Indian Civil Code – A Common Civil Law for all Indians

शनिवार, 23 अक्टूबर, सुबह 10 बजे, कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में आयोजित सेमिनार में आपका हार्दिक स्वागत है.

23 नवंबर 1948 को विस्तृत चर्चा के बाद संविधान में अनुच्छेद 44 जोड़ा गया और सरकार को निर्देश दिया गया कि सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता लागू करें. संविधान निर्माताओं की मंशा थी कि अलग-अलग धर्म के लिए अलग-अलग कानूनों के बजाय सभी नागरिकों के लिए धर्म जाति भाषा क्षेत्र और लिंग निरपेक्ष एक ‘भारतीय नागरिक संहिता’ लागू होना चाहिए.

अंग्रेजो द्वारा 1860 में बनाई गई भारतीय दंड संहिता, 1961 में बनाया गया पुलिस ऐक्ट, 1872 में बनाया गया एविडेंस एक्ट और 1908 में बनाया गया सिविल प्रोसीजर कोड सहित सैकड़ों अंग्रेजी कानून सभी भारतीय नागरिकों पर समान रूप से लागू हैं. पुर्तगालियों द्वारा 1867 में बनाया गया पुर्तगाल सिविल कोड गोवा के सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू है लेकिन विस्तृत चर्चा के बाद बनाया गया आर्टिकल 44 लागू करने के लिए कभी गंभीर प्रयास नहीं किया गया. आजतक भारतीय नागरिक संहिता का एक मसौदा भी नहीं बनाया गया. परिणाम स्वरूप बहुत कम लोगों को ही इससे होने वाले लाभ के बारे में पता है.

अनुच्छेद 44 पर बहस के दौरान बाबासाहब अंबेडकर ने कहा था- ”व्यवहारिक रूप से इस देश में एक सिविल संहिता है जिसके प्रावधान सर्वमान्य हैं और समान रूप से पूरे देश में लागू हैं. केवल विवाह और उत्तराधिकार का क्षेत्र है जहां समान कानून लागू नहीं है. यह बहुत छोटा सा क्षेत्र है जिस पर हम समान कानून नहीं बना सके हैं, इसलिए हमारी इच्छा है कि अनुच्छेद 35 को संविधान का भाग बनाकर सकारात्मक बदलाव लाया जाए. यह आवश्यक नहीं है कि उत्तराधिकार के कानून धर्म द्वारा संचालित हों. धर्म को इतना विस्तृत और व्यापक क्षेत्र क्यों दिया जाना चाहिए कि वह संपूर्ण जीवन पर कब्जा कर ले और विधायिका को इन क्षेत्रों में हस्तक्षेप करने से रोके”.

संविधान सभा के सदस्य के.एम. मुंशी ने कहा “हम एक प्रगतिशील समाज हैं और ऐसे दौर में धार्मिक क्रियाकलापों में हस्तक्षेप किए बिना हमें देश को एकीकृत करना चाहिए, बीते कुछ वर्षों में धार्मिक क्रियाकलाप ने जीवन के सभी क्षेत्रों को अपने दायरे में ले लिया है, हमें ऐसा करने से मना करने का निर्णय लेना पड़ेगा और कहना होगा कि ये मामले धार्मिक नहीं बल्कि धर्मनिरपेक्ष कानून के विषय हैं. यह अनुच्छेद इसी बात पर बल देता है. मैं अपने मुस्लिम मित्रों को अहसास कराना चाहता हूं कि जितना जल्दी हम जीवन के पृथक्करणीय दृष्टिकोण को भूल जाएंगे, देश और समाज के लिए उतना ही अच्छा होगा. धर्म उस परिधि तक सीमित होना याहिए जो नियमत: धर्म की तरह दिखता है और शेष जीवन इस तरह से विनियमित, एकीकृत और संशोधित होना चाहिए कि हम जितनी जल्दी संभव हो, एक मजबूत और एकीकृत राष्ट्र में निखर सके”.

