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नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला बना सामाजिक मेल जोल और वैचारिक आदान प्रदान का केंद्र भी

जनवरी माह की ठिठुरन भरी सर्दी में भी दिल्ली वासी जोश से लबालब, कोई शांल ओढे, कोई जैकेट पहने तो कोई मफलरों के बोझ तले दबा हुआ सा , सर्दी पर विजय पाने के सारे हथियार इकट्ठे कर पहुंच जाते हैं प्रगति मैदान विश्व पुस्तक मेले का लुत्फ उठाने! यह एक ऐसा पुस्तक मेला है जिसकी हर साल दिल्ली वासियों को बेसब्री से प्रतीक्षा रहती है. और इस मेले की विशिष्टता यह है कि यह पुस्तकों के परे जाकर भी एक मेले की भूमिका बखूबी निभाता है. एक ऐसा मेला जहां दोस्त, परिवारवाले सामाजिक तौर पर मिलते है, मस्ती भरे अंदाज़ में घूमते फिरते हैं, हंसी ठिठोली करते हैं और बीच बीच में किताबों के स्वाद का लुत्फ उठाते हैं. आज के दौर में जब तकनीक मानवीय रिश्तों पर हावी हो गयी है, विश्व पुस्तक मेला एक आशा की किरण बनकर उभरता है. ये दिल्ली वासियों के लिये एक बहाना सा बन जाता है फिर से उस अपनत्व से परिपूर्ण पुरानी तरह की जिंदगी जीने का. अड्डेबाज़ी, सकरात्मक बहसबाज़ी और सामाजिक सौहार्द, विश्व पुस्तक मेला इन सब चीज़ों को जैसे पुन: जीवंत कर देता है.

पुस्तक मेले के हांलों के बाहर प्रगति मैदान परिसर में भी लगातार भीड़ लगी रहती है. यहां आपको लोग लगातार सेल्फी लेते, आपस में आत्मीयता पूर्ण ढंग से बतियाते और किताबों पर बातचीत करते हुए मिलेंगे. गांवों, कस्बों के मेले हाटों का सा वातावरण बन जाता है यहां.तो पुस्तकों के विषय मे किसी को अधिक जानकारी यदि न भी हो तो भी वो इस मेले से खुश और एक नयी ऊर्जा से परिपूर्ण होकर ही वापस लौटता है. ऐसा है इस मेले का आकर्षण.

यहां पुस्तक प्रेमियों के लिये भारी डिस्काउंट पर भी पुस्तकें उपलब्ध हैं. अंग्रेज़ी प्रकाशनों के हांल में ऐसे कई स्टाल्स थे जहां पे पुरानी य सेकेंड हैंड पुस्तकें बहुत ही कम दामों पर उपलब्ध थीं. कही आप मात्र 100 रुपये में ही तीन पुस्तकें खरीद सकते थे तो कहीं 200 रुपये में. और अठारहवीं शताब्दी के अंग्रेज़ी साहित्य से लेकर बीसवीं शताब्दी के पांपुलर अंग्रेज़ी साहित्य तक और कला से लेकर संस्कृति के विवेचन से संबंधी नायाब पुस्तकें भी ऐसे स्टांलों पर उपलब्ध थीं. बस नज़र पारखी होनी चाहिये और खोजने के लिये पर्याप्त समय.

तो विश्व पुस्तक मेले में जाने के लिये तो अब आपको अगले वर्ष तक प्रतीक्षा करनी पडेगी लेकिन मेले का कुछ कुछ वातावरण हमने शब्दों के ज़रिये उकेरने का प्रयास किया है, आशा है उससे आपको मेले की कुछ कुछ खुशबू तो मिलेगी.

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Rati Agnihotri

Rati Agnihotri

रति अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों में कवितायें लिखती हैं. इनका अंग्रेज़ी का पहला कविता संग्रह ‘ द सनसेट सोनाटा’साहित्य अकादमी से प्रकाशित हुआ है. रति की हिंदी कवितायें पाखी, संवदिया, परिकथा, रेतपथ, युद्धरत आम आदमी, हमारा भारत आदि साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं. रति दिल्ली में ‘ मूनवीवर्स – चांद के जुलाहे’ के नाम से एक पोएट्री ग्रुप चलाती हैं जहां कविता को संगीत, चित्रकला आदि विभिन्न विधाओं से जोड़ा जाता है और कविता से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विचार भी होता है. रति चीन के शिनुआ न्यूज़ एजेंसी के नई दिल्ली ब्यूरो में बतौर टी वी न्यूज़ रिपोर्टर कार्य कर चुकी हैं. रति आजकल स्वतंत्र पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं. रति ने दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस कांलेज से अंग्रेज़ी विशेष में बी ए आनर्स किया है और इंग्लैंड के लीड्स विश्वविद्यालय से अंतराष्ट्रीय पत्रकारिता में एम ए किया है.

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1 Comment

  1. Avatar Bhadresh Mistry says:

    Sandeep Sir, I am watching your videos on Youtube daily and I am supersize that our sants are not reacting (Shree Shree Ravi sankar, Baba Ramdev, Sadhguru,Chidanand Saraswati against the CAA. Why they are silent?

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