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प्राचीन भारत :सनातन का एक प्रतीक अरब की रेत में आज भी अडिग खड़ा है

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अरब के टट्टू यूरोप के गोरों से अधिक बुद्धिमान नहीं है। विशेष रुप से जब मामला प्राचीन भग्नावेशों से सनातन के चिन्ह मिटाने का हो। अरबी लोग उजड्ड ढंग से सबूत मिटाते हैं और उनकी पोल खुल जाती है। ये तो पूरा विश्व जानता है कि भारत और विश्व के अनेक प्राचीन भवनों के मांगलिक चिन्ह मिटाकर उन्हें मस्जिदों का रुप दे दिया गया था।

सऊदी अरब में अल-मदीना क्षेत्र में शताब्दियों से खड़े एक सुंदर आश्चर्य को विश्व धरोहर का दर्ज़ा दिया गया है। मादाइन सालेह को पहाड़ के पत्थर से काटकर बनाया गया था। इसके अचूक और सुंदर रॉक कट समूचे विश्व के खोजियों को आश्चर्य में डाले हुए हैं।  मान्य इतिहास में इसे एक मस्जिद कहा जाता है। एक प्राचीन मस्जिद उस समय की, जब मूर्ति पूजा मान्य थी।

इससे क्रोधित होकर उनके ख़ुदा ने इसे तूफ़ान द्वारा नष्ट कर दिया था। इस सुंदर शिल्प को वे लोग पाप का प्रतीक मानकर ध्वस्त करते रहे। जबकि वह एक बहुत ही सुंदर मंदिर था। यूनेस्को के अनुसार इसका निर्माण पहली शताब्दी में किया गया था। इस बहुत भव्य शिल्प पर छोटे-मोटे भूकंप या तूफान असर नहीं डाल सकते थे। ये मंदिर मनु के समय की जल-प्रलय में नष्ट होने की संभावना बनती है।

वैज्ञानिक ख़ोज अब बता रही है कि पृथ्वी पर जल प्रलय 2000-1900 ईसा पूर्व के आसपास आई थी। संभवतः उसी जल-प्रलय के आघात से ये शक्तिशाली निर्माण टूटकर बिखर गया होगा।

अरब के लोगों ने ऊपर वर्णित कथा को सुनने के बाद इसके बचे भागों को भी तहस-नहस कर डाला, जब तक कि यूनेस्को ने इसे अपने अधिकार क्षेत्र में नहीं ले लिया।

इसका शिल्प पेट्रा के मंदिर और मध्यप्रदेश में स्थित बाघ की गुफाओं में स्थित पहाड़ों को काटकर बनाए मंदिर की तरह है।

उन्हें बनाने की शैली बिलकुल एक सी है। ऐसा लगता है कि पहली शताब्दी से छठवीं शताब्दी के बीच कुछ अज्ञात शिल्पकारों के समूह ने ये असंभव से लगने वाले निर्माण किये होंगे।

ये वैदिक संस्कृत है

मैं इस प्राचीन मंदिर के कुछ ऐसे प्रमाण पेश कर रहा हूँ, जिन्हें मैंने गूगल अर्थ की सहायता से खोज निकाला है। इस पहले चित्र को मंदिर के द्वार के शिखर से लिया गया है। यहाँ एक लेख लिखा गया है। ये वैदिक संस्कृत है।

इस संस्कृत का प्रयोग इजिप्ट, ईस्टर आइलैंड पर शताब्दियों से स्थित रापा नुई प्रजाति की बनाई रहस्य्मयी मूर्तियों पर, नवपाषाण युग (नियोलिथिक काल) से भी पूर्व बनाए गए Göbekli Tepe (तुर्की)के मंदिर के शिल्प पर अंकित पाया गया है।

