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धिम्मी हिन्दू, शुतुरमुर्ग की तरह रेत में धंसाए मुंह!

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Sonali Misra. कश्मीर में एक बार फिर से आतंकवाद का शोर बढ़ रहा है और कश्मीरी हिन्दुओं पर हमले बढ़ रहे हैं। कश्मीरी पंडित हों, कश्मीरी हिन्दू या फिर सिख समुदाय सभी इस्लामी कट्टरपंथी आतंकियों के निशाने पर हैं। और तीन दिनों में तीन हिन्दुओं और एक सिख की हत्या के बाद सौ लोगों की सूची बना रखी है, जिन्हें निशाना बनाया जाना है।

इस समय पूरा भारत हिन्दुओं के साथ हो रहे इस हत्याकांड के खिलाफ दुःख में डूबा हुआ है। हर बार दर्द का खंजर और भी दर्द दे जाता है, मगर यह खंजर तब और दर्द देता है जब पाते हैं कि क्या हिन्दू एकदम खतरा पहचानता ही नहीं है या फिर उसकी अपने जीवित रहने की विवशता ही उससे यह सब कराती है।

केमिस्ट की दुकान चलाने वाले माखन लाल बिन्द्रू की बेटी के पास भी अब धमकी आ गयी है, जिसमें The Resistance  Front ने कहा है कि बिन्द्रू का असली चेहरा सामने आया और वह चूंकि वह शायद योग आदि कराकर स्वास्थ्य गतिविधियों का आयोजन करते होंगे, जो इस्लाम के खिलाफ है तो उन्हें यह लगा कि वह आरआरएस की विचार धारा का प्रचार करने वाले हैं, इसलिए उनका मारना जायज है। और भी कई अनर्गल बातें लिखी हैं, जिसमें बिन्द्रू को चरित्रहीन ठहराते हुए इस बात के लिए दोषी ठहराया है कि वह बाहर से महिला कर्मियों को क्यों लाए? और यह जो भी कदम उठाए जा रहे हैं, वह केवल कश्मीर के दुश्मनों और जासूसों को भगाने के लिए उठाए जा रहे हैं।

ऐसा नहीं है कि इसमें स्थानीय समर्थन नहीं होगा, स्थानीय कश्मीरी मुसलमानों के समर्थन के बिना न ही पहली बार कश्मीरी पंडितों के साथ कत्लेआम हुआ था और न ही अब हो रहा है। यह मजहबी जिहाद है और इसे समझना होगा। परन्तु दुःख तब होता है जब मजहबी जिहाद का इतने वर्षों से निशाना बनता हुआ हिन्दू यह बात ही न समझना चाहे कि दरअसल समस्या कहाँ है?

क्या समस्या मजहबी नहीं है? क्या माखनलाल बिन्द्रू से लेकर सिख प्रिंसिपल को केवल इसीलिए नहीं मारा गया क्योंकि वह इस्लाम को मानने वाले नहीं थे? नहीं तो कागज़ दिखाकर गोली मारने की तुक क्या थी?  मारने वालों से ही रहम की आस में हिन्दू शायद है। ऐसा इसलिए लगा क्योंकि स्वर्गीय श्री माखन लाल बिन्द्रू की बेटी अभी तक यह नहीं समझ पा रही हैं कि समस्या मजहबी ही है।

उन्होंने उसी दिन जोश जोश में कहा कि हिन्दू होने के बाद भी मैंने कुरआन पढ़ी है। कुरआन हर हिन्दू को पढ़ना ही चाहिए, यह आवश्यक है क्योंकि बिना पढ़े टिप्पणी करना अपनी बेवकूफी का परिचय होता है, परन्तु फिर उन्होंने कहा कि कुरआन में लिखा है कि इंसान मर जाता है, पर उसका जज्बा रह जाता है! तो माखन लाल बिन्द्रू का जज्बा कहाँ से लाओगे?

यह कह सकते हैं कि उस समय वह दुःख में होंगी परन्तु उन्होंने एक साक्षात्कार में भी यही कहा कि हिन्दू मुस्लिम की कोई बात है ही नहीं:

https://twitter.com/ndtv/status/1446063210508001281

फिर क्या समस्या है? क्या उन्होंने हिन्दू होने के नाते और उन स्वास्थ्य की गतिविधियों अर्थात शायद योग कराने के कारण नहीं मारा, जिसे वह आरआरएस की गतिविधि कहते हैं? इस सम्बन्ध में कश्मीरी मुस्लिम अडिग रहते हैं, उनका लक्ष्य एकदम स्पष्ट है, उनके लिए उनका मजहब ही सबसे बढ़कर है और कुछ नहीं! इसका उदाहरण शहला रशीद, और जायरा वसीम जैसी लडकियां. 

