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तो क्या एससी/एसटी विधेयक में बदलाव के कारण लालू यादव डिप्रेशन में हैं?

पिछले तीन दशक से बिहार में यदि किसी एक जाति का दबदबा है तो वो यादव हैं। बिहार में समाजिक न्याय की राजनीति की अगुआई करने वाले यादव अब नव सवर्ण की कतार में सबसे आगे खड़े हैं। लेकिन मोदी सरकार द्वारा एससी/एसीटी एक्ट विधेयक में बदलाव ने सबसे ज्यादा खौफ क्या लालू यादव के मूल वोटरों के अंदर पैदा कर दिया है! एससी एसटी एक्ट पर मोदी सरकार के फैसले ने क्या विपक्ष की उस राजनीति में सेंध मार दी जिसकी अगुआई लालू यादव कर रहे थे? क्या अपनी राजनीतिक विरासत को नष्ट होते देख लालू डिप्रेशन में हैं? लालू की विरासत संभाल रहे तेजस्वी यादव ने पार्टी नेताओं के साथ बैठक के बाद भाजपा पर दलितों और ओबीसी (अन्य पिछड़ी जाति) के बीच लड़ाई कराने का बयान देकर बड़ा संकेत दिया है।

रांची से लगातार खबर आ रही है कि चारा घोटाले में सजा भुगतने के बदले अस्पताल में स्वास्थ्य लाभ ले रहे लालू यादव डिप्रेशन में हैं। वो लालू यादव जिसे देश उनके दबंगई और उच्च स्तर के कांफिंडेस के लिए ही जानता है! जो संसद और संसद के बाहर अपने चुटीले वाण से कद्दावर से कद्दावर नेताओं को घायल करते रहे हैं। यादव और मुस्लिम (एमवाई) वोट के सहारे लालू ने सालों तक अगड़े -पिछड़ों के नाम पर बिहार में एकछत्र राज किया। लेकिन एससी/एसटी एक्ट पर मोदी सरकार के फैसले ने मानो लालू की जमीन हिला दी है। वो इसलिए नहीं कि उन्हें दलित वोट खिसकर भाजपा के खेमें जाने का भय है इसलिए क्योंकि उन्हें समझ आ रहा है कि बदलते दौर में इस एक्ट की गाज बिहार यूपी में नव सवर्णों पर गिरेगा। ये अंडर करंट बिहार के नव सवर्णों को समझ में आने लगा है! यही कारण है कि एससी/एसटी एक्ट पर मोदी सरकार के फैसले पर तेजस्वी यादव यह कहने लगे कि भाजपा – आरएसएस की सरकार दलितों और पिछड़ों को लड़ाना चाहती है। इतना ही नहीं पिछले दिनों भारत बंद का असर बिहार में हुआ लेकिन प्रदेश की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी ने बंदी का क्रेडिट लेने से इंकार करते हुए इसके लिए पप्पू यादव को कटघरे में खड़ा करते हुए उन्हें भाजपा का एजेंट करार दिया।

जब कभी भारत बंद या बिहार बंद हुआ, बंद में लालू यादव की पार्टी ने बिहार में जमकर उत्पात मचाया, भय और आतंक का माहौल बनाया, पूरे दबंगई के साथ। उस उत्पात का क्रेडिट लेने से भी कभी इंकार नहीं किया ठीक वैसे ही जैसे अबकी बार पप्पू यादव ने बेशर्मी के साथ लिया। केंद्र सरकार विरोधी भारत बंद में यदि सबसे ज्यादा कोई नेता सुर्खियों में रहा तो वो पप्पू यादव थे लेकिन तेजस्वी ने उन्हें भाजपा का एजेंट बता दिया। दरअसल एससी/एसटी एक्ट पर बीजेपी को कटघरे में खड़ा कर राजनीतिक फायदा उठाने की रणनीति आत्मघाती साबित हो सकती है, सामाजिक न्याय का दंभ भरने वाली पार्टियों को इसका भय सताने लगा है। खास कर राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) जैसी पार्टी जिसका राजनीतिक वजूद ही मुस्लिम-यादव (एमवाई) समीकरण पर टिका हुआ है। लालू यादव को इतना तो पता है कि किसी भी परिस्थिति में खुलकर भाजपा के विरोध में खड़ा होने मात्र से मुस्लिम वोट बैंक तो उनका नहीं खिसकेगा लेकिन एससी एसटी विधेयक का विरोध नहीं करने की मार भविष्य में उनके मूल वोट बैंक के बुनियाद पर पड़ेगा।

