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महात्मा गांधी और मनुबेन: एक अनकही कहानी!

शंकर शरण। दो वर्ष पहले मनु बेन की डायरी प्रकाश में आई। मनु बेन महात्मा गाँधी के अंतिम वर्षों की निकट सहयोगी थीं। इस डायरी से उन कई बिन्दुओं पर प्रकाश पड़ता है, जो अभी तक कुछ धुँधलके में थीं। इस से महात्मा गाँधी की प्राकृतिक चिकित्सा, निजी जीवन या कथित ब्रह्मचर्य प्रयोग संबंधी विवादास्पद प्रसंगों पर कई आरोपों, शंकाओं की अनायास पुष्टि-सी होती है। साथ ही, उन बिन्दुओं पर अपने समय में स्वयं गाँधीजी द्वारा दी गई कई सफाइयों और दावों का स्वतः खंडन भी होता है। मनु बेन की डायरी मूल गुजराती में है और 11 अप्रैल 1943 से 21 फरवरी 1948 तक की तारीखें उस पर हैं।

यह डायरी दिखाती है कि गाँधीजी ने मनु को बताया था कि उस के साथ वह जो ब्रह्मचर्य प्रयोग कर रहे हैं, उस से मनु का बहुत उत्थान होगाः ‘उस का चरित्र आसमान चूमने लगेगा’। डायरी से यह भी पता चलता है कि गाँधी ने अपने सचिव प्यारेलाल और मनु को विवाह करने की अनुमति नहीं दी। जबकि प्यारेलाल बरसों तक इस के लिए आग्रह करते रहे। प्यारेलाल की बहन सुशीला नायर, जो गाँधीजी की निजी डॉक्टर भी थीं, उन्होंने भी मनु को इस विवाह के लिए तैयार करने की कोशिशें की, किन्तु गाँधी ने अपने प्रभाव का प्रयोग कर मनु को इस से विरत रखा। पर इस का कोई कारण नहीं दिया। मनु की डायरी स्पष्ट दिखाती है कि वह पूरी तरह स्वयं को गाँधी के लिए समर्पित मानती थी।

गाँधी के देहांत के बाद मनु नितांत अकेली हो रही। उन का निजी जीवन खत्म हो गया। तब से अगले बाइस वर्ष गुमनामी में गुजार कर वह दुनिया से विदा हो गईं। जिस तरह मनु को उपेक्षित, अकेले, उदास जीवन बिताना पड़ा, वह भी स्पष्ट करता है कि गाँधी की अंतरंग, मामूली सेविका के सिवा उसे कुछ नहीं समझा गया। यह गलत भी न था। स्वयं गाँधी ने उसे यही समझा था, यह मनु बेन की डायरी भी कई स्थलों पर बता देती है। चाहे स्वयं डायरी लेखक को तब इस का आभास न रहा हो।

मनु बेन की डायरी से भी इस का प्रमाण मिलता है कि गाँधीजी के साथ नंगे सोने वाली रात्रि-चर्या स्वयं मनु के आग्रह से ही बंद हुई। गाँधी ने उस विवादास्पद कृत्य को अपने अनेकानेक निकट सहयोगियों, परिवारजनों के आग्रह के बावजूद बंद नहीं किया। किंतु अंततः उन्हें विवशता में इसे बंद करना पड़ा। क्योंकि स्वयं मनु के आग्रह के बाद गाँधी द्वारा उसे ठुकराने से मामला बिलकुल दूसरा रूप ले लेता! ठक्कर बापा इस आग्रह के गवाह थे। ऐसी स्थिति में गाँधी को अलग सोना मंजूर करना पड़ा। जितनी सहजता से यह हो गया, उस से यह भी संकेत मिलता है कि मनु के साथ सोने को ‘ब्रह्मचर्य प्रयोग’, ‘महायज्ञ’, ‘चरित्र का उत्थान’ आदि कहना केवल शाब्दिक खेल ही था। चाहे स्वयं गाँधी उसे कुछ भी क्यों न कहते या समझते रहे हों।

पहले उन कुछ अंशों को सिलसिलेवार देखें, जो मनु बेन की डायरी से लिए गए हैं। (हिन्दी साप्ताहिक इंडिया टुडे, नई दिल्ली, 19 जून 2013 से साभार)