संविधान सभा के सदस्य कृष्णास्वामी अय्यर ने कहा “कुछ लोगों का कहना है कि यूनिफॉर्म सिविल कोड बन जाएगा तो धर्म खतरे में होगा और समुदाय मैत्रियता के साथ नहीं रह सकते. इस अनुच्छेद का उद्देश्य ही मैत्रियता लाना है. यह मैत्रियता को समाप्त नहीं बल्कि मजबूत करेगा. उत्तराधिकार या इस प्रकार के अन्य मामलों में अलग-अलग व्यवस्थाएं ऐसे कारक हैं जो भारत के तमाम लोगों में भिन्नता पैदा करते हैं. समान नागरिक संहिता का मूल उद्देश्य है कि शादी-विवाह उत्तराधिकार के मामलों में एक समान सहमति तक पहुंचने का प्रयास करना है. जब ब्रिटिश हमारे देश की सत्ता पर काबिज हुए तो उन्होंने कहा कि इस देश के सभी नागरिक चाहे हिंदू हों या मुसलमान, पारसी हो या ईसाई, सबके लिए समान रूप से लागू होने वाला भारतीय दंड संहिता लागू करने जा रहे हैं. क्या तब मुस्लिम अपवाद बने रह पाए और क्या वे आपराधिक कानून की एक व्यवस्था को लागू करने के लिए ब्रिटिश हुकुमत के खिलाफ विद्रोह कर सके? भारतीय दंड संहिता हिंदू और मुसलमान पर एक समान रूप से लागू होता है.यह कुरान द्वारा नहीं बल्कि विधिशास्त्र द्वारा संचालित है. इसी तरह संपत्ति कानून इंग्लिश विधिशास्त्र से लिए गए हैं”.

1985 में शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था: “यह अत्यधिक दुख का विषय है कि हमारे संविधान का अनुच्छेद 44 मृत अक्षर बनकर रह गया है. यह प्रावधानित करता है कि सरकार सभी नागरिकों के लिए एक यूनिफॉर्म सिविल कोड बनाए लेकिन समान नागरिक संहिता बनाने के लिए सरकारी स्तर पर प्रयास किए जाने का कोई साक्ष्य नहीं मिलता है, कॉमन सिविल कोड विरोधाभासी विचारों वाले कानूनों के प्रति पृथक्करणीय भाव को समाप्त कर राष्ट्रीय अंखडता के लक्ष्य को प्राप्त करने में सहयोग करेगा.

1995 में सरला मुदगल केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा: “संविधान के अनुच्छेद 44 के अंतर्गत व्यक्त की गई संविधान निर्माताओं की इच्छा को पूरा करने में सरकार और कितना समय लेगी? उत्तराधिकार और विवाह को संचालित करने वाले परंपरागत हिंदू कानून को बहुत पहले ही 1955-56 में संहिताकरण करके अलविदा कर दिया गया है. देश में यूनिफॉर्म सिविल संहिता को अनिश्चितकाल के लिए निलंबित करने का कोई औचित्य नहीं है. कुछ प्रथाएं मानवाधिकार एंव गरिमा का अतिक्रमण करते हैं. धर्म के नाम पर सिविल एवं भौतिक आजादी का गला घोटना स्वराज्य नहीं बल्कि निर्दयता है, इसलिए यूनिफॉर्म सिविल कोड का होना निर्दयता से सुरक्षा प्रदान करने और राष्ट्रीय एकता एवं सौहार्द को प्रोत्साहित करने के लिए बहुत जरूरी है”.

2003 में जॉन बलवत्तम केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा: “यह दुख की बात है कि संविधान के अनुच्छेद 44 को आज तक लागू नहीं किया गया, संसद को अभी भी देश में कॉमन सिविल कोड के लिए कदम उठाना है. कॉमन सिविल कोड वैचारिक मतभेदों को दूर कर देश की एकता-अखंडता को मजबूत करने में सहायक होगा.”.