लालू यादव को पता है कि 90 के दशक कि तरह उनके बेटे तेजस्वी के दौर में 17 फीसदी अनुसूचित जातियों का वोट बैंक उनके साथ नहीं है। लेकिन 15 प्रतिशत यादव आरजेडी का कोर वोट बैंक है। 17 प्रतिशत अनिश्चित वोट बैंक के लालच में कोर वोट बैंक को खौफ के भविष्य में छोड़ना आत्मघाती हो सकता है। नब्बे के दशक में लालू यादव ने हाशिए पर खड़ी जमात में जो क्रांति पैदा की उससे अनुसूचित जातियों से ज्यादा सशक्तिकरण यादवों का हुआ। जो आज तक कायम है। जातिवादी राजनीति की अगुआई करने वाले बिहार में अब यादव सबसे शक्तिशाली और दबंग जाति के रुप में सामने है। जो लगभग सौ प्रतिशत लालू यादव की पार्टी संग आज भी खड़ा है लेकिन बदलते दौर में सवर्णो के खिलाफ माहौल बनाने मात्र से उनके वोट पर एकछत्र राज करना अब संभव नहीं। क्योंकि उन्हें पता है कि जो हथियार सवर्णो को मारने के लिए दिखाए जा रहे हैं वो दरअसल बिहार के नव-सवर्णो को तबाह करने वाले हथियार हैं। इसीलिए राबड़ी देवी के 10 सर्कुलर मार्ग स्थित आवास में आरजेडी के वरिष्ठ नेताओं की बैठक में आगे की रणनीति तय करते हुए तेजस्वी ने गरीब सवर्णों के लिए भी आरक्षण की बात की और एससी/एसटी एक्ट पर 20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद से लेकर अब तक जारी राजनीतिक पर बड़ा बयान देते हुए कहा कि नरेंद्र मोदी सरकार ‘दलितों और पिछड़ा वर्ग को लड़ाना चाहती है’।

तेजस्वी के इस बयान के बड़े राजनीतिक मायने हैं। तेजस्वी के पापा को अभास हुआ है उसका संदेश तेजस्वी तक पहुंच गया होगा कि एससी-एसटी एक्ट के बेजा इस्तेमाल की जब बात होती है तो इसकी गैर जमानती धारा सिर्फ सवर्णों के लिए नहीं बल्कि अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में शामिल जातियों पर भी लागू होती है। जिसका सबसे अधिक प्रभाव आरजेडी के कोर वोटर नव-सवर्ण बन चुके यादवों पर पड़ेगा। लेकिन पिछड़ों की बात करने वाली पार्टी खुलकर सरकार के उस एक्ट का विरोध करे यह उसके लिए संभव नहीं। नरेंद्र मोदी ने जो चाल चली है वो जातिवाद की राजनीति करने वालों को तिलमिला देने वाली है। उन पार्टी के लिए और ज्यादा जो एक जाति के सहारे पिछड़ावाद की राजनीति का मुल्लमा चढ़ाती रही है। एससीएसटी एक्ट पर जातिवादी नेताओं को जो मार पड़ी है उसका असर उत्तर प्रदेश में यादवों और मुसलमानों की राजनीति करने वाले समाजवादियों और बसपाईयों पर भी पड़ा है। जो भय लालू की पार्टी को है वही भय अखिलेश और मुलायम की पार्टी को भी। ब्राह्मणवाद के खिलाफ राजनीति करते हुए दलित ब्राह्मण गठजोड़ बनाने वाली मायावती के लिए भी एससी एसटी एक्ट पर मोदी सरकार का फैसला जमीन हीला देने वाली है। लेकिन जो बौखलाहट महागठबंधन की अगुआई करने वाली आरजेडी और उसके सुप्रीमों लालू यादव में है वो जातिवादी राजनीति की बुनियाद हिलाने वाली है।

URL: Is Laloo Yadav in the Depression due to amendment in SC / ST Act ?

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