श्रीरामपुर, बिहार, में 28 दिसंबर 1946 को मनु बेन अपनी डायरी में लिखती हैं, “सुशीलाबेन ने आज मुझ से पूछा कि मैं बापू के साथ क्यों सो रही थी और कहा कि मुझे इस के गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। उन्होंने अपने भाई प्यारेलाल के साथ विवाह के प्रस्ताव पर मुझसे फिर से विचार करने को भी कहा और मैंने कह दिया कि मुझे उन में कोई दिलचस्पी नहीं है, और इस बारे में वे आइंदा फिर कभी बात न करें।” चार दिन बाद फिर, वहीं श्रीरामपुर में मनु डायरी में लिखती हैं, “प्यारेलाल जी मेरे प्रेम में दीवाने हैं और मुझ पर शादी के लिए दबाव डाल रहे हैं, लेकिन मैं कतई तैयार नहीं हूँ।”

बिरला हाउस, दिल्ली, में 18 जनवरी 1947 को मनु की डायरी दर्ज करती है, “बापू ने कहा कि उन्होंने लंबे समय बाद मेरी डायरी को पढ़ा और बहुत ही अच्छा महसूस किया। वे बोले कि मेरी परीक्षा खत्म हुई और उनके जीवन में मेरी जैसी जहीन लड़की कभी नहीं आई और यही वजह थी कि वे खुद को सिर्फ मेरी माँ कहते थे। बापू ने कहाः ‘आभा या सुशीला, प्यारेलाल या कनु, मैं किसी की परवाह क्यों करूँ? वह लड़की (आभा) मुझे बेवकूफ बना रही है बल्कि सच यह है कि वह खुद को ठग रही है। इस महान यज्ञ में मैं तुम्हारे अभूतपूर्व योगदान का हृदय से आदर करता हूँ’।…” यह पढ़कर हैरत होती है। आभा जिस तरह गाँधी के साथ कई तस्वीरों में नजर आती रही हैं, उस से अनुमान किया जा सकता है कि कभी उसे भी गाँधी ने जरूर इसी तरह के मधुर वचन कहे होंगे। लेकिन, यहाँ पीठ पीछे, मनु से उस की ऐसी निंदा करते गाँधी को देख कर संदेह होता है कि आगे चलकर कभी वे मनु के बारे में भी कठोर बातें कह ही सकते थे। मनु की डायरी में आगे यह मिल भी जाता है।

नवग्राम, बिहार में 31 जनवरी 1947 को मनु लिखती हैं, “ब्रह्मचर्य के प्रयोगों पर विवाद गंभीर रूप अख्तियार करता जा रहा है। मुझे संदेह है कि इस के पीछे (अफवाहें फैलाने के) अम्तुससलामबेन, सुशीलाबेन और कनुभाई (गाँधी के भतीजे) का हाथ था। मैंने जब बापू से यह बात कही तो वे मुझसे सहमत होते हुए कहने लगे कि पता नहीं, सुशीला को इतनी जलन क्यों हो रही है? असल में कल जब सुशीलाबेन मुझ से इस बारे में बात कर रही थीं तो मुझे लगा कि वे पूरा जोर लगाकर चिल्ला रही थीं। बापू ने मुझ से कहा कि अगर मैं इस प्रयोग में बेदाग निकल आई तो मेरा चरित्र आसमान चूमने लगेगा, मुझे जीवन में एक बड़ा सबक मिलेगा और मेरे सिर पर मंडराते विवादों के सारे बादल छँट जाएंगे। बापू का कहना था कि यह उन के ब्रहमचर्य का यज्ञ है और मैं उस का पवित्र हिस्सा हूँ।…”

