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ललित नारायण मिश्र की हत्या में आया था इंदिरा गांधी के OSD का नाम ?

बिहार को अगर एक आम समझिए, तो इसकी एक फाँक (टुकड़ा) है मिथिला। यहीं पैदा हुए थे ललित नारायण मिश्र (Lalit Narayan Mishra)। सहरसा जिले के बलुआ बाजार में। मिथिला में ललित नारायण मिश्र अपने पूरे नाम से नहीं पुकारे जाते। यहाँ आज भी उनका जिक्र ‘ललित बाबू’ कह कर ही होता है। लोग कहते हैं कि ललित बाबू बेवक्त न मरे होते, तो बिहार आज बहुत आगे होता। इस लाइन में बड़ी चूक है। मरे न होते की जगह मारे न गए होते पढ़िएगा। 

फ्रंट लाइन का इतना बड़ा नेता मिथिला को फिर कभी नहीं मिला। ललित नारायण मिश्र की जब हत्या हुई, तब वो रेल मंत्री थे। लोग कहते हैं कि वो जिंदा होते तो प्रधानमंत्री बन जाते। इंदिरा गाँधी भी उन्हें PM बनने से रोक नहीं पातीं। कहते तो ये भी हैं कि अगर ललित बाबू जिंदा होते, तो जय प्रकाश नारायण कभी इंदिरा गाँधी के खिलाफ आंदोलन शुरू ही न करते। उनकी मौत के समय से जो बातें शुरू हुईं, वो कभी ठंडी नहीं हुईं। कई बातें हैं। कई अफवाहें हैं और कई सवाल भी हैं, जो आज भी अनुत्तरित हैं।

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तत्कालीन रेल मंत्री के कत्ल के 46 साल बीत जाने के बावजूद ये पता नहीं चला कि असली क़ातिल कौन है? 2 जनवरी 1975 को ललित मिश्र स्पेशल ट्रेन से समस्तीपुर रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर उतरे थे। मौका था- समस्तीपुर-मुजफ्फरपुर ब्रॉड गेजलाइन के उद्घाटन का। वो शाम पाँच बजे समस्तीपुर पहुँचे। प्लेटफॉर्म पर बड़ी संख्या में उनके समर्थक मौजूद थे।

वहाँ पर उनके भाई जगन्नाथ मिश्र और एमएलसी रामबिलास झा के साथ कई और राजनेता भी मौजूद थे। उद्घाटन के बाद एक सभा का भी आयोजन किया गया था। जैसे ही पौने 6 बजे ललित नारायण मिश्र ने अपना भाषण बंद किया वैसे ही उनके मंच पर एक जोरदार धमाका हुआ। इस धमाके में ललित बाबू के पाँव में बम के छर्रे धँस गए थे, जिससे वह घायल हो गए थे।

वहीं उनके भाई जगन्नाथ मिश्र और बाकी नेताओं को भी चोटें आईं थी। ललित बाबू होश में थे और उन्होंने कहा कि जिस स्पेशल ट्रेन से वो आए हैं उसी से उन्हें दानापुर रेलवे अस्पताल ले जाया जाए, लेकिन पता नहीं क्यों 2 घंