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अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस एवं चुनौतियां

वैश्विक स्तर पर हर साल 21 सितंबर को अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस मनाया जाता है।  दुनिया भर में युद्ध और शत्रुता कम करने के उद्देश्य और शान्ति का विस्तार करने के संकल्प के साथ  सन  1981 में इसकी शुरुआत  हुई थी l सन 1981 से 2001 तक सितंबर माह के तीसरे मंगलवार को अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस मनाया जाता था । परंतु सन 2002 में इसकी तिथि 21 सितंबर निर्धारित कर दी गई |  सन 1954 में जापान ने संयुक्त राष्ट्र संघ को 116 किलो ग्राम की पीस बेल ( शांति की घंटी ) दान दिया था।   जिस पर “लंबे समय तक पूर्ण विश्व शांति जीवित रहे” शब्द खुदे हुए हैं । अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस के दिन यह बेल संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव द्वारा बजाई जाती है | अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस 2022 का विषय है : नस्लवाद  समाप्त करें , शांति का निर्माण करें l

आज विश्व के सम्मुख प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दोनों प्रकार के संकट हैं, प्रत्यक्ष संकटों में नाभिकीय खतरे,सीमा विवाद,  आतंकवाद आदि प्रमुख हैं । जबकि अप्रत्यक्ष संकटों में आर्थिक असमानता , जलवायु परिवर्तन,  ऊर्जा संकट , नस्लवाद , व मानवाधिकारों का उल्लंघन आदि शामिल हैं l

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द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात 24 अक्टूबर 1945 को संयुक्त राष्ट्र संघ अस्तित्व में आया इसका मुख्य उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा को बनाए रखना है परंतु सबसे बड़ी विडंबना यह है कि संयुक्त राष्ट्र संघ  जैसी वैश्विक संस्था जिसके 193 सदस्य हैं अपने ही सदस्य राष्ट्रों के आपसी विवादों के कारण उद्देश्यों  को पाने में असफल रहा है l सुरक्षा परिषद जैसी जिम्मेदार इकाई के देशों ( चीन , अमेरिका, रूस,  फ्रांस और इंग्लैंड ) ने  अपने निजी स्वार्थों और प्रतिद्वंदिता के कारण वैश्विक शांति को हमेशा प्रभावित किया है |

भू-मंडलीकरण के इस युग में समस्त राष्ट्र परस्पर आत्मनिर्भर हैं । पड़ोसी एवं क्षेत्रीय राष्ट्रों के विवादों ने संपूर्ण विश्व को किसी न किसी तरह प्रभावित किया है|  कभी-कभी सामरिक वातावरण भी शांति प्रिय लोगों को युद्ध की वेदी पर आहुति देने पर मजबूर कर देता है। प्रथम एवं द्वितीय विश्व युद्ध इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है l

आज अगर हम देखें तो वैश्विक शांति को सबसे बड़ा खतरा पड़ोसी राष्ट्रों के आपसी विवादों से या किसी महाशक्ति के हस्तक्षेप से है। उत्तर कोरिया-दक्षिण कोरिया , इजराइल-फिलिस्तीन , भारत-पाकिस्तान , आर्मेनिया -अज़रबैजान , चीन का दक्षिण चीन सागर में अवैध दावा ,चीन-ताइवान विवाद,  ईरान-सऊदी अरब विवाद और मुख्य रूप से रूस-यूक्रेन युद्ध ने तो शांति की समस्या के साथ-साथ खाद्य सुरक्षा , आर्थिक संकट ऊर्जा संकट जैसी चुनौतियों को बढ़ा दिया है।

शांति:! शांति:!  शांति:! भारतीय संस्कृति का  मूल मंत्र है | जिसमें  से कामना की गई है कि शांति त्रिलोक में ,जल में ,थल में ,गगन में ,अंतरिक्ष में , अग्नि में ,पवन में , औषधि में , वनस्पति में , वन–उपवन में,  सकल विश्व में , नगर, ग्राम और भवन में जीव मात्र के तन, मन और जगत के कण-कण में हो | साथ ही साथ वसुधैव कुटुंबकम अर्थात संपूर्ण पृथ्वी को एक परिवार मानकर  शांति की कामना की गई है |