यही भाषा चिन्ह ग्रेट पिरामिड और सिंधु घाटी सभ्यता के प्राप्त अवशेषों पर भी पाए गए हैं। फिर ये कैसे कोई मस्जिद हो सकती है, जिस पर हास्यापद ढंग से आकाशीय कहर टूटा था। दरअसल जल प्रलय के आघात के बाद बिखरे पड़े अवशेषों को इसलिए कुचला गया क्योंकि उन पर सनातनी चिन्ह दिखाई देते हैं।

मंदिर की दीवारों पर की जाने वाली सज्जाकारी

ये चित्र मंदिर की दीवार से लिया गया है। स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि दीवार पर दो फूल अंकित किये गए हैं। इनमे से एक फूल को मिटा दिया गया है। दोनों फूलों के बीच एक मुख दिखाई देता है, इसे भी ध्वस्त कर दिया गया है। मुझे ये समझ नहीं आता कि मस्जिद की दीवार पर फूल और मंदिर की दीवारों पर की जाने वाली सज्जाकारी क्यों की गई है।

इसी मंदिर के पास एक और मंदिर के शिखर के अवशेष। इसमें आप स्पष्ट मंदिर के शिखर को अनुभव करेंगे क्योंकि आप वर्षों से इसे देखते आए हैं। इसके शिल्प को भी लगातार पत्थर आदि मारकर ध्वस्त किया गया है।

मेरा अनुमान

ये एक धर्म क्षेत्र था, जिसे सैकड़ों शिल्पियों ने असाध्य श्रम कर  बनाया था। दो बड़ी चट्टानों के बीच से एक cut लगाया गया था। ये cut खोजियों के लिए सिरदर्द बना हुआ है। चट्टान को कैसे काटा गया, इसका अनुमान नहीं है लेकिन इसे पेट्रा की तर्ज पर बनाया गया था। इसे इस तरह बनाया गया था कि आने वाले जब इस cut से निकलकर भीतर जाए तो उन्हें ये महान आश्चर्य दिखाई दे। दरअसल अंदर का निर्माण इस दरार से भीतर आने पर ही दिखाई देता था। उस पार से कोई सोच नहीं सकता था कि भीतर क्या है।

ये पेट्रा का मंदिर है, जो जॉर्डन में बना हुआ है। माना जाता है कि इसका निर्माण कार्य 1200 ईसा पूर्व के आसपास शुरू हुआ। यह एक मशहूर पर्यटक स्थल है। पेत्रा एक “होर” नामक पहाड़ की ढलान पर बना हुआ है।

बाघ गुफाएं, मध्य प्रदेश में धार जिले से 97 किलोमीटर दूर विन्ध्य पर्वत के दक्षिणी ढलान पर हैं। ये इंदौर और वडोदरा के बीच में बाघिनी नदी के किनारे स्थित हैं। इन गुफाओं का सम्बन्ध बौद्ध धर्म से है। यहां अनेक बौद्ध मठ और मंदिर देखे जा सकते हैं। इन गुफाओं में चैतन्य हॉल में स्तूप हैं और रहने की कोठरी भी बनी हैं जहाँ बोद्ध भिक्षु रहा करते थे। कुछ इतिहासकार इन्हें चौथी और पांचवी सदी में निर्मित मानते हैं, अधिकतर 7वीं सदी में। इन्हे अठारहवीं सदी में एक अंग्रेज़ खोजी द्वारा खोजा गया था।

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Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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2 Comments

  1. Jitendra Kumar Sadh says:

    वाह अच्छी जानकारी

  2. Jigyashu says:

    माननीय संदीपजी और विपुलजी,
    बहुत ही बढ़िया लेख है।लेकिन एक correction होनी चाहिए। इसमें लिखा है की उर्दू का आविष्कार छठी शताब्दी में हुआ जोकि गलत है।उर्दू का आविष्कार तो भारत में मुस्लिम आक्रमण के बाद हिन्दी और फारसी को मिलाने से हुआ।आप के लेख में वहा सायद “अरबी” शब्द होना चाहिए।
    धन्यवाद ?।

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