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ऑस्ट्रेलिया की संप्रभुता के खिलाफ दादागीरी फेसबुक की

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Sonali Misra. बहुत ज्यादा दिन अभी नहीं हुए हैं जब हमने विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र अमेरिका में सोशल मीडिया को दैत्य बनते हुए देखा था।  ट्विटर और फेसबुक दोनों ही ऐसा व्यवहार कर रहे हैं, जैसे वह इस दुनिया को चला रहे हैं।

क्या वही इस दुनिया को चला रहे हैं? यदि अमेरिका के चुनावों के बाद से हुई कई और वैश्विक घटनाओं को देखें तो यह स्पष्ट होता है कि यह लोग स्वयं को विश्व की स्वयंभू सरकार मानते हैं। 

हाल की घटना है ऑस्ट्रेलिया की। ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री मोर्रिसन ने पिछले सप्ताह भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को कॉल कर उनसे सहायता माँगी। ऑस्ट्रेलिया में फेसबुक ने न्यूज़ के हर पेज को ब्लॉक कर दिया है।

क्योंकि ऑस्ट्रेलिया सरकार एक क़ानून बनाने जा रही है जिसमे यह प्रस्तावित है कि इस सोशल मीडिया की दिग्गज कंपनी को मीडिया संस्थानों द्वारा साझा की जा रही सूचनाओं के लिए भुगतान करना होगा।

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जाहिर सी बात है कि हर तरह से मुनाफ़ा कमाने वाली फेसबुक को यह मंजूर ही नहीं होगा और वह हर कीमत पर केवल अपनी ही जेब भरने वाली है तो वह अपनी जेब से पैसे कैसे दे सकती है?

प्रधानमंत्री मोर्रिसन जब यह कहते हैं कि लोग ऑस्ट्रेलिया की ओर देख रहे हैं कि उसके उठाए कदम का नतीजा क्या होगा, तो वह झूठ नहीं कह रहे हैं। दरअसल गूगल, फेसबुक और ट्विटर यह तीनों ही बड़े दैत्य अब अपनी आसुरी शक्ति का प्रयोग हर देश के लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ करने के लिए करने लगे हैं।

जैसे ही ऑस्ट्रेलिया ने यह क़ानून प्रस्तावित किया, वैसे ही फेसबुक ने ऑस्ट्रेलिया में हर तरह के समाचार और उनकी वेबसाइट और लिंक प्रतिबंधित कर दिए।   जाहिर है कि यह एक स्वतंत्र देश के प्रति एक तकनीकी कंपनी द्वारा किया गया उल्लंघन था।

प्रधानमंत्री मोर्रिसंन ने 18 फरवरी को अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखा कि यह आज जो फेसबुक कर रहा है, मनमानी कर रहा है और जिस तरह से स्वास्थ्य और आपात सेवाओं पर आवश्यक सूचना सेवा को काट दिया है, वह बेहद निराश करने वाला है और मैं इस मामले में और देशों के प्रमुखों से लगातार संपर्क में हूँ।

उन्होंने आगे लिखा कि फेसबुक द्वारा उठाए गए यह कदम बाकी देशों को भी ऐसे कदम उठाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं क्योंकि अब और देशों को भी यह लगने लगा है कि यह तकनीकी दिग्गज खुद को हर देश से ऊपर मानते हैं और उनके अनुसार उन पर कोई क़ानून लागू नहीं होते हैं।

आगे उन्होंनें कहा कि वह किसी भी हाल में फेसबुक के इस दबाव पर नहीं झुकेंगे और इसी के साथ उन्होंने कहा कि ऑस्ट्रेलिया तब भी नहीं झुका था जब अमेजन ने देश छोड़ने की धमकी दी थी और जब ऑस्ट्रेलिया ने सोशल मीडिया प्लेटफोर्म पर आतंकवादी सामग्री प्रकाशित करने के लिए सभी देशों से बात की थी।

इसी का नतीजा है कि कनाडा में भी फेसबुक से यह कह दिया है कि उसे समाचार दिखाने के लिए भुगतान करना होगा। कनाडा ने ऑस्ट्रेलिया द्वारा प्रस्तावित कानूनों का समर्थन किया है।