भारत ने विश्व को हमेशा से शांति का मार्ग दिखाया है| महात्मा बुद्ध के पंचशील सिद्धांत और गांधी जी के सत्य, अहिंसा और न्याय के रास्ते ने मानव समाज को संघर्ष की स्थिति में भी शांतिपूर्ण तरीके से कैसे अपने उद्देश्यों को पूर्ण किया जाए यह मार्ग प्रशस्त किया है| यही शांतिपूर्ण आचरण भारतीय नीति निर्माताओं के व्यवहारों में हमेशा दृष्टिगत हुआ है । अभी हाल ही में समरकंद में शंघाई सहयोग संगठन की 22 वी  वार्षिक बैठक (15-16 सितंबर 2022 ) में भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी  ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से कहा “यह युद्ध का युग नहीं है,  हमें शांति की बात करनी चाहिए ” साथ ही उन्होंने लोकतंत्र, संवाद और कूटनीति के महत्व पर जोर दिया । अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के महान यथार्थवादी विचारक हंस जे मोर्गेंथाऊ ने भी “शांतिपूर्ण तरीकों के माध्यम से राष्ट्रीय हितों को बढ़ावा देना कूटनीति के रूप में रेखांकित किया है” l

वैश्विक शांति को युद्ध की विभीषिका से बचाने के लिए भारतीय प्रयासों की प्रशंसा की जानी चाहिए। एक तरफ तो भारत ने दो  चिर प्रतिद्वंदी राष्ट्रों पाकिस्तान एवं चीन को नियंत्रण में रखा है साथ ही साथ अन्य छोटे पड़ोसी राष्ट्रों को ‘बिग ब्रदर सिंड्रोम’ से बचाया है। भारतीय विदेश नीति पंचशील , गुटनिरपेक्षता, उपनिवेशवाद ,साम्राज्यवाद , नस्लवाद का विरोध, गुजराल सिद्धांत,  पड़ोसी प्रथम की नीति रही है। इसका उद्देश्य राष्ट्रीय हितों एवं सार्वभौमिक वैश्विक शांति की प्राप्ति,  राष्ट्रीय स्वतंत्रता का परिरक्षण एवं निशस्त्रीकरण रहा है । आज विश्व के सम्मुख सबसे ज्यादा चुनौतियां हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक सुरक्षा का पर्याय बन चुकी है ।

साइबर और इनफॉर्मेशन युद्ध के इस युग में  कोई भी छोटा राष्ट्र हाइब्रिड-युद्ध के माध्यम से अपने से शक्तिशाली राष्ट्र को अप्रत्यक्ष युद्ध लड़ कर पराजित कर सकता है। राष्ट्र की सुरक्षा के साथ-साथ मानव सुरक्षा भी आवश्यक है जिसका ध्येय “भय  के साथ–साथ अभाव से मुक्ति है” l

विश्व के समस्त राष्ट्र अपनी अर्थव्यवस्था को कितना भी मजबूत कर ले परंतु अगर वे मानव विकास एवं अपने नागरिकों का कल्याण नहीं करेंगे और  साथ ही साथ अपने पड़ोसी देशों के साथ संवाद , सहयोग और कूटनीति के माध्यम से अच्छे संबंध  नहीं बनाएंगे  तब तक वैश्विक शांति को प्राप्त करना एक चुनौती रहेगा l पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेई ने कहा था “इतिहास बदला जा सकता है, मगर भूगोल नहीं बदला जा सकता , आप दोस्त बदल सकते हैं, पड़ोसी नहीं बदल सकते” । अतः पड़ोसी राष्ट्रों से मित्रवत संबंध बढ़ाने चाहिए क्योंकि पड़ोसी राष्ट्रों से विवाद सुरक्षा एवम विकास के मार्ग में बाधा उत्पन्न करता है l

देवकी नंदन :- शोध छात्र, रक्षा स्ट्रेटेजिक एवम भू–राजनीति अध्ययन विभाग (गढ़वाल केन्द्रीय विश्वविद्यालय)

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