मजहब के लिए फ़िल्में छोड़ने वाली जायरा वसीम ने भी हाल में अपनी जो तस्वीर पोस्ट की थी, वह देखी जानी चाहिए:

उल्लेखनीय है कि जायरा ने धारा 370 हटने के बाद कश्मीर की कथित पीड़ा और स्वतंत्रता छीने जाने की बात करती हुई दिखाई दी थी, पर इन्सानियत और कश्मीरियत की बात करने वाली जायरा ने कश्मीर में इस्लामी आतंकियों द्वारा हिन्दू और सिख की हत्या के विषय में कुछ नहीं कहा है!

दीपक चंद की भी हत्या आतंकियों ने कर दी थी, दीपक चंद की हत्या के बाद उनके भाई ने एक समाचार चैनल के साथ बात करते हुए कहा कि “”मैं उन लोगों को बताना चाहता हूं जिसके भाई को इन्होंने मारा वो बिलीव करते हैं इस्लाम पर, मैं उन्हें बताना चाहता हूँ कि मैंने दो मस्जिदें बनाई हैं, एक मदरसा बनवाया है, तुमने उसके भाई को मारा है जिसने तुम्हे नमाज पढ़ने के लिए जगह दी और तुम आज के बाद गिल्ट में रहोगे”

गिल्ट? वह क्या होता है? यदि इतिहास पढ़ा होता या फिर हाल फिलहाल में विश्व में जो घटित हो रहा है, उसे देखा होता तो यह वाक्य न बोले होते? पृथ्वी राज चौहान द्वारा दिए गए जीवनदान के बाद भी आक्रमण करने में कोई गिल्ट हुआ? हुमायूँ ने जानबूझकर रानी कर्णवती का प्रस्ताव ठुकरा दिया, कोई गिल्ट हुआ? गिल्ट कैसे होता है और क्यों होता है? राजा महेंद्र प्रताप ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के लिए भूमि दी, मगर उसी अलीगढ़ मुस्लिम विश्व विद्यालय में सीएए के आन्दोलन के दौरान हिंदुत्व विरोधी नारे लगे, क्या गिल्ट जागा? जिस भारत के टुकड़े मजहब के आधार पर करा लिए और उन्हीं हिन्दुओं को मजहब के नाम पर मारा जाता है, क्या गिल्ट जागा?

जब मजहब का विस्तार ही अंतिम लक्ष्य हो, और वह भी किसी भी माध्यम से तो कोई गिल्ट नहीं होता? आज भी अनस हक्कानी महमूद गज़नवी की कब्र पर गया था, और उसने लिखा

“महान मुजाहिदीन, जिसने सोमनाथ के मंदिर को तोडा था” क्या गिल्ट है? नहीं! वह किसी भी प्रकार के किसी भी गिल्ट में नहीं हैं, बल्कि वह फख्र में हैं। उन्हें फख्र है अभी तक सोमनाथ को तोड़ने का! उन्हें फख्र है अभी तक सिरों की मीनारें लगाने का! और इतना ही नहीं, मारी गए सुपिंदर कौर भी एक अनाथ मुस्लिम बच्ची के पालनपोषण के लिए पंद्रह हजार रूपए हर महीने देती थीं, उन्होंने उसे गोद ले रखा था।

माखन लाल बिन्द्रू, दीपक चंद और सुपिंदर तीनों ही उस धर्मनिरपेक्षता के नशे का शिकार हुए, जो कहीं न कहीं उनकी रगों में दौड़ रहा था।

ऐसा नहीं है कि यह तीनों ही इस धर्मनिरपेक्षता वाले धिम्मीपन का शिकार हुए हैं इससे पहले फरवरी में भी रिंकू इसी कथित इंसानियत का शिकार हो गया था। मरने वाला था रिंकू शर्मा, जो बजरंग दल का कार्यकर्ता था। जैसे कश्मीर में माखन लाल बिन्द्रू धर्म और मजहब देखे बिना दवाई देने के लिए हर समय उपस्थित रहते थे, वैसे ही अपने धर्म को मानते हुए रिंकू शर्मा सभी को समान मानता था और मदद के लिए तैयार रहता था।