कनाडा के हेरिटेज मंत्री स्टीवन गुइल्बील्ट ने पिछले सप्ताह कहा कि वह जल्दी ही एक ऐसा क़ानून ड्राफ्ट करने जा रहे हैं जो ऑस्ट्रेलिया के क़ानून के समान होगा जिसमें फेसबुक और शेष कंपनियों को अपने प्लेटफॉर्म पर घरेलू कंटेंट दिखाने के लिए एक लाइसेंसिंग शुल्क देना होगा।

इसी के साथ पोलैंड भी ऑस्ट्रेलिया के साथ आया है। पोलैंड के प्रधानमंत्री Mateusz Morawiecki ने कहा है कि वह सोशल मीडिया द्वारा अकाउंट बैन करने को अवैध घोषित करेंगे।  उनका कहना है कि कॉर्पोरेट के दिग्गज यह तय नहीं करेगे कि कौन से विचार सही हैं या नहीं! वह मनमानी नहीं कर सकते। 

पोलैंड के न्याय मंत्रालय का कहना है कि न्याय मंत्रालय द्वारा तैयार मसौदा क़ानून के अनुसार सोशल मीडिया कंपनी के अनुसार उन पोस्ट को सोशल मीडिया नहीं हटा सकता है, जो पोलिश कानूनों का उल्लंघन नहीं करती हैं।

यह तो थी फेसबुक की पूरे विश्व पर दादागीरी!  ऑस्ट्रेलिया में वह दिखा रहा है जहाँ पर बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2018 से 2020 के बीच 40% ऑस्ट्रेलिया के नागरिक फेसबुक को खबरों के लिए इस्तेमाल कर रहे थे, और यही कारण है कि समाचारों के लिए फेसबुक देश का सबसे लोकप्रिय सोशल मीडिया और मेसेजिंग प्लेटफॉर्म बन गया।

मगर जैसे ही उसका एकाधिकार हुआ, वैसे ही उसके मुनाफे पर भी चर्चाएँ शुरू हुईं। बीबीसी के अनुसार 2018 में ऑस्ट्रेलियन कम्पटीशन एंड कंस्यूमर कमीशन ने यह पाया कि मीडिया स्पेस में यह बड़े टेक दैत्य ही मुनाफे का बड़ा हिस्सा डकार जाते हैं।  ऑस्ट्रेलिया मीडिया में डिजिटल विज्ञापन पर खर्च किए गए हर A$100 (£56; $77)  में से  A$81 केवल और केवल गूगल और फेसबुक के पास जाता है।

और फिर टेक फर्म और मीडिया के बीच इस असंतुलन को दूर करने के लिए ही कमीशन ने यह तय किया कि इस क्षेत्र में एक आचरण संहिता को लाया जाना अत्यंत आवश्यक है।

तो यह तय था कि ऑस्ट्रेलिया मीडिया की ख़बरों से फेसबुक कमा रहा है और विज्ञापन किसी और मीडिया की साईट से अधिक फेसबुक पर हैं। फेसबुक का कहना है उसके द्वारा खबरों को लगाए जाने पर न्यूज़ पब्लिशर्स को फायदा होता है।

परन्तु कहानी इतनी ही नहीं है। कहानी में मोड़ यह है कि फेसबुक जो खबरें दिखाता है वह देश के हितों के अनुसार नहीं बल्कि अपने हितों के अनुसार दिखा रहा था। जैसा वह भारत और अमेरिका हर जगह करता है। फेसबुक ने लगातार न्यूज़ पब्लिशर्स को बताए बिना अपने सॉफ्टवेयर में बदलाव किए और वह भी अपने अनुसार!

