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कंगना रनौत की लोकप्रियता को आप षड्यंत्रों के बादलों से घेर नहीं पाएंगे

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विपुल रेगे। कंगना रनौत की फिल्म ‘थलाइवी’ को बहुत अच्छी समीक्षाएं मिल रही हैं लेकिन हाल ही में उठे थियेटर विवाद के कारण इसे पर्याप्त शो नहीं मिल पा रहे हैं। विवाद के कारण एक अच्छी फिल्म की ओपनिंग बुरी तरह प्रभावित हुई है। इस प्रकरण से कंगना निराश दिखाई देती हैं क्योंकि उन्होंने जयललिता का चरित्र निभाने के लिए बड़ी मेहनत की थी। कई शहरों के सिनेमाघरों ने ‘थलाइवी’ को उतने स्क्रीन नहीं दिए, जितने की वह हक़दार थी।

फिल्म प्रदर्शित होने से पूर्व कंगना ने कहा था कि ‘थलाइवी’ उनके करियर की अब तक की सर्वश्रेष्ठ फिल्म है और उन्हें विश्वास है कि यह दर्शकों को सिनेमाघरों में वापस लाएगी। हालांकि उन्हें नहीं मालूम था कि कुछ बड़े प्रोडक्शन स्टूडियो के पीछे से दबाव के चलते उनकी फिल्म अधिक से अधिक दर्शकों तक पहुँच ही नहीं सकेगी। इस विवाद के पीछे से बॉलीवुड और महाराष्ट्र सरकार की झलक आसानी से देखी जा सकती है।

बॉलीवुड के कुछ लोग चाहते थे कि कंगना की इस बहुचर्चित फिल्म को दर्शक ही न मिले। थिएटर मालिक और फिल्म निर्माता के बीच चार सप्ताह का अनुबंध होता है किन्तु थलाइवी को केवल दो सप्ताह का ‘विंडो’ दिया गया। कंगना ने कहा कि फिल्म निर्माताओं ने थियेटर में रिलीज के लिए बहुत से डिजिटल प्रस्ताव अस्वीकार कर दिए। उन्होंने कहा कि फिल्म की लागत वसूल करने के लिए हमें केवल दो सप्ताह का ‘विंडो’ मिला है।

ऐसा लगता है परदे के पीछे से कंगना रनौत के साथ बड़ा खेल किया जा रहा है। आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, तेलंगाना और कर्नाटक में फिल्म का प्रदर्शन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। केरल और तमिलनाडु में कोविड मामलों का बहाना लेकर प्रदर्शन नहीं होने दिया जा रहा है। प्रश्न ये भी उठता है कि हिन्दी पट्टी में फिल्म को केवल दो सप्ताह का समय और कम स्क्रीन क्यों दिए गए हैं।

एक स्तरीय फिल्म की लोकप्रियता को इस तरह नष्ट नहीं किया जा सकता। जहाँ भी ये फिल्म प्रदर्शित हुई है, इसे तगड़ा रिस्पॉन्स मिल रहा है। कंगना ने सिद्ध कर दिया है कि वर्तमान दौर की सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री वे ही हैं। इस प्रकरण से ये भी समझ में आता है कि बॉलीवुड के नामचीन स्टूडियो अपने एकाधिकार को बनाए रखने के लिए कैसे षड्यंत्र कर रहे हैं।

उनके प्रोडक्शन हॉउस दक्षिण भारतीय फिल्मों के स्तर को छू नहीं पाते हैं, इसलिए वे इस तरह के षड्यंत्र रचते हैं। हालांकि कंगना रनौत की फिल्म के लिए कहा जा सकता है कि सूर्य की चमक को बादल अधिक देर तक रोक नहीं सकते। वह बादलों को भेदकर भूमि को छू लेती है।

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Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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