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एक ट्वीट और बरखा हुईं हिन्दू आतंकवादी

यह ज़िन्दगी बहुत अजीब है और इसके मोड दिलचस्प भी हैं।  इतने दिलचस्प कि आप समझ नहीं पाते कि रोया जाए या हंसा जाए! कही कभी हम रोते रोते हंस पड़ते है और हँसते हँसते रो पड़ते हैं।  और कभी कभी तटस्थ रहते हुए हैरानी से उछल जाते हैं।  यह हैरानी एक अजीब शै है, कभी भी आपको इधर या उधर खड़ा कर देती है।  और आपको एक अजीब मुकाम पर ला देती है।

आज बात करते हैं बरखा दत्त की।  वैसे तो उनकी उपलब्धियों के विषय में कुछ कहा नहीं जा सकता है। हम आम लोगों की समझ से भी परे है उनकी उपलब्धियां, उनके कार्य।  उनके कार्य तो पिछली यूपीए की सरकार में इतने महान थे कि साधारण मंत्रालयों को लेना देना तो चलता ही रहता था।  उनकी उपलब्धियों में से एक जो सबसे बड़ी उपलब्धि थी वह थी दंगों को या हिन्सा को एक रंग दे देना।  छोटी छोटी बातों पर लड़ने वाले बच्चों को हिन्दू और मुसलमान कर देना।  हर चीज़ को हिंदु और मुसलमान करते हुए हिन्दुओं को दोषी ठहरा देना।  

और उनकी एक और उपलब्धि थी कि जैसे वह मंत्रालय तय कर दिया करती थीं, वैसे ही वह सेना के गूढ़ क़दमों की भी जानकारी ले आती थीं। मुम्बई में हुए आतंकी हमलों में उन पर आरोप लगा था कि उन्होंने उन लोगों के कमरों की लोकेशन भी टीवी पर बता दी जो अपनी जान बचाने का हर संभव प्रयास कर रहे थे।  और टीवी पर आतंकवादियों तक उनकी बात पहुँची जिससे कहा जाता है कि वह मेहमान मारे गए।

इतना ही नहीं, हाल ही में सीएए विरोधी आन्दोलनों में उनकी उपलब्धि और निखर कर आई जब वह खुले आमउस आन्दोलन में सरकार को घेरती हुई नज़र आईं जो आन्दोलन भारतीय लोकतंत्र के मंदिर संसद में दोनों ही सत्रों में बहुमत से पारित हुआ था।  वह इस सरकार को घेरने का कोई भी मौक़ा नहीं छोड़ती हैं।  और इसी मौके का फायदा उठाकर वह देश विरोधी और जन विरोधी आन्दोलन को समर्थन देती रहीं।

कश्मीर में आतंक का पर्याय बन चुके बुरहान वानी को एक भटका हुआ युवक बनाने की उनकी उपलब्धि के तो पूरे कश्मीरी मुसलमान कायल थे।  वह बरखादत्त को अपना समझते थे।  उनके लिए बरखा उनकी अपनी हुआ करती थीं।  कश्मीरी मुसलमान इसलिए कहा क्योंकि नब्बे के दशक में हुए कश्मीरी पंडितों के मुसलमानों द्वारा नरसंहार एवं बेबस कश्मीरीहिन्दुओं के पलायन के लिए उन्हें ही दोषी ठहरा दिया था।  

मगर कहा जाता है कि हर रिश्ते की एक उम्र होती है।  महान पत्रकार बरखा दत्त ने मुसलमानों या कहें कश्मीरी मुसलमानों के लिए क्या क्या नहीं किया? कितनी बार गलत खबरें बनाईं होंगी, कितनी ही बार सेना पर आरोप लगाए होंगे और न जाने कितनी बार स्थानीयों का इमेज मेकओवर किया होगा।  मगर क्या यह इमेज मेकओवर करना उन्हें मुस्लिमों की निगाह में फ़रिश्ता साबित कर सका? क्या मुसलमानों ने उन्हें अपना माना? यदि आज वह अपील मेरी आँखों के सामने से होकर नहीं गुजरती तो मुझे यकीन ही न होता कि महज़ एक ट्वीट, जी हाँ शायद एक ही ट्वीट जिसमें बरखा दत्त ने कश्मीर में  एक मासूम की जान बचाने के लिए सीआरपीएफ की तारीफ़ भर कर दी थी, और शायद यही कारण था कि उनसे उनके वही लोग नाराज़ हो गए, खफा हो गए जिनकी तारीफ़ में वह बिछी बिछी जाती थीं।  