रिंकू सामाजिक कार्यकर्त्ता था और समाज के हर वर्ग की मदद के लिए हमेशा तैयार रहता था। मगर फिर भी रिंकू को घर में घुसकर मार डाला गया। क्योंकि वह राम मंदिर के लिए चंदा इकट्ठा कर रहा था और यह उस इस्लाम को पसंद नहीं आया जिस इस्लाम की पत्नी को उसने अपना खून दिया था और कोरोना काल में जिस इस्लाम के भाई को अस्पताल में भर्ती कराने में मदद भी की थी।

पर जैसे बिन्द्रू के लिए मारने वालों ने बहाने तैयार कर रखे थे, जैसे मदरसा बनाने वाले के भाई दीपक को मारने के लिए बहाने तैयार कर रखे थे, और जैसे सुपिंदर कौर को मारने के लिए बहाने तैयार कर रखे थे, वैसे ही बहाने इस रिंकू शर्मा को मारने के लिए तैयार कर रखे थे।

रिंकू शर्मा ने खून दिया, उसे भी मार डाला- कोई गिल्ट नहीं,

माखन लाल बिन्द्रू दवाइयों के माध्यम से सेवा के लिए तैयार रहे, उन्हें मार डाला – कोई गिल्ट नहीं

सुपिंदर कौर, ने एक मुस्लिम बच्ची को गोद लिया, उन्हें मार डाला- कोई गिल्ट नहीं! और हाँ,

वह जहां शरण लेते हैं, वहाँ की लड़कियों को निशाना बनाते हैं, उन्हें जब शरण देने वालों के अहसानों का बदला उनकी लड़कियों के साथ बलात्कार करने के बाद नहीं होता, तो अब होगा? मोपला से लेकर डायरेक्ट एक्शन डे को देख लें, हिन्दुओं की लाशें बिछाने वालों को गिल्ट? हिन्दू लड़किओं को मुसलमान बनाने के लिए लव जिहाद जैसी योजनाएं बनाते हैं, पर मुस्लिम लड़कियों से प्यार करने पर हिन्दू लड़कों का गला काट देते हैं, – कोई गिल्ट नहीं. दिल्ली में अंकित को सरेराह मार डाला गया, उसका अपराध क्या था, मुस्लिम लडकी से प्यार करना! और उधर हरियाणा में निकिता तोमर को मार डाला- क्योंकि उसने इस्लाम में आने से इंकार कर दिया था – उनमें कोई गिल्ट नहीं है! इतिहास से लेकर अब तक, न ही कुछ बदला है और न बदलेगा, समस्या है कि क्या हम वास्तव में समस्या को पहचानते हैं?  

पर हम समस्या को पहचानेंगे कैसे, एक ओर कथित रूप से “इन्सानियत” से बड़ा कोई धर्म, मजहब नहीं होता कहने वाले लोग हैं, तो दूसरी ओर जिन पर विश्वास करना चाहता है, वह यह कहते हुए चले आते हैं “सभी का डीएनए समान है!” और यह तो अंग्रेज हैं, जिन्होनें दूरियां पैदा कीं, नहीं तो पहले हिन्दू-मुसलमान आपस में घुलमिल कर रहते थे. यह प्यार की गंगा-रेगिस्तानी तहजीब का लेक्चर देने वाले नहीं जानते कि इनके कारण आज क्या हो गया है? सिर और भी अधिक रेत में धंस गया है

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Sonali Misra

सोनाली मिश्रा स्वतंत्र अनुवादक एवं कहानीकार हैं। उनका एक कहानी संग्रह डेसडीमोना मरती नहीं काफी चर्चित रहा है। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति कलाम पर लिखी गयी पुस्तक द पीपल्स प्रेसिडेंट का हिंदी अनुवाद किया है। साथ ही साथ वे कविताओं के अनुवाद पर भी काम कर रही हैं। सोनाली मिश्रा विभिन्न वेबसाइट्स एवं समाचार पत्रों के लिए स्त्री विषयक समस्याओं पर भी विभिन्न लेख लिखती हैं। आपने आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में परास्नातक किया है और इस समय इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से कविता के अनुवाद पर शोध कर रही हैं। सोनाली की कहानियाँ दैनिक जागरण, जनसत्ता, कथादेश, परिकथा, निकट आदि पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।

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