तनिक इस बात पर विचार करें। स्वयं गाँधी द्वारा सुशीला की भावना के लिए ‘जलन’ शब्द का प्रयोग सचाई की चुगली करता दिखता है। यज्ञ जैसी पवित्र संज्ञा वाले के कार्य में भागीदारों की ईर्ष्या-द्वेष की ऐसी नियमितता यदि गाँधी स्वयं नोट कर रहे हैं, तब इसे चलाते रहना क्या था? दूसरे, जब मनु के साथ प्रयोग गाँधी कर रहे थे, तब मनु के बेदाग निकल आने पर ‘अगर’ लगाने का अर्थ क्या यह है कि दाग लगने की संभावना गाँधी स्वीकार कर रहे थे? किन्तु, तब, यह दाग मनु पर किस के द्वारा लगता? यज्ञ का पवित्र हिस्सा किस के द्वारा अपवित्र हो सकता था, यदि उस यज्ञ में कोई तीसरा सहभागी न था? क्या गाँधी उस संभावित अपवित्रता में भी स्वयं का कोई दोष समझने, कल्पना करने की स्थिति नहीं मान रहे थे?

आगे देखें। 2 फरवरी 1947 को अमीषापाड़ा, बिहार, में मनु लिखती हैं, “आज बापू ने मेरी डायरी देखी और मुझ से कहा कि मैं इसका ध्यान रखूँ ताकि यह अनजान लोगों के हाथ न पड़ जाए क्योंकि इस में लिखी बातों का गलत उपयोग कर सकते हैं, हालाँकि ब्रह्मचर्य के प्रयोगों के बारे में हमें कुछ छिपाना नहीं है।”

7 फरवरी 1947, प्रसादपुर, बिहारः “ब्रह्मचर्य के प्रयोगों को लेकर माहौल लगातार गर्माता ही जा रहा है। अमृतलाल ठक्कर (ठक्कर बापा) आज आए और अपने साथ बहुत सारी डाक लाए जो इस मुद्दे पर बहुत ‘गर्म’ थी। और इन पत्रों को पढ़ कर मैं हिल गई।”

24 फरवरी 1947, हेमचर, बिहारः “… आज बापू ने अमुतुस्सलामबेन को एक बहुत कड़ा पत्र लिख कर कहा कि उन का जो पत्र मिला है उस से जाहिर होता है कि वे इस बात से नाराज हैं कि ब्रह्मचर्य के प्रयोग उन के साथ शुरू नहीं हुए।” इस के अगले दिन, वहीं, “ … इस पर (ठक्कर) बापा ने कहा (गाँधीजी को) कि ब्रह्मचर्य की उन की परिभाषा आम आदमी की परिभाषा से बिलकुल अलग है और पूछा कि यदि मुस्लिम लीग को इस की भनक भी लग गई और उस ने इस बारे में लांछन लगाए तो क्या होगा? बापू ने कहा कि किसी के डर से वे अपने धर्म को नहीं छोड़ेंगे… ”। अर्थात्, यह बातें आम लोगों से छिपी रही थीं। यह गाँधी का निजी जीवन था, जिसे उन के निकट के लोग भी छिपा कर रखते थे।

उस के अगले दिन, 26 फरवरी 1947 को हेमचर, बिहार, में हीः “आज जब अम्तुस्सलामबेन ने मुझ से प्यारेलाल से शादी करने को कहा तो मुझे बहुत गुस्सा आया और मैंने कह दिया कि अगर उन्हें उन की इतनी चिंता है तो वे स्वयं उन से शादी क्यों नहीं कर लेतीं? मैंने उन से कह दिया कि ब्रह्मचर्य के प्रयोग उन के साथ शुरू हुए थे और अब अखबारों में मेरे फोटो छपते देखकर उन्हें मुझ से जलन होती है और मेरी लोकप्रियता उन्हें अच्छी नहीं लगती।”

यानी, तब जो प्रयोग मनु के साथ हो रहा था, वह पहले अम्तुस्सलाम के साथ हुआ था। उस से पहले सुशीला नायर के साथ। गाँधी स्वयं को सुशीला का ‘पिता’ कह चुके हैं, और मनु की ‘माँ’। यह पता नहीं चलता कि उन्होंने अमतुससलाम से क्या संबंध जोड़ा था, और ऐसे पारिवारिक संबंध-संबोधनों की इस ‘यज्ञ’, ‘प्रयोग’, या ‘अभ्यास’ में क्या जरूरत थी – और एक ही प्रकार की सहयोगियों के साथ भिन्न प्रकार के संबंध-संबोधन क्यों जोड़े गए? पर इन प्रश्नों को यहीं छोड़ आगे देखें।

