जेटली के जाते ही चिदंबरम पर चार्जशीट दाखिल, संकट में चिदंबरम का पूरा परिवार!

केंद्रीय अण्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने एयरसेल-मैक्सिस मामले में अपनी चार्जशीट दाखिल कर दी है। अपने इस आरोप पत्र में सीबीआई ने पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम और उसके बेटे कार्ति चिदंबरम के अलावा 16 अन्य लोगों को आरोपी बनाया है। वैसे तो चिदंबरम के खिलाफ जांच बहुत पहले से चल रही थी, लेकिन कार्रवाई नहीं हो पा रही थी। जैसे ही केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली से मंत्रालय का कार्यभार पीयूष गोयल के हाथ में आया है कार्रवाई में उल्लिखित तेजी आई है। कहने का मतलब साफ है कि जेटली के जाते ही जांच एजेंसी ने चिदंबरम के खिलाफ शिकंजा कस दिया है। सीबीआई ने भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत चिदंबरम समेत सभी आरोपियों के खिलाफ आरोप तय कर दिए हैं। इसी मामले में कुछ दिन पहले चिदंबरम के बेटे कार्ति चिदंबरम को गिरफ्तार किया गया था।

मुख्य बिंदु

* सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में 16 अन्य लोगों के अलावा पी चिदंबरम और उनके बेटे कार्ति चिदंबरम को आरोपी बनाया है

* वर्तमान सरकार के अधिकारी भी चिदंबरम को बचाने में लगे थे, विभाग के हर फैसले की सूचना पीसी बेडरूम तक पहुंच जाता था

देश में शायद ही ऐसा बड़ा घोटालो हो जिसमें पी चिदंबरम या उसके परिवार के सदस्यों का नाम न रहा हो। एक प्रकार से पी चिदंबरम घोटाले के पर्याय बन चुके हैं। जांच भी हुई है और तथ्य भी सामने आए हैं फिर भी मोदी सरकार में बैठी कोई अदृश्य शक्तियां उनकी ढाल बनी हुई थी। भाजपा के वरिष्ठ नेता सुब्रमनियन स्वामी ने भी कई बार सवाल उठाए बल्कि सरकार को इस संदर्भ में कई बार चिट्ठी तक लिखी, लेकिन कार्रवाई की खानापूर्ति होती रही। कभी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। कई बार तो जांच एजेंसियों के आंतरिक फैसले उचित स्थान पर पहुंचने से पहले चिदंबरम के जोरबाग स्थिति घर के बेडरूम में पहुंच जाते थे। मंत्री नहीं रहने के बाद भी यह सिलसिला जारी रहा। चिदंबरम ने इस सिस्टम में अपने इतने नजदीकी अधिकारी खड़े कर रखे हैं कि वे खाते तो सरकार के हैं लेकिन नौकरी सिर्फ चिदंबरम की बजाते रहे हैं।

जब तक सत्ता में थे तब तक लाभ पहुंचाकर अधिकारियों को अपने पाले में कर रखा था और जब सत्ता से बाहर हुए तो फिर अधिकारियों को खरीदकर या उसे तोड़कर अपने रास्ते से अलग कर दिया। चिदंबरम अपने खिलाफ जांच करने वाले अधिकारियों का बेड़ा गर्क करने का कोई प्रयास छोड़ा नहीं। तभी तो प्रवर्तन निदेशालय के वरिष्ठ जांच अधिकारी राजेश्वर सिंह ने चिदंबरम पर अपनी जिंदगी को नरक बना देने का आरोप लगाया है।

ईडी के वरिष्ठ अधिकारी राजेश्वर सिंह अपने ही विभाग और उसके निदेशक के नाम 11 जून को पत्र लिखकर कहा है कि पी चिदंबरम ने अपने मामले की जांच के रास्ते से हटाने के लिए उनके जीवन को नरक बना दिया। राजेश्वर सिंह ने लिखा है कि चूंकि मैं उनकी और उनके बेटे कार्ति चिदंबरम पर एयरसेल-मैक्सिस मामले में लगे आरोपों की जांच कर रहा था। जबकि चिदंबरम नहीं चाहते थे कि मैं उनकी जांच करूं। इसलिए उन्होंने मुझे अपनी जांच से हटाने के लिए हर प्रकार से परेशान करना शुरू कर दिया। उन्होंने अपने वरिष्ठ अधिकारियों पर भी घोटालेबाजों और उसके सहयोगियों की मदद करने का आरोप लगाया।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि पी चिदंबरम ने अपने रास्ते से राजेश्वर सिंह जैसे ईमानदार अधिकारी को हटाने का हर जतन किया। उनकी छवि धूमिल करने के लिए उपेंद्र राय तथा खुद के खोजी पत्रकार कहने वाले रजनीश कपूर के माध्यम से उनके खिलाफ केस करवाया। वैसे भी राजेश्वर सिंह अकेले ऐसे अधिकारी नहीं हैं बल्कि उनके जैसे कई अधिकारियों को अपने गुर्गों के माध्यम से परेशान कराया गया। जिन अधिकारियों ने उनकी बात नहीं मानी उन्हें परेशान किया। और यह सिलसिला यूपीए सरकार से एनडीए सरकार तक चलता रहा। लेकिन वहीं भारतीय जनता पार्टी के नेता सुब्रमनियन स्वामी चट्टान की तरह राजेश्वर सिंह के पक्ष में खड़े रहे।

स्वामी अक्सर सरकार को पत्र लिखकर चिदंबरम और उनके पुराने अधिकारियों की कार्य प्रणाली से अवगत कराते रहे और बताते रहे कि किस प्रकार सरकार के अपने ही लोगों के कारण चिदंबरम पर उचित कार्रवाई नहीं हो रही है? सुब्रमनियन ने इस मामले में तो कई बार केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली का नाम लेकर कहा हे कि वही चिदंबरम की ढाल बने हुए हैं। सुब्रमनियन स्वामी की यह आशंका आज सच साबित हुई है। क्योंकि बीमारी की वजह से जेटली से वित्त मंत्रालय का प्रभार लेकर जब से पीयूष गोयल को दिया है, तब से कार्रवाई में तेज आई है।

आज जब चिदंबरम बाप-बेटे के खिलाफ सीबीआई ने चार्जशीट दाखिल की है तो सुब्रमनियन स्वामी ने भी खुशी जताई है। उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा है कि यह सुनकर खुशी हुई कि आखिर सीबीआई ने पीसी (पी चिदंबरम) तथा बीसी (बच्चा चिदंबरम) के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दी है। इसके लिए हमे नरेंद्र मोदी जी को धन्यवाद देना चाहिए कि आखिर उन्होंने रास्ते में आने वाले बाधा को दूर करते हुए सीबीआई निदेशक वर्मा तथा संयुक्त निदेश एक के शर्मा को इस मामले को एक तार्किक परिणति तक पहुंचाने की अनुमति दी। निश्चित रूप से यह एक सराहनीय कदम है।

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