जिनकी शान में वह कसीदे गढ़ा करती थीं, जिनके लिए वह हिन्दुओं को हर हाल में दोषी ठहराया करती थीं, और जिनके झूठे जख्मों पर वह मरहम लगाया करती थीं, वह उन्हें हिन्दू आतंकवादी कह रहे हैं।आतंकवादी का तमगा तो ठीक है, यह बहुत अजीब है कि बरखादत्त को हिन्दू बोला जाए।  एक बार बरखादत्त आतंकवादी होने का तो तमगा झेल लें, मगर वह यह दर्द कैसे झेल पाएंगी कि उन्हें हिन्दू कहा गया? खुद के लिए हिन्दू टैग शायद सबसे बड़ा दुःख होगा। खैर change.org पर जो अपील की गयी है उसमें यह लिखा गया है कि भारतीय पत्रकार, बरखा दत्त भारत प्रशासित कश्मीर में भारत सरकार द्वारा किए जा रहे अत्याचारों का समर्थन करती हैं, अत: उन्हें वाशिंगटन पोस्ट से कॉलम लिखने के काम से निकाला जाए।  

आप बरखा दत्त का दर्द समझ सकते हैं, एक तरफ इस अपील में जो कमेन्ट आए हुए हैं, उनमें उन्हें हिन्दू आतंकवादी कहा गया है और अपील में भारतीय!  जबकि दिल से बरखा दत्त ने खुद को भारतीय कब माना होगा समझ नहीं आता।  वर्ष 2019 में भारत में हुए चुनावों से ज्यादा खुशी बरखा दत्त को पाकिस्तान में इमरान खान के प्रधानमंत्री बनने पर हुई होगी, ऐसा उनके चेहरे की खुशी से लगता था।  

खैर, आज उस अपील पर कई कश्मीरी मुस्लिमों के हस्ताक्षर हैं , जो यह कह रहे हैं कि बरखा को पत्रकारिता नहीं आती, वह सरकार के पैर छूती है आदि आदि।  मगर जो सबसे बड़ा दुःख है बरखा का वह है उन्हें भारतीय और हिन्दू कहा जाना। बात यह है बरखा जी, कि आप चाहे खुद को भारतीय या हिन्दू माने या नहीं, जिन लोगों के साथ आप इस समय हैं, उनकी नजर में आप केवल एक हिंदु और भारतीय हैं और इस नाते वह आपसे भी उतनी ही नफरत करते हैं, जितनी बाकी काफिरों से करते हैं।  और वह अपील इस बात की गवाह है।

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Sonali Misra

Sonali Misra

सोनाली मिश्रा स्वतंत्र अनुवादक एवं कहानीकार हैं। उनका एक कहानी संग्रह डेसडीमोना मरती नहीं काफी चर्चित रहा है। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति कलाम पर लिखी गयी पुस्तक द पीपल्स प्रेसिडेंट का हिंदी अनुवाद किया है। साथ ही साथ वे कविताओं के अनुवाद पर भी काम कर रही हैं। सोनाली मिश्रा विभिन्न वेबसाइट्स एवं समाचार पत्रों के लिए स्त्री विषयक समस्याओं पर भी विभिन्न लेख लिखती हैं। आपने आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में परास्नातक किया है और इस समय इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से कविता के अनुवाद पर शोध कर रही हैं। सोनाली की कहानियाँ दैनिक जागरण, जनसत्ता, कथादेश, परिकथा, निकट आदि पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।

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12 Comments

  1. Avatar PRABHAT KR RAI says:

    Very good ayalysis

  2. Avatar अजित प्रसाद says:

    न खुदा ही मिला न बिसाले सनम
    न इधर के रहे न उधर के रहे

    बरखा बी की संक्षिप्त कहानी

  3. Avatar Tanvi says:

    लपेट लपेट कर मारा है शब्दों से. बहुत अच्छा आर्टिकल.

  4. Avatar NISHANT says:

    बहोत हि बेहतरीन तरीका से लिखा है छोटी-से-छोटी और बड़ी-से-बड़ी चिजों को बहोत ही रोचक ढँग से शब्द दिया है👍👍👍👍👍👍👍👌👌👌👌👌👌👌👌

  5. Avatar Lokesh Gupta says:

    बहुत ही खूबसूरती से लिखा है आर्टिकल।

  6. Avatar Girish Deshmukh says:

    बहुत अच्छा उनको समझाया लेकीन वह समझेगी तब ना !

  7. Sonaali Mishra Sonaali Mishra says:

    उन्हें शायद नहीं समझना है

  8. Avatar Monalika Shrivastav Gupta says:

    Once privileged elites of the country, these burka like journalists monopolized Govt cabinets, plum postings and other social and judicial benefits. Sharp social, economic and judicial disparities between the extremely privileged minority and poor Hindu Majority was the earliest reason for popular discontent.

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