2017 में शायरा बानो केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा “हम भारत सरकार को निर्देशित करते हैं कि वह उचित विधान बनाने पर विचार करें, खासतौर पर ‘तलाक-ए-विद्दत के संदर्भ में, हम आशा एवं अपेक्षा करते हैं कि आने वाला यह विधान व्यक्तिगत कानून- शरीयत में हुए सुधारों, जैसा कि वैश्विक पटल पर। और यहाँ तक कि इस्लामिक देशों में भी कानूनों के माध्यम से किया गया है, पर भी विचार करेगा. जब ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीय दंड संहिता के माध्यम सबके लिए एक कानून लागू किया जा सकता है तो स्वतन्त्र भारत में पीछे रह जाने का कोई कारण नहीं पाते है”.

2019 में जोस पाउलो केस में सुप्रीम कोर्ट ने फिर कहा कि पिछले 63 सालों में समान नागरिक संहिता को लेकर सरकार की तरफ से कोई प्रयास नहीं किया गया. कोर्ट ने अपने टिप्पणी में गोवा का उदाहरण दिया और कहा कि “1956 में हिंदू लॉ बनने के 63 साल बीत जाने के बाद भी पूरे देश में समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं किया गया.

प्रमुख समाजवादी नेता डॉ राम मनोहर लोहिया ने कहा था: “एक ही विषय पर हिंदू मुस्लिम ईसाई पारसी के लिए अलग अलग कानून, धर्मनिरपेक्षता एवं लोकतांत्रिक मूल्यों और देश की एकता-अखंडता के लिए अत्यधिक खतरनाक है”.

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने कहा था: “मेरी समझ में नहीं आ रहा है, जब संविधान निर्माताओं ने शादी-विवाह के लिए एक कानून बनाने की सिफारिश की है और कहा है कि राज्य इसकी तरफ ध्यान देगा, तो क्या वे साम्प्रदायिक थे, क्या यह संप्रदायिकता मुद्दा है? क्रिमिनल लॉ एक है तो सिविल लॉ क्यों नहीं एक हो सकता है?.

पूर्व केंद्रीय मंत्री और केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खां कहते हैं: “यदि आप किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं चाहते हैं तो इसे व्यक्तिगत बनाये रखें, यदि न्यायालय से शरीयत के अपने अधिकार को सुरक्षित करना चाहते हैं तो देखना पड़ेगा कि किसे सुरक्षित करने की मांग की जा रही है”.

अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व सदस्य ताहिर महमूद कहते हैं: “परंपरागत कानून के लिए धार्मिक राजनीतिक दबाव बनाने की बजाय मुसलमानों को समान नागरिक संहिता की मांग करना चाहिये.

आर्टिकल 37 में स्पस्ट लिखा है कि नीति निर्देशक सिद्धांतों को लागू करना सरकार की फंडामेंटल इयूटी है. जिस प्रकार संविधान और कानून का पालन सभी नागरिकों की फंडामेंटल ड्यूटी है वैसे ही संविधान को शतप्रतिशत लागू करना सरकार की नैतिक ड्यूटी है. सेक्युलर देश में धार्मिक आधार पर अलग-अलग कानून नहीं होता है लेकिन हमारे यहाँ आज भी हिंदू मैरिज एक्ट, पारसी मेरिज एक्ट और ईसाई मेरिज एक्ट लागू है, जब तक भारतीय नागरिक संहिता लागू नहीं होगी तब तक भारत को सेक्युलर कहना सेक्युलर शब्द को गाली देना जैसा है.

भारत में विद्यमान धर्म जाति क्षेत्र लिंग आधारित अलग-अलग कानून देश के धर्म-आधारित विभाजन के बुझ चुके आग में सुलगते हुए धुंए की तरह है जो विस्फोटक होकर देश की एकता को कभी भी खण्डित कर सकता है इसलिए इन्हें समाप्त कर एक भारतीय नागरिक संहिता बनाना न केवल धर्मनिरपेक्षता को बनाए रखने के लिए बल्कि देश की एकता-अखंडता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए भी अतिआवश्यक है. दुर्भाग्य से भारतीय नागरिक संहिता को हमेशा धार्मिक तुष्टिकरण के चश्मे देखा जाता रहा है.

