कांग्रेस के उस जमाने में डॉ. जिचकार महाराष्ट्र के सबसे युवा वित्त मंत्री थे। जीरो बजट की अवधारणा उनकी ही देन है। ऐसे ही लोगों के बीच अनिल देशमुख ने राजनीति की तालीम पाई।

Uddhav and Sharad Pawar 1992 में वह पहली बार चुनावी अखाड़े में उतरे और जलालखेड़ा निर्वाचन क्षेत्र से नागपुर ज़िला परिषद के सदस्य बने। इसी दौरान नरखेड़ पंचायत समिति के सभापति और जुलाई 1992 में नागपुर ज़िला परिषद के अध्यक्ष बने। इस तरह नागपुर के राजनीतिक महकमे में उनकी पहचान बन गई। 1995 में कांग्रेस से टिकट न मिलने पर निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़े और जीत गए।

इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। तत्कालीन बीजेपी-शिवसेना सरकार में शिक्षा मंत्री रहे। 1999 में शरद पवार की एनसीपी में शामिल हो गए और तब से 2014 को छोड़ दें तो हर बार काटोल से जीतते रहे। पांच बार इसी क्षेत्र से चुने जाने का उनका रेकॉर्ड है।

आबकारी से लेकर पीडब्ल्यूडी तक विभिन्न विभागों के मंत्री रहे। बीजेपी-शिवसेना की सरकार रही हो या कांग्रेस के नेतृत्व में सत्ता चल रही हो, अनिल देशमुख मंत्री बन ही जाते। नए गठजोड़ से जब उद्धव ठाकरे सीएम बने तो उनकी सरकार में भी वह गृह मंत्री बन गए।

गृह विभाग सबसे ताकतवर और मलाईदार माना जाता है। इसलिए बहुत बार सीएम गृह मंत्रालय अपने पास ही रखते हैं। चूंकि यह तिगड़ी सरकार है और एनसीपी प्रमुख शरद पवार इसके कर्ताधर्ता हैं तो उन्होंने गृह मंत्रालय अपने हिस्से में रखा। भुजबल, जयंत पाटील, अजित पवार जैसे दिग्गज होते हुए भी उन्होंने अनिल देशमुख को गृह मंत्री क्यों बनाया, जिनका राजनीतिक कद बाकियों की तुलना में कम है? इसका आसान-सा जवाब है, प्रफुल्ल पटेल।

प्रफुल्ल विदर्भ के गोंदिया ज़िले के हैं और पवार से बेहद नजदीकियां हैं उनकी। पवार-पटेल की दोस्ती इतनी है कि पश्चिम महाराष्ट्र के एनसीपी के बड़े नेता तक पटेल को टोकने की जुर्रत नहीं करते। अनिल देशमुख इन्हीं प्रफुल्ल पटेल के शागिर्द हैं। इस तरह देशमुख एनसीपी सुप्रीमो पवार के विश्वासपात्र बने।

बीजेपी की देवेंद्र फडणवीस सरकार के दौरान अजित पवार पर सिंचाई घोटाले के आरोपों और एनसीपी कार्यकर्ताओं पर कई पुलिसिया मामलों के कारण शरद पवार हर हाल में गृह मंत्री के रूप में अनिल देशमुख जैसी कठपुतली चाहते थे। कहते हैं कि गृह विभाग पर जिसका नियंत्रण होता है, वह कुल मिलाकर राज्य पर नियंत्रण रख सकता है। चुनावों के दौरान सुरक्षा, पुलिस के गुप्तचर विभाग की सूचनाओं का राजनीति के लिए उपयोग किया जा सकता है।

छगन भुजबल भी पवार के विश्वासपात्र लोगों में हैं। लेकिन भुजबल शायद कभी स्वतंत्र रूप से कोई निर्णय ले भी लें, लेकिन अनिल देशमुख, शरद पवार को पूछे बिना तिनका भी नहीं हिलाते। ऐसे में संदेह की सुई प्रफुल्ल पटेल, शरद पवार और अनिल देशमुख पर घूमती ही रहेगी।

मुकेश अंबानी मामले में पकड़े गए सचिन वझे शिवसेना से करीबी रखते हैं। मुंबई के घाटकोपर में बम विस्फोट के एक मामले में एक आरोपी की हवालात में मौत के बाद उन्हें सस्पेंड कर दिया गया था। शिवड़ी की अदालत में यह मामला अब भी चल रहा है।

पिछले 16 बरसों से सस्पेंड रहे वझे को किसने फिर काम पर लिया, यह मुखमंत्री ठाकरे, गृह मंत्री अनिल देशमुख और परमबीर सिंह के बीच झगड़े का मुद्दा है। नेता पुलिस कमिश्नर पर ठीकरा फोड़ रहे हैं, जबकि मंत्रियों के निर्देश के बिना अधिकारी कुछ कर नहीं सकते, यह सब जानते हैं। प्रशासनिक आदेश भले अधिकारी दें, लेकिन निर्देश मंत्रियों के ही होते हैं। वैसे भी वझे जैसे अदने-से पुलिस कर्मचारी से गृह मंत्री का अकेले में मिलना संदेह तो पैदा करेगा ही।

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Archana Kumari

राजधानी दिल्ली में लंबे समय तक अपराध संवाददाता के रूप में कार्य का अनुभव। अर्चना विभिन्न समाचार पत्रों तथा न्यूज़ चैनल में काम कर चुकी हैं। फिलहाल स्वतंत्र पत्रकारिता।

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