आगे हेमचर, बिहार में 2 मार्च 1947 को मनु बेन की डायरी में अंकित है, “आज बापू को बापा को एक गुप्त पत्र मिला। उन्होंने इसे मुझे पढ़ने को दिया। यह पत्र दिल को इतना छू लेने वाला था कि मैंने बापू से आग्रह किया कि बापा को संतुष्ट करने के लिए आज से मुझे अलग सोने की अनुमति दें।” इस प्रकार, ठक्कर बापा की वेदना से द्रवित होकर, गाँधी की इच्छा के विरुद्ध, मनु ने अलग सोने की अनुमति माँगी। तब से यह प्रयोग, यज्ञ, आदि सहसा बंद हो गया। गाँधी के सहयोगियों ने शांति की साँस ली।

यदि गाँधी की अब तक की सभी बातें स्मरण करें तो ऐसा होना उन के महान यज्ञ को बाधित करना ही हुआ। मगर किसी महत्वपूर्ण कार्य को बाधित होते देख गाँधी मौन रहें, यह उन के स्वभाव के अनुरूप तो नहीं लगता। दूसरे, अब तक के कार्य का कोई मूल्यांकन या पुनरावलोकन करते भी उन्हें नहीं देखा गया। बहरहाल, मनु बेन की डायरी में आगे चलें।

मसौढ़ी, बिहार में 18 मार्च 1947 को मनु बेन लिखती हैं, “आज बापू ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात का खुलासा किया। मैंने उन से पूछा कि क्या सुशीलाबेन भी उन के साथ निर्वस्त्र सो चुकी है क्योंकि जब मैंने उन से (सुशीला से) इस बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि वे प्रयोगों का कभी भी हिस्सा नहीं बनी और उन के (गाँधी के) साथ कभी निर्वस्त्र नहीं सोई। बापू ने कहा कि सुशीला सच नहीं कह रही क्योंकि वह बारडोली (1939 में जब पहली बार सुशीला बतौर चिकित्सक उन के साथ जुड़ी थीं) के अलावा आगा खाँ पैलेस, पुणे में उन के साथ सो चुकी थी। बापू ने बताया कि वह उन की मौजूदगी में स्नान भी कर चुकी है। फिर बापू ने कहा कि जब सारी बातें मुझे पता ही हैं तो मैं यह सब क्यों पूछ रही हूँ?…”।

क्या गाँधी चिढ़े हुए थे, और सुशीला के विरुद्ध स्कोर कर रहे थे? उसी सुशीला के विरुद्ध, जिसे नौ वर्ष पहले अपने पास वापस बुलाने के लिए कितनी मनुहारी, ऊँची-ऊँची बातें कही थी और इस के लिए दर्जनों पत्र लिखे थे। जिसे वे अपनी बेटी कहते थे। तो उसी बेटी को उस की गैर-मौजूदगी में नीचा दिखाना, यह गाँधी के चरित्र में किस तत्व का दर्शन कराता है? तनिक यह भी देखें, कि इस ‘यज्ञ’ क्रिया के बंद या लंबित करने के पश्चात, यज्ञ में शामिल लोगों के वार्तालापों में कैसा दुर्भाव है!

सुशीला के बारे में वह सब बताते हुए गाँधी किसी प्रयोग, यज्ञ की पदावली या सुगंध का आभास क्यों नहीं देते? साथ ही जैसी हल्की बातें, और जिस तरह, वे सुशीला के बारे में गाँधी मनु को कहते हैं, उस से संदेह व प्रश्न तो उठता ही है कि वर्षों तक एकांत में युवा सुशीला के साथ सोते हुए, या उसे नग्न स्नान करते, कराते हुए बापू और वे क्या बातें करते थे, या कि मौन रहते थे? ब्रह्मचर्य ‘यज्ञ’ या ‘प्रयोगों’ के समय, या उस के बाद होने वाली वार्ताएं क्या संदर्भहीन थीं, या उन का भी प्रायोगिक संदर्भ था? यदि था, तब इस 18 मार्च 1947 वाली गाँधी-मनु वार्ता से मुख्य याज्ञिक के मन का कौन सा भाव प्रकट होता है?

