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सच्ची कहानियों को बदलने वाले ‘फेरबदल भंसाली’ के निशाने पर कमाठीपुरा

संजय लीला भंसाली की आगामी फिल्म ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ का विरोध शुरु हो गया है। मुंबई के कमाठीपुरा में एक संगठन मुखर होकर फिल्म के विरोध में उतर आया है। आरोप फिर से वही है। संजय लीला भंसाली ने एक सत्यकथा के तथ्यों में छेड़खानी की है। ‘पद्मावत’ में महान रानी पद्मावती के बारे में झूठे तथ्य परोसने वाले भंसाली अब एक सेक्स वर्कर की कहानी में छेड़छाड़ के आरोपी बनाए गए हैं। वास्तविक कथाओं में छेड़छाड़ कर लीजिये और फिल्म के पोस्टर पर लिख दीजिये ‘गंगूबाई काठियावाड़ी के जीवन पर आधारित’। 

 संजय लीला भंसाली की इस फिल्म के ऑफिशियल पोस्टर पर गंगूबाई को ‘माफिया क्वीन’ लिखा गया है। जबकि गंगूबाई की कथा में लिखा गया है कि वह अपने प्रेमी द्वारा वेश्यालय लाकर बेच दी गई थी। वह आदतन अपराधी नहीं थी। उसने कमाठीपुरा क्षेत्र में लाकर बेचे जाने वाली कई महिलाओं को इस दलदल से बाहर निकाला।

संजय लीला भंसाली उसे माफिया क्वीन की संज्ञा दे, ये बात उचित नहीं लगती। ‘बाजीराव मस्तानी’, ‘राम-लीला’ और ‘पद्मावत’ को लेकर उन्होंने इसी नीति का चुनाव किया था। वास्तविक कहानियों में मनगढ़ंत तथ्य डाले जाए और फिल्म को विवादित बना दिया जाए ताकि फिल्म जल्द से जल्द चर्चा में आ सके। गंगूबाई काठियावाड़ी को लेकर भी उन्होंने यही रास्ता अपनाया है।

मुंबई में ‘कमाठीपुरा की आवाज़’ नामक एक संगठन ने फिल्म का विरोध शुरु कर  दिया है और फिल्म पर रोक लगाने की मांग कर डाली है। बहुत समय पहले इस मंच से लिखा गया था कि वास्तविक कथाओं पर फिल्म ठीक वैसे ही बनाई जानी चाहिए, जैसा अमुक व्यक्ति का जीवन रहा है। भंसाली इन सच्ची कहानियों में ऐसे तथ्य डालते हैं, जिससे न केवल उस व्यक्ति की छवि प्रभावित होती है, बल्कि समाज में एक शक्तिशाली धारणा स्थापित हो जाती है।

फिल्म के प्रोमो देखकर आप अनुमान लगा सकते हैं कि भंसाली ने गंगूबाई के व्यक्तित्व को ग्लैमराइज कर दिखाया है। उन्होंने तो हुसैन ज़ैदी की गंगूबाई पर लिखी तथ्यात्मक किताब को भी अनदेखा कर दिया है। कमाठीपुरा के नागरिकों ने कहा है कि फिल्म बनाते समय भंसाली ने इस क्षेत्र के 200 साल के इतिहास को भी ध्यान नहीं रखा।

नागरिकों का गुस्सा इस बात पर है कि उन्होंने कमाठीपुरा के कलंक को मिटाने के लिए वर्षों तक कार्य किया है और संजय लीला भंसाली इस क्षेत्र को गलत तथ्यों के साथ प्रस्तुत कर रहे हैं। कमाठीपुरा के लोगों की आवाज़ को न्यायालय में ऐसे ही दफन कर दिया जाएगा, जैसे पद्मावत के प्रदर्शन के समय सैकड़ों याचिकाओं का गला न्यायालय ने घोंट दिया था।

उल्लेखनीय है कि जब न्यायालय ने देवी सदृश्य पद्मावती के अपमान पर न्यायोचित व्यवहार नहीं किया तो बेचारे कमाठीपुरा के लोगों की बात कौन सुनने वाला है। मनोरंजन उद्योग को सरकार के साथ न्यायालय का भी वरदहस्त प्राप्त है। मुझे ऐसा कोई अंदेशा नहीं है कि न्यायालय या सरकार इस फिल्म में गलत तथ्य डालने के लिए मिस्टर भंसाली से सवाल भी करने वाली है।

फिल्म के प्रदर्शन को तो रोकना लगभग असंभव है। और सेंसर बोर्ड की बेहोशी इस किस्म की है कि वह ध्यान ही नहीं देता कि वर्षों से सच्ची कहानियों में भ्रामक तथ्य डाले जा रहे हैं। कल रानी पद्मावती थी, आज गंगूबाई काठियावाड़ी हैं, कल कोई और होगी। ये सभी अद्भुत व्यक्तित्व थे।

इनके जीवन संघर्ष की कथाओं ने मानव मन को उद्धेलित किया है, उनको प्रेरित किया है। क्यों न ऐसा कानून बने कि किसी वास्तविक कथा पर फिल्म बनाई जाए तो उसमे एक पैसे का हेरफेर करने की इज़ाज़त न हो। तब जाकर सच्ची कहानियां अपनी स्वाभाविकता के साथ परदे पर उतरकर सार्थक होंगी।

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Vipul Rege

Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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