बीबीसी के अनुसार एक बड़े ऑस्ट्रेलियन आउटलेट में एक रेडिओ जर्नलिस्ट ने बताया कि उनके लिए गोल पोस्ट हमेशा बदलते रहे और फेसबुक के हित के अनुसार प्राथमिकताएँ बदलती रहीं।

इसका मतलब यह हुआ कि समाचार जो ऑस्ट्रेलिया के हितों के अनुसार होने चाहिए थे, वह फेसबुक के अनुसार होने लगे। वीडियो एडिट होने लगे, समाचार एडिट होने लगे। और कई वीडियो प्रोडूसर को उसी के अनुसार नियुक्त किया जाने लगा। और एक शर्त यह होने लगी कि ऐसे लोग आएं जो “आकर्षक” हेडलाइन के साथ समाचार लिख सकें, जिससे ज्यादा से ज्यादा ट्रैफिक आए और मुनाफ़ा आए।

ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के रायटर्स इंस्टीटयूट के डायरेक्टर रसमस नील्सन ने बीबीसी को बताया कि फेसबुक के फीड फॉर्मेट के कारण भरोसेमंद रिपोर्टिंग और अफवाहों के बीच अंतर मिट गया. अत: यह स्पष्ट है कि ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री द्वारा यह प्रस्तावित क़ानून उस देश की संप्रभुता के लिए है, जाहिर है कि फेसबुक अपने मुनाफे के लिए खबरों को कैची बनाकर तोड़ मरोड़ कर पेश कर रहा है, उसे खबरों की सत्यता से कोई मतलब नहीं है। वह मुनाफे के लिए अपना एजेंडा चला रहा है, जैसा हमने भारत में भी देखा था।

भारत में हमने दिल्ली दंगों के दौरान देखा कि कैसे एजेंडे का पालन करते हुए फेसबुक ने दंगों के लिए हिन्दुओं को ही दोषी ठहरा दिया था, जबकि दिल्ली दंगों में शरजील इमाम आदि किसी को भी फेसबुक ने प्रतिबंधित नहीं किया, उत्तर प्रदेश में लखनऊ में कांग्रेस की नेता सदफ जफ़र फेसबुक पर दंगों का सीधा प्रसारण करती रहीं, मगर फेसबुक ने प्रतिबंधित नहीं किया।

इसी तरह हिन्दुओं को मारने के लिए तमाम तरह के उकसाने वाले नारे लगते रहे, मगर फेसबुक ने कुछ नहीं किया, मगर अपनी एक विशेष मानसिकता और हिन्दू द्वेषी प्रकृति के चलते दिल्ली दंगों के लिए कपिल मिश्रा को दोषी ठहरा दिया।

फेसबुक का आर्थिक साम्राज्य कितना बड़ा है और वह कितना मुनाफ़ा उन लोगों से कमा रहा है, जिन्हें वह विचारधारा के आधार पर नापसंद करता है, उसे अगले लेख में प्रस्तुत किया जाएगा। और विशेषकर भारत के राष्ट्रप्रेमी हिन्दुओं के साथ वह कैसा दोहरे मापदंड अपनाता है, उस पर हम अगले लेख में बात करेंगे।  

मगर इसी बीच सभी सरकारें अब फेसबुक और ट्विटर को दुनिया के चौधरी न होने की चेतावनी देने लगे हैं, जो इनकी दादागीरी के लिए बहुत जरूरी है।

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Sonali Misra

Sonali Misra

सोनाली मिश्रा स्वतंत्र अनुवादक एवं कहानीकार हैं। उनका एक कहानी संग्रह डेसडीमोना मरती नहीं काफी चर्चित रहा है। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति कलाम पर लिखी गयी पुस्तक द पीपल्स प्रेसिडेंट का हिंदी अनुवाद किया है। साथ ही साथ वे कविताओं के अनुवाद पर भी काम कर रही हैं। सोनाली मिश्रा विभिन्न वेबसाइट्स एवं समाचार पत्रों के लिए स्त्री विषयक समस्याओं पर भी विभिन्न लेख लिखती हैं। आपने आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में परास्नातक किया है और इस समय इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से कविता के अनुवाद पर शोध कर रही हैं। सोनाली की कहानियाँ दैनिक जागरण, जनसत्ता, कथादेश, परिकथा, निकट आदि पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।

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