आगे 18 नवंबर 1947 को मनु की डायरी बताती है, “आज जब मैं बापू को स्नान करवा रही थी तो वे मुझ पर बहुत नाराज हुए क्योंकि मैंने उन के साथ शाम को घूमना बंद कर दिया था। उन्होंने बहुत कड़वे शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा, ‘जब तुम मेरे जीते जी मेरी बात नहीं मानतीं तो मेरे मरने के बाद क्या करोगी? क्या तुम मेरे मरने का इंतजार कर रही हो?’ यह शब्द सुनकर मैं सन्न रह गई और जवाब देने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। ” इस प्रसंग की तुलना ऊपर इसी डायरी के 18 जनवरी 1947 वाले विवरण से करके देख सकते हैं कि गाँधी अपनी सेविकाओं के साथ कैसा संबंध और व्यवहार रखते रहे थे। यह सीधे मालिक-सेविका का सूखा मामला दिखता है। किसी सैद्धांतिक प्रयोग या यज्ञ जैसी भावना से इस का कोई ताल-मेल नहीं बैठता।

इस प्रकार, मनु बेन द्वारा दिए गए उपर्युक्त विवरण गाँधी के अंतिम पाँच वर्षों की झलक देते हैं। इन का और पीछे के वर्षों की, तथा दूसरे, तीसरे, अन्य शामिल और प्रत्यक्षदर्शी लोगों द्वारा कही, लिखी विविध बातों से मिलान करने पर कहीं तथ्यों का अंतर्विरोध नहीं मिलता। (विस्तार के लिए देखें, शंकर शरण, गाँधी के ब्रह्मचर्य प्रयोग, नई दिल्लीः राजपाल एंड सन्स, 2012) मीरा बेन, सुशीला, प्रो. निर्मल बोस, परशुराम, आदि जिन भी निकट सहयोगियों ने गाँधी के कार्य पर आपत्ति या संदेह करते हुए जो भी कहा है, वह मनु बेन की डायरी से तथ्यगत रूप से पुष्ट होता है। यह गाँधी के कथित ब्रह्मचर्य प्रयोगों के बारे में उन निष्कर्षों को भी पुष्ट करता है जो सरदार पटेल, जी. डी. बिरला, किशोर मश्रुबाला, देवदास गाँधी, बिनोबा भावे, आदि अनेक महानुभावों ने लिए थे। (यह भी रोचक है कि गाँधी के उस विवादास्पद प्रयोग पर उन के केवल एक निकट सहयोगी की कोई आपत्ति नहीं मिलती – जवाहरलाल नेहरू! क्या तब के सभी निकट लोगों में केवल वही थे, जो इस मामले में गाँधी को सही या सही-सही समझ रहे थे?)

बहरहाल, मनु बेन की डायरी स्पष्ट दिखाती है कि उस जमाने में मनु बेन के सिवा शेष सभी लड़कियाँ, स्त्रियाँ गाँधी के साथ सोने, नहाने, आदि पूरी चर्या को उन की निजी सेवा के रूप में ही लेती थीं। उन के बीच आपसी ईर्ष्या-द्वेष, कलह, दुराव, धमकियाँ, गाँधी से किसी लड़की को दूर कर, स्वयं स्थान लेने के प्रयत्न, आदि से इस का लेश-मात्र भी संकेत नहीं मिलता कि वे गाँधी के कथित ब्रह्मचर्य प्रयोग को निजी, अंतरंग सेवा के सिवा कुछ समझती थीं। स्वयं गाँधी द्वारा उस संबंध में कही जाती बड़ी-बड़ी बातों को वे या तो आडंबर या जरूरी ओट के रूप में लेती थीं।

कुल मिला कर यही सत्य भी लगता है। वैसे भी, हम जितना आज जानते हैं, वे स्त्रियाँ तो स्वयं गाँधी को, उन की कही बातों, व्यवहार, रुख, आदि को हम से कई गुना अधिक और प्रत्यक्ष जानती थीं! वह भी एक दो सप्ताह नहीं, महीनों, बरसों तक। गाँधी को विभिन्न लड़कियों, स्त्रियों से मनमानी किस्म की अंतरंग सेवाएं लेने तथा ब्रह्मचर्य प्रयोग के संबंध में विभिन्न तरह के लोगों से विभिन्न तरह की बातें करते दस वर्ष पहले (1938) से देखा जा सकता है। उन बातों में कोई तारतम्य या गंभीर अर्थ कहीं नहीं मिलता। उलटे उन में अनेक क्षुद्र बातें भी थीं, जिस से संकेत मिलता है कि वह कथित प्रयोग केवल शाब्दिक आडंबर था। मनु ने अपनी सरलता में वह सब बातें लिख छोड़ी हैं, जिस से भी यही पुष्ट होता दिखता है।

