आतंकवाद के हमदर्द ‘गुलाम’!

कश्मीर में चले रहे आतंकवादी दमन को लेकर गुलाम नबी आज़ाद बड़े दुखी नजर आ रहे हैं, उन्हें कश्मीर के अवाम की भी बड़ी चिंता हो रही है.अपने पुरे भाषण में केवल कश्मीरी मिलिटेंट और कश्मीरी लोग, उन्हें कहीं भी यह नजर नहीं आया की किस तरह से भीड़ की आड़ में सेना और पुलिस को निशाना बनाया जा रहा है!

अस्पताल में घायलों की संख्या तो बता दी किन्तु घायल पुलिस और जवानों के बारे में बोलना भूल गए! कश्मीर में प्रेस की आज़ादी पर बोलने वाले नबी साहब ये भूल गए की आपातकाल के समय इंदिरा गांधी ने क्या किया था? राज्यसभा में दिए गए अपने भाषण में मुझे कहीं भी यह नहीं लगा की वो राज्य सभा के सदस्य की हैसियत से बोल रहे थे! उनके पूरे भाषण में में वो केवल मुस्लिम और इस्लाम का बचाव करते हुए दिखे.

राज्य सभा में बहस का मुद्दा कश्मीर था. आप कश्मीर के हालातों पर रोशनी डालते, माना कश्मीर में अभी हालात ठीक नहीं है! किन्तु हमेशा ऐसे ही रहेंगे ऐसा मुमकिन नहीं है, कश्मीर मुद्दे पर बोलते-बोलते गुलाम नबी विवादित ज़ाकिर नायक के पक्ष को रखते नजर आये तो दूसरी तरफ तस्लीमा नसरीन पर निशाना लगाने से भी नहीं चूके. नबी साहब आप के इस भाषण को हम कश्मीर के लोगों के लिए आपका दर्द समझें अथवा इस्लाम के प्रति आपका कर्तव्य.

वोटों के लिए तुष्टिकरण का जो खेल कांग्रेस वर्षों से खेल रही है गुलाम नबी आज़ाद का राज्य सभा में दिया गया यह भाषण उसी की अगली कड़ी सा लग रहा था, आपको कश्मीर या वहां की जनता से कोई सारोकार नहीं है आप केवल कश्मीर के पीछे तुष्टिकरण का अपना पुराना फार्मूला आजमा रहे हैं.

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