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कूनराड एल्स्ट ! हिन्दू दुर्दशा देखि न जाई (1)

शंकर शरण । हिन्दू समाज के हित के लिए शोध करते और सत्य लिखते हुए कूनराड एल्सट को लगभग एक तिहाई सदी बीत गई। इस के लिए कोई पुरस्कार मिलने के बजाए उन्हें दोतरफा वंचना ही अधिक मिली है। इसीलिए, कूनराड का जीवन और कार्य समकालीन भारतीय राजनीति और बौद्धिकता का एक आइना भी  है। इस में हम समकालीन भारतीय यथार्थ के वे रूप देख सकते हैं, जो अन्यत्र इकट्ठे मिलना दुर्लभ होगा। Koonrad Elst

बेल्जियन विद्वान डॉ कूनराड एल्स्ट का जीवन एक आइना है, जिस में हिन्दू समाज की वर्तमान दशा कई रूपों में देखी जा सकती है। पहले तो यह कि इतिहास, राजनीति,और धर्म संबंधी उन की बीसियों पुस्तकों में हिन्दू समाज के प्रति सदभावना और उस के लिए लड़ने का माद्दा कूट-कूट कर भरा हुआ है। उन में अधिकांश अनूठी पुस्तकें हैं। उदाहरण के लिए, ‘अयोध्या एंड आफ्टर’ (1991), ‘निगेशनिज्म इन इन्डिया’ (1992), ‘साइकॉलोजी ऑफ प्रोफेटिज्म’ (1993), ‘बीजेपी वर्सेस हिन्दू रिसर्जेन्स’ (1997), ‘अपडेट ऑन द आर्यन इनवैजन डिबेट’ (1999), ‘डिकोलोनाइजिंग द हिन्दू माइंड’ (2001), ‘सैफ्रन स्वस्तिकाः ऑन द नोशन ऑफ हिन्दू फासिज्म’ (2001), ‘द प्रॉब्लम विथ सेक्यूलरिज्म’ (2007), ‘द आर्ग्यूमेंटेटिव हिन्दू’ (2012), ‘ह्वाय आई किल्ड द महात्माः अनकवरिंग गोडसेज् डिफेंस’ (2017), तथा ‘हिन्दू धर्म एंड कल्चरल वार्स’ (2019) अपने विषय के दुर्लभ विश्लेषण हैं। इन में किसी भी पुस्तक को पढ़कर कूनराड की मौलिकता का जायजा लिया जा सकता है।  

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विद्वत् कसौटी पर उन की पुस्तकों की गुणवत्ता अंतर्राष्ट्रीय स्तर की है। यह विविध अकादमिक हलके स्वीकार भी करते हैं। किसी भी भारतीय, विशेषकर हिन्दू, को उन का पारायण करके भरपूर जानकारी और शक्ति मिलेगी। समकालीन विवादित मुद्दों पर कूनराड का शोध, आँकड़े, तर्क, और विश्लेषण सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं। परन्तु किसी सेक्यूलरवादी, वामपंथी विद्वान ने कूनराड के लेखन को चुनौती नहीं दी। बल्कि, एक बार बी.बी.सी. जैसे अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठित चैनल द्वारा प्रस्तावित कार्यक्रम में भी  एक  भारतीय वामपंथी विद्वान कूनराड के साथ विमर्श से कतरा गए। दूसरी ओर, विडंबना कि हिन्दूवादी सत्ता प्रतिष्ठान भी कूनराड से थोड़ा दूर-दूर ही रहता है। कारण यह कि कूनराड ने अपनी कसौटी सत्यनिष्ठा तथा हिन्दू समाज का हित रखी है। जबकि संगठित हिन्दूवादी अपने पार्टी-हित को सर्वोपरि रखते हैं। इस में कूनराड की बातें उन्हें नहीं रुचतीं। वे बातें जहाँ तक सेक्यूलरवादी, वामपंथी, नेहरूवादी मताग्रहों को खंडित करती हैं, वहाँ तक वे उन का उपयोग करते हैं। किन्तु हिन्दू समाज के हितार्थ  सब से जरूरी कार्य (सब से सरल भी!) करने, अथवा हानिकारक काम बंद करने के मुद्दे पर हिन्दूवादी सत्ताधारी कूनरा से दूर भागते हैं।

