ढाकाः हसीना और तस्लीमा——दोनों सही

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Posted On: July 5, 2016

डॉ.वेदप्रताप वैदिक

ढाका में आतंकवादियों ने जो नर-संहार किया, वह अपने आप में अपूर्व था। मुझे ऐसा याद नहीं पड़ता कि किसी मुस्लिम देश में आतंकी घटना घटी हो और मरेनवाले ज्यादातर लोग गैर-मुसलमान हों या विदेशी हों। ढाका में जो लोग मारे गए हैं, उनमें इतालवी, जापानी, अमेरिकी और भारतीय लोग हैं। एक-दो बांग्लादेशी भी चपेट में आ गए हैं। ऐसा कैसे हुआ? ढाका की गुलशन झील पर बने इस केफे (होली आर्टिजान केफे) में ज्यादातर विदेशी ही जाते हैं। इन विदेशियों को ही निशाना क्यों बनाया गया? क्योंकि इस्लामी राज्य याने ‘दाएश’ के गुर्गे सीरिया और एराक में जगह-जगह मात खा रहे हैं। उनका मनोबल रसातल में पहुंच गया है। इसीलिए वे अपनी तुर्की, अफगान, पाक, भारत और बांग्ला शाखाओं को उकसा रहे हैं कि वे ऐसी कार्रवाइयां करें, जिससे सारी दुनिया कांप उठे। अभी इस्तांबूल की स्याही सूखी भी नहीं थी कि ढाका को इन ‘दाएश’ आतंकवादियों ने खून में नहला दिया। ढाका से कोलकाता ज्यादा दूर नहीं है।

बांग्ला प्रधानमंत्री शेख हसीना ने इस घटना की कड़ी निंदा की है लेकिन उन्होंने उसे रोकने के लिए कोई कड़ी कार्रवाई की हो, इसका कुछ पता नहीं है। बांग्लादेश से आए दिन खबरें फूट रही हैं कि हिंदू पुजारियों, धर्म-निरपेक्ष विद्वानों और पत्रकारों तथा अतिवादी इस्लाम के विरोधी मुसलमान बुद्धिजीवियों की हत्याएं हो रही हैं। यदि हसीना इन हत्यारों पर टूट पड़तीं तो क्या ढाका में ऐसा वीभत्स कांड हो सकता था? ढाका के इन हत्यारों ने कुरान शरीफ की आयतें बोलनेवालों को माफ कर दिया और न बोलनेवालों को मार दिया। इसका क्या मतलब? यही कि इन आतंकवादियों ने इस्लाम को ही अपना आधार बना रखा है लेकिन हसीना कहती हैं कि इस्लाम तो सलामती का मजहब है। इन हत्यारों का मज़हब तो सिर्फ आतंकवाद है। तसलीमा नसरीन का कहना है कि हसीना का यह बयान सच्चाई के विपरीत है, क्योंकि यदि वे आतंकवादी इस्लामपरस्त नहीं होते तो सिर्फ मुसलमानों को क्यों बख्शते? बात तो दोनों महिलाओं की सही मालूम पड़ती है लेकिन हम एक तथ्य न भूलें। मजहब वही है, जो आपको अपने चश्मे से दिखाई पड़ता है। दोनों महिलाओं के चश्मों के एक-एक शीशे को साथ में रखकर देखें तो शायद पूरा दृश्य हमें साफ-साफ दिखने लगे।

अर्थात आतंकवाद चाहे जैसा हो, इस्लामी हो या गैर इस्लामी, शिया हो या सुन्नी, अरबी हो या फारसी, पठानी हो या उजबेकी, वह चाहे जो नाम रख ले, वह त्यागने लायक है। राज्य कैसा भी हो, किसी का भी हो, उसका फर्ज है कि वह अपने नागरिकों की रक्षा हर कीमत पर करे।

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