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क्या अदालत कार्ति चिदंबरम को अवसर देती है कि वह विदेश जाए और अपने कालेधन के सारे सबूतों को नष्ट करे?

जिस प्रकार कोर्ट में पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम के बेटे कार्ति चिदंबरम के मामले की सुनवाई के दौरान माननीय न्याधीश अटॉर्नी सॉलिसिटर जनरल से लेकर देश की सर्वोच्च जांच एजेसियों की बातों को अनसुनी करते हुए कभी अगल-बगत तो कभी छत की ओर झांकते रहते हैं इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि वे इस मामले को निपटाने को लेकर कितने गंभीर हैं। यह खुलासा कोई और नहीं बल्कि इस सुनवाई में भाग लेने वाले एएसजी तुषार मेहता ने किया है। कार्ति चिदंबरम के प्रति कोर्ट के जज कितने सॉफ्ट हैं इसका अंदाजा इन तथ्यों से लगाया जा सकता है। जब जब सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय कार्ति चिदंबरम की विदेश यात्रा पर प्रतिबंध लगाने या उन्हें हिरासत में लेकर पूछताछ करने की मांग की है तब-तब कोर्ट ने उसके उलट कार्ति चिदंबरम को विदेश जाने की छूट दे दी है। यहां तक कि जब पूछताछ करने के लिए हिरासत में लेने की मांग की गई तब कोर्ट ने सुनवाई ही रोक दी। इससे सहज ही सवाल उठता है कि क्या कोर्ट के जज कार्ति चिदंबरम के दादा के ऋणी तो नहीं हैं? जो एक समय में सुप्रीम कोर्ट के जज हुआ करते थे। क्या उसी ऋण को उतारने के लिए कार्ति चिदंबरम को इतनी सहूलियत दी जा रही है? क्या इससे आम जनमानस में कोर्ट की छवि को बट्टा नहीं लगेगा?

मालूम हो कि एयरसेल मैक्सिस मामले में आरोपी कार्ति चिदंबरम को जिस प्रकार ट्रायल कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक से छूट और सहूलियत मिल रही है उससे कोर्ट की छवि को नुकसान पहुंच रहा है। ऐसे में क्या कारण हो सकता है कि लोअर कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक के जज अपनी छवि को नुकसान पहुंचा कर उसे बचाने में जुटे हैं। वरिष्ठ पत्रकार कंचन गुप्ता ने अपने एक ट्वीट में लिखा है कि जब प्रवर्तन निदेशालय ने एयरसेल मैक्सिस मामले में ट्रायल कोर्ट से पूछताछ करने के लिए कार्ति चिदंबरम को हिरासत में लेने की मांग की तो कोर्ट ने 25 सितंबर तक के लिए सुनवाई को ही टाल दिया।

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जब सुप्रीम कोर्ट में प्रवर्तन निदेशालय ने कार्ति चिदंबरम की विदेश यात्रा पर पाबंदी लगाने की मांग की तो सुप्रीम कोर्ट ने उसे 20 से 30 सितंबर तक विदेश जाने की अनुमति दे दी। जबकि ईडी ने कार्ति के खिलाफ विदेश जाकर अपने खिलाफ साक्ष्य मिटाने तथा अपना विदेशी बैंक खाता बंद करने का आरोप लगाया था। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर क्या कारण है कि ट्रायल कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक के जज सीबीआई और ईडी जैसी जांच एजेंसियों की बातों को दरकिनार कर कार्ति चिदंबरम को बचाने में जुटे हैं?

जबकि सीबीआई और ईडी ने कई बार सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि अपनी विदेशी यात्रा के दौरान कार्ति ने कई बैंक खाते बंद कर दिए। जब इस मामले में एएसजी तुषार मेहता ने सुनवाई के दौरान जजों को इस तथ्य से अवगत कराया तो उस समय वे या तो बगलें झांक रहे थे या फिर छत की ओर देख रहे थे। सुनवाई के दौरान जजों का इस प्रकार का व्यवहार निश्चित रूप से अनैतिक साठगांठ की ओर इशारा कर रहा है।

सवाल उठता है कि आखिर कोर्ट कार्ति चिदंबरम के प्रति इतनी उदारता क्यों दिखा रहा है? कहीं इसलिए तो नहीं कि कार्ति चिदंबरम के दादा सुप्रीम कोर्ट के जज थे और माता-पिता दोनों सुप्रीम कोर्ट के ही नामी वकील हैं। या फिर इसलिए तो नहीं क्योंकि पी चिदंबरम साल 2014 तक दोनों यूपीए सरकारों में ताकतवर मंत्री रह चुके हैं। इस नाते उस दौरान खाए नमक का बेटे कार्ति को छूट देकर उसका हक अदा कर रहे हैं?

जिस प्रकार पी चिदंबरम के बेटे कार्ति चिदंबरम को 2जी केस से लेकर एयरसेल मैक्सिस तक के मामले में सुप्रीम कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट तक से जमानत दर जमानत मिल रही है उससे निश्चित रूप से आम जनमानस में कोर्ट के प्रति गलत अवधारणा जगह बनाने लगी है। लोगों के मन में बैठ गया है कि कोर्ट भेदभाव तरीके से उसे बचाने में जुटा है। जो एक स्वस्थ न्यायपालिका के लिए उचित नहीं है। जिस प्रकार कोर्ट एकतरफा तरीके से कार्ति चिदंबरम को बचाने में लगा हुआ दिखता है उसे देखते हुए यह कहने में कोई हर्ज नहीं न्याय के मंदिर में बैठे कुछ देवता ही दानव बनकर इसे ध्वस्त करने पर आमादा हैं।

ऐसे में भारतीय स्वायत्त संस्थानों तथा लोकतांत्रिक संस्थानों पर भाजपा और संघ के लोगों का कब्जा करने का आरोप लगाने वाले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को देखना चाहिए कि आखिर इस न्याय के मंदिर को कोई और नहीं बल्कि उनके ही पूर्व मंत्री अपने ही लोगों के माध्यम से ध्वस्त करने पर तुले हुए हैं।

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URL: Supreme Court allows Karti Chidambaram to travel abroad

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