इस तरह, हिन्दू समाज के हित के लिए शोध करते और सत्य लिखते हुए कूनराड एल्सट को लगभग एक तिहाई सदी बीत गई। इस के लिए कोई पुरस्कार मिलने के बजाए उन्हें दोतरफा वंचना ही अधिक मिली है। इसीलिए, कूनराड का जीवन और कार्य समकालीन भारतीय राजनीति और बौद्धिकता का एक आइना भी  है। इस में हम समकालीन भारतीय यथार्थ के वे रूप देख सकते हैं, जो अन्यत्र इकट्ठे मिलना दुर्लभ होगा। 

युवा कूनराड दर्शन शास्त्र के शोधकर्ता के रूप में पहली बार 1988-89 ई में भारत (वाराणसी) आए थे। वहीं संयोगवश कुछ बंगलादेशी हिन्दू शरणार्थियों से उन की भेंट हुई, जिस ने उन के जीवन की दिशा बदल दी। उस समय भारतीय मीडिया में अयोध्या विवाद पर वामपंथी इतिहासकारों का जोरदार प्रचार भी चल रहा था। युवा यूरोपीय शोधकर्ता कूनराड ने यह विचित्र स्थिति देखी कि बेचारा पीड़ित हिन्दू समाज ही उलटे  दुष्ट व हमलावर के रूप में दुनिया में नाहक बदनाम किया जा रहा है। यह देख कर उन्होंने, एक सहज यूरोपीय एडवेंचरर की तरह, मानो खुदाई फौजदार की तरह अपने को हिन्दू समाज की लड़ाई में झोंक दिया। इसी झोंक में  उन्होंने अपनी सब से पहली पुस्तक लिखी: ‘राम जन्मभूमि वर्सेस बाबरी मस्जिद – ए केस स्टडी इन हिन्दू मुस्लिम कॉन्फ्लिक्ट’ (1990)। यह अपने विषय पर पहली शोधपरक, अकादमिक पुस्तक थी। जिस में मार्क्सवादी इतिहासकारों के प्रोपेगंडा का एक धारदार खंडन था।  

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तब तक, वर्तमान युग वाले रामजन्मभूमि-मुक्ति आंदोलन को चलते वर्षों हो चुके थे। उसे आरंभ करने वाले गोरखपुर के महंत अवैद्यनाथ, हनुमान प्रसाद पोद्दार जैसे पुरोधा;  अनंतर गुलजारीलाल नन्दा, दाऊदयाल खन्ना, जैसे भूतपूर्व कांग्रेस नेता; और अंततः उस में संघ परिवार के आ जाने के बाद भी वह मुख्यतः भावनात्मक आंदोलन ही था। इसीलिए, उस समय के प्रभावशाली मार्क्सवादी इतिहासकारों ने अपने अकादमिक पदों का रौब झाड़ते  हुए ‘ऐतिहासिक तथ्यों’ के आधार पर उसे झूठा, शरारतपूर्ण राजनीतिक आंदोलन ठहराने का प्रचार शुरू किया था। इसी मोड़ पर कूनराड एल्स्ट भारत पहुँचे थे।  मामूली शोध से ही उन्हें  हिन्दू समाज की अजीब विडंबना दिखी, जिसे सदियों से वह इस्लामी उत्पीड़न झेलना पड़ा, जो मानव इतिहास में सब से अधिक रक्तरंजित रहा था। किन्तु उलटे उसे ही, वह भी अपनी सब से महान धार्मिक-सांस्कृतिक धरोहर पर दुत्कारा जा रहा था! यह देख कर कूनराड उन मार्क्सवादी इतिहासकारों को उत्तर देने के लिए हिन्दू समाज के अकादमिक पैरोकार बन कर खड़े हो गए। उन के पास न साधन थे, न कोई पद ही था। फिर भी युवा खून और बौद्धिक प्रखरता की पूँजी लेकर वे लड़ाई में कूद पड़े। 

इस तरह, उन की वह पहली पुस्तक लिखी गई। उस का महत्व इस से भी समझा जा सकता है कि उस पुस्तक को योद्धा इतिहासकार सीताराम गोयल ने अपने ‘वॉयस ऑफ इंडिया’ प्रकाशन से छापा।  दिल्ली में एक विशेष कार्यक्रम  में  उस का विमोचन ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के तात्कालीन संपादक गिरिलाल जैन की अध्यक्षता में   तब के सब से बड़े हिन्दूवादी नेता लालकृष्ण अडवाणी ने किया था। 

उस के साथ कूनराड की वह अकादमिक-बौद्धिक यात्रा आरंभ हुई जिस में उन्होंने अपना निजी कैरियर चौपट कर लिया।  उन्हें ‘हिन्दू सांप्रदायिकों फासिस्टों’ का पक्षधर होने के नाम पर यूरोप, अमेरिका में तमाम अकादमियों, विश्वविद्यालयों में पदों, नियुक्तियों, शोधवृत्तियों, आदि से वंचित किया जाता रहा। जबकि कई विषयों पर कूनराड के तथ्यगत शोध, सुसंगत निष्कर्ष, और प्रखर बौद्धिकता का लोहा विरोधी भी मानते हैं। दुर्योगवश, वही स्थित आज तक है। चाहे भारत में  अघोषित हिन्दूवादियों के हाथ में सत्ता हो, किन्तु  उन में वैचारिक, शैक्षिक, और सांस्कृतिक युद्ध-क्षेत्र के बारे में  वही नासमझी है जो दशकों पहले थी। वरना, आज कूनराड की हस्ती कुछ और होती।             

यद्यपि  भारत में शायद ही कोई सचेत हिन्दू बौद्धिक, राजनेता या एक्टिविस्ट होगा जिस के पास कूनराड की कोई न कोई पुस्तक न हो! संघ परिवार के नेतागण, अनेक सर्वोच्च नेता उन से सीधे परिचित रहे हैं और कइयों ने कूनराड की प्रतिभा का समय-समय पर उपयोग भी किया। फिर भी अपनी ‘संघ-मानसिकता’ के दर्प में वे ऐसे अनूठे विद्वान का मोल शायद ही समझते हैं! जो अपवाद नेता समझते भी हैं, उन की अपने ही  बड़बोलों, तिकड़मियों के सामने कुछ नहीं चलती। अन्यथा, देश-विदेश में कोई भी अन्य राजनीतिक, वैचारिक, या धार्मिक धारा ऐसे अनमोल बौद्धिक योद्धा को हाथों-हाथ लेती, उन की हस्ती को समुचित प्रतिष्ठा देने, चमकाने और  उन की कार्य-क्षमता बढ़ाने का हर संभव उपाय करती। 

किन्तु भारत देश, हिन्दू समाज, विशेषतः इस के अग्रणी राजनीतिक हलकों की स्थिति ठीक उलटी है। अभी कूनराड भारत आए हुए हैं। इस अवसर पर,  कूनराड की कुछ बातों और टिप्पणियों के माध्यम से हिन्दी पाठक उन के प्रखर विचारों की झलक पा सकते हैं। स्मरण रहे, कि यह एक ऐसे विदेशी विद्वान की सुविचारित बातें हैं जो तीन दशकों से भी अधिक समय से, अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य के मद्देनजर हिन्दू हितों की दृष्टि से विविध समस्याओं, तथा ऐतिहासिक स्थितियों का प्रमाणिक अवलोकन करता रहा है।  (अगली किस्त में, कूनराड की कुछ बातें, उन के अपने शब्दों में )

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