निगमन तर्कशास्त्र भी इस की पुष्टि करता है। अनुभव से हम जानते हैं कि जहाँ पूजा हो रही होती है, अथवा जहाँ शोक मन रहा होता है, या जहाँ उल्लास-पर्व होता है और जहाँ रेवड़ियाँ बँट रही या लूट हो रही होती है – इन सब स्थानों में स्थिति अनुरूप वातावरण भिन्न-भिन्न बन जाता है। अवसर अनुरूप वहाँ लोग शान्त, चुप, शोकमग्न, उल्लसित या झगड़ालू मुद्रा में दीख पड़ते हैं। अतः यदि गाँधी के आस-पास उन की ब्रह्मचर्य-प्रयोग सहधर्मियों या उन की सेविकाओं में उद्वेग, ईर्ष्या, डाह और षड्यंत्र जैसा दृश्य लगातार बना हुआ दीखता है, तो यह उस कार्य का कुछ संकेत तो देता ही है, जो वहाँ हो रहा था।

निस्संदेह, वह कोई महान, उच्च कार्य, ‘यज्ञ’ आदि नहीं था। गाँधी के निकट सेवक, उन के सचिव, आदि इतने विकट मूढ़ प्राणी तो नहीं ही थे! यदि उन में विकार-ग्रस्त भाव या संबंध दिखते हैं, तो यह उस कार्य-वातावरण का परिणाम, उस की प्रतिछाया ही थी, जो गाँधी कर रहे थे। स्वयं गाँधी दूसरी प्रतिद्वंदी स्त्रियों के बारे में मनु बेन को जो कहते हैं, जिसे मनु ने सहजता से यथावत् अपनी डायरी में अंकित कर दिया है, उस में किसी उच्च भाव की लेश-मात्र झलक नहीं है। बल्कि विकार ही है।

संभवतः यही कारण है, कि स्वयं गाँधी और उन के आलोचक बेटे देवदास गाँधी ने भी मनु को उन डायरियों को दूसरों से छिपाए रखने की सलाह दी थी। ध्यान रहे, उन स्त्रियों में मनु सब से छोटी थी, नाबालिग, इसलिए उस का विश्वास अभी टूटा नहीं था। लेकिन क्या दूसरी, पुरानी, अधिक अनुभवी स्त्रियों में गाँधी के कथित ब्रह्मचर्य प्रयोगों के प्रति वही सरल विश्वास झलकता है? उत्तर नकारात्मक है। यदि वे प्रयोग एक-तरफा थे, तब भी इस से उस की मूल्यवत्ता का एक संकेत तो मिलता ही है।

कुल मिलाकर, गाँधी अपनी निजी जीवन-शैली के लिए लंबे समय से एक ऐसी छूट ले रहे थे, जो उन्हें वैसे कदापि न मिल सकती थी। यह उन का निजी जीवन था, यह स्वयं वे भी विविध प्रसंगों में कह चुके हैं। यह मनु बेन को कही हुई उन की अनेक बातों से भी दिखता है। अवश्य ही उन्होंने मनु बेन के दिमाग में यह बिठाया था कि वे मनु को विशेष प्रकार से साथ रखकर एक महान यज्ञ कर रहे हैं, कि उस में सहयोग करके मनु भी एक ‘उच्च कार्य’ कर रही है, आदि। पर इस पर मनु को कोई विस्तार से शिक्षा देते, अपने प्रयोग का कोई गहन अर्थ बताते, गाँधी कहीं नजर नहीं आते। केवल एक सपाट घोषणा कि यह महान प्रयोग या यज्ञ है। यह उन का अपना भ्रम या किशोर मश्रुबाला के शब्द में ‘माया’ मोह भी हो सकता था, यह न मानने के लिए हमें कोई सामग्री गाँधी वाङमय में नहीं मिलती।

गाँधी स्वयं को ‘मनु की माँ’ कहते थे, जिस की विचित्रता के सिवा उस से कोई सैद्धांतिक-व्यवहारिक तथ्य नहीं निकलता था। यदि वे मनु की ‘माँ’ थे, तो मनु से पहले वही सेवाएं देने वाली दूसरी लड़कियों, जैसे अमतुस सलाम, वीणा, कंचन, प्रभावती, आदि के क्या थे?