जिस दिन भारतीय नागरिक संहिता का ड्राफ्ट तैयार हो जाएगा और आम जनता को इसके लाभ के बारे में पता चल जाएगा, उस दिन कोई भी इसका विरोध नहीं करेगा. वर्तमान समय में जिन लोगों को इसके बारे में कुछ भी नहीं पता वे भी इसका विरोध कर रहे हैं. भारतीय नागरिक संहिता से रूढ़िवाद, कट्टरवाद, जातिवाद, सम्प्रदायवाद, क्षेत्रवाद और भाषावाद समाप्त होगा तथा वैज्ञानिक सोच विकसित होगी. सच्चाई तो यह है कि भारतीय नागरिक संहिता का फायदा हिंदू-बहन बेटियों को ज्यादा नहीं मिलेगा क्योंकि हिंदू मैरिज ऐक्ट में महिला-पुरुष को लगभग समान अधिकार पहले से ही प्राप्त है. इसका सबसे ज्यादा फायदा मुस्लिम बहन-बेटियों को मिलेगा क्योंकि शरिया कानून में उन्हें पुरुषों के बराबर नहीं माना जाता है. भारतीय नागरिक संहिता लागू होने से हिंदू मुस्लिम पारसी ईसाई की बहन बेटियों के अधिकारों मे भेदभाव खत्म होगा.

कुछ लोग आर्टिकल 25 में प्रदत्त धार्मिक आजादी की दुहाई देकर भारतीय नागरिक संहिता का विरोध करते है लेकिन आर्टिकल 25 की शुरुआत ही होती है ‘सब्जेक्ट टू पब्लिक ऑर्डर, हेल्थ एंड मोरैलिटी’ अर्थात कुप्रथा और भेदभाव को धार्मिक स्वतंत्रता नहीं मान सकते हैं. यदि महिला पुरुष में गैर बराबरी हो रही है तो वह रीति नहीं बल्कि कुरीति है और उसे धार्मिक स्वतंत्रता नहीं माना जाएगा, क्योंकि यह देश वेद पुराण गीता रामायण बाइबिल या कुरान से नहीं बल्कि संविधान से चलता है और समता समानता समान अवसर तथा समान अधिकार संविधान की मूल भावना है.

सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट सरकार से कानून बनाने के लिए नहीं कह सकता लेकिन वह अपनी भावना व्यक्त कर सकता है और बार-बार यही कर रहा है. सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट एक जुडिशियल कमीशन या एक्सपर्ट कमेटी बनाने का निर्देश दे सकता है जो विकसित देशों की समान नागरिक संहिता और भारत में लागू कानूनों का अध्ययन करे और सबकी अच्छाइयों को मिलाकर एक भारतीय नागरिक संहिता का एक ड्राफ्ट तैयार कर वेबसाइट पर डाल दे, जिससे इस विषय पर सार्वजनिक चर्चा शुरू हो सके.

दिल्ली हाईकोर्ट ने 31 मई को समान नागरिक संहिता पर सरकार को नोटिस जारी किया था और 9 दिसंबर को सुनवाई है लेकिन कोर्ट के आदेश की प्रतीक्षा करने की बजाय सरकार को विधि आयोग को विकसित देशों की समान नागरिक संहिता और और भारत में लागू कानूनों का अध्ययन कर दुनिया का सबसे अच्छा और प्रभावी इंडियन सिविल कोड ड्राफ्ट करने का निर्देश देना चाहिए.

23 नवंबर 1948 को आर्टिकल 44 संविधान में जोड़ा गया था इसलिए सरकार को 23 नंवबर को पूरे देश में “समान अधिकार दिवस” मनाना चाहिए और देश के सभी विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में भारतीय नागरिक संहिता पर वाद-विवाद और निबंध प्रतियोगिता आयोजित करना चाहिए. भारतीय नागरिक संहिता पर जन-जागरण करने और आमराय बनाने के लिए यह सर्वोत्तम उपाय है.

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