हरतालिका तीज और हिंदू दर्शन!

आज हमारे यहां हरतालिका तीज है। गांव में मां, और यहां दिल्ली में श्रीमती श्वेता देव और मेरे छोटे भाई की पत्नी मीनू देव, अपने अपने पति के लिए व्रत की हुई हैं। मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शंकर को पति के रूप मे़ पाने के लिए यह व्रत किया था।

गौरी के पिता हिमवान उनकी शादी भगवान विष्णु से करना चाहते थे। गौरी की जिद थी कि वह महादेव से ही विवाह करेंगी। फिर सखियों के साथ गौरी शिव की तपस्या के लिए वन की ओर गमन कर गयी। माना गया कि सखियां उन्हें हर कर ले गयीं, इसलिए इसका नाम हरतालिका तीज पड़ा।

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हरतालिका तीज भादो, शुक्‍ल पक्ष तृतीया को मनाई जाती है, जो इस बार आज यानी 12 सितंबर को है। पति के लिए अलग-अलग प्रांतों में अलग-अलग व्रत महिलाएं रखती हैं। महाराष्ट्र में करवा चौथ तो उत्तर भारत में हरतालिका तीज रखते हैं। राजस्थान में कजरी तीज तो दिल्ली में हरियाली तीज मनाते हैं।

मुझे वह समय याद आता है, जब मैं समाजशास्त्र से पढ़ाई कर रहा था और वामपंथी साथियों और प्रोफेसरों की संगत में था। मेरे एक प्रोफेसर मुसलिम थे, और घोर वामपंथी थे। वो कहते थे कि सारी हिंदू परंपरा और त्यौहार पुरुषवादी हैं। महिलाओं के दमन पर आधारित हैं। महिलाएं ही पुरुष के लिए व्रत क्यों रखती हैं, पुरुष क्यों नहीं रखते?

बड़ा ही समानतावादी यूटोपियाई विचार की ध्वनि करता था यह। १९९० का दशक था। तब ‘दिलवाले दुल्हनिया’ फिल्म आयी थी, जिसमें नायक नायिका के साथ करवा चौथ का व्रत रखता है। युवाओं के सिर चढ़ कर बोला था वह सीन। युटोपियाई विचार ने कमाल दिखाया, और पुरुष व्रत रखने लगे। समाजशास्त्र में मैकिम मेरियट ने जिसे लघु एवं वृहत परंपराओं के माध्यम से समझाया है, बहुत कुछ वैसा ही।

उसी दौर में मैं प्रेम से गुजर रहा था। प्रेम की अनुभूति ने एक अलग धरातल पर खड़ा कर दिया, जहां किताबी फिलोसॉफी, सिनेमाई अंधानुकरण या यूटोपियाई विचार के लिए कोई जगह नहीं होता। वहां होता है केवल मूल स्वभाव और एक-दूसरे के लिए समर्पण।

स्त्री और पुरुष का मूल स्वभाव अलग है। एक पुरुष किसी स्त्री के स्त्रैण ऊर्जा के कारण खि़चता है, और स्त्री किसी पुरुष के अंदर की पुरुष ऊर्जा के कारण। चूंकि दोनों का निर्माण आधी स्त्री और आधे पुरुष ऊर्जा के संयोग से हुआ है, इसलिए दोनों का व्यक्तित्व अपने उस अधूरेपन को पूरा करने लिए विपरीत स्वभाव की ओर आकर्षित और फिर उसके प्रेम में पड़ जाता है।

श्रृंगार व समर्पण स्त्री का मूल स्वभाव है तो महत्वाकांक्षा व अधीरता पुरुष का। मेरी पत्नी सजती संवरती, श्रृंगार करती है यह मुझे अच्छा लगता है, और मैं बाधाओं को पार करके कोई लक्ष्य हासिल करता हूं तो वह सबसे ज्यादा इसी से खुश होती है। मैं उसके लिए व्रत रखूं, वह उसे कभी पसंद नहीं आएगा, और वह समानता का दर्शन गढ़ते हुए सिगरेट का सुट्टा लगाए, यह मुझे पसंद नहीं आएगा।

जो पति अपने अधूरेपन को अपनी पत्नी में, और जो पत्नी अपने अधूरेपन को पति में पूरा करेगी, वास्तव में उनके दांपत्य जीवन की मिठास ही बची रहती है। यही कारण है कि विवाह के 19 साल बाद भी हमारा रिश्ता प्रेम से भरा, जीवंत और पानी सदृश्य तरल है!

हिंदू दर्शन ने मनुष्य के मूल स्वभाव पर काम किया है और मूल स्वभाव को ही धर्म कहा है। जबकि दुनिया के अन्य रिलीजन, मजहब और विचारों ने केवल बाहरी ढांचे को रंगने-पोतने का कार्य किया है। मैं खुश हूं कि इस महान सभ्यता में जन्म लिया, जिसने मनुष्य पर काम किया न कि सत्ता पर। धर्म, अर्थ, काम को साधन बनाकर प्रत्येक मनुष्य के लिए मोक्ष की कामना की, न कि किसी एक पुत्र या पैगंबर के लिए इसे आरक्षित रखा।

अपने मूल स्वभाव को पहचानिए, अपने साथी के मूल स्वभाव से परिचित होइए! जीवन खुशियों से भरी और रंगों से सराबोर है! यही सत्य है, यही शिव है, यही सुंदर है! सुखी दांपत्य और परिवार ही सनातन भारत की मूल आत्मा है।

URL: Hartalika Teej 2018- hindu ritual and importance for married women

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Sandeep Deo

Journalist with 18 yrs experience | Best selling author | Bloomsbury’s (Publisher of Harry Potter series) first Hindi writer | Written 8 books | Storyteller | Social Media Coach | Spiritual Counselor.

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