वस्तुतः गाँधी और मनु के बीच, तथा गाँधी के जुड़ी ऐसी स्त्रियों के बीच आपस में, तथा उन सब स्त्रियों, लड़कियों से गाँधी की अलग-अलग जो बातें, विवाद, शिकायत और झगड़े होते रहते थे, वह दिखाते हैं कि ‘ब्रह्मचर्य’ भी शब्द मात्र था। उस संबंधी कार्य के अंतर्गत स्त्रियों में ईष्या-द्वेष, प्रतिद्वंदिता, अविश्वास का बोल-बाला था। इस से न केवल गाँधी पूर्णतः अवगत थे, बल्कि स्वयं उन भावनाओं में शामिल थे। उस में रस लेते और हवा तक देते थे। उन प्रतिद्वंदी स्त्रियों को शांत करने में किसी उच्च विचार, चरित्र उत्थान, आदि के बदले गाँधी को भी आवेश-पूर्वक किसी को नीचा दिखाने, वही भी पीठ-पीछे, तू-तू मैं-मैं करते और अपनी चलाने की कोशिश करते स्पष्ट देखा जा सकता है। उसे ब्रह्मचर्य तो क्या, कोई सामान्य उदार भाव तक नहीं कहा जा सकता।

उन स्त्रियों और गाँधी की ततसंबंधी बातों में किसी ब्रह्मचर्य के बदले एक निजी, गोपन, रोजमर्रे गतिविधि की झलक अधिक मिलती है। कुछ-कुछ ‘साहब और उन के स्टाफ’ के आपसी संबंध, प्रमोशन पाने की प्रतियोगिता और तत्संबंधी मनो-मालिन्य। मनु बेन की डायरी से उन सभी आपत्तियों की पुष्टि ही हुई है, जो तब गाँधी के अनेक सहयोगियों, परिवार के सदस्यों, आदि ने की थी। उस की पुष्टि उस हश्र से भी हुई है जो गाँधी के देहांत के बाद मनु बेन, सुशीला नायर, जैसी लड़कियों का हुआ, जिन के साथ गाँधी अपना कथित ब्रह्मचर्य प्रयोग करते रहे थे।

इस की एक झलक 19 अगस्त 1955 को मोरारजी देसाई द्वारा जवाहरलाल नेहरू को लिखे पत्र से मिलती है। तब बंबई में मनु एक अस्पताल में किसी अज्ञात रोग के इलाज के लिए भर्ती थीं। उन से मिलने के बाद मोरारजी ने लिखा, “मनु की समस्या शरीर से अधिक मन की है। लगता है, वह जीवन से हार गई हैं और सभी प्रकार की दवाओं से उन्हें एलर्जी हो गई है।”

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मनु उस के पंद्रह वर्ष बाद तक जीवित रहीं। गुमनाम जीवन। किसी ने उन से उन प्रयोगों के बारे में जानने-समझने की कोशिश नहीं की जिस के लिए गाँधी ने देश की स्वतंत्रता प्रप्ति के आसन्न समय में अपने कितने ही निकट सहयोगियों, परिवारजनों से झगड़ा मोल लिया था। क्या यह रहस्य है कि किसी को उस में कोई दिलचस्पी क्यों नहीं हुई? या कि यह, कि सभी जानकार उन प्रयोगों का रहस्य पहले से जानते थे? हमारे पास इस का कोई उत्तर नहीं है। पर यह तथ्य है कि मनु को प्यारेलाल से विवाह न करने देकर गाँधी ने केवल अपनी मर्जी चलाई थी। इस का कितना संबंध किस बात से था, यह विधाता ही जानते हैं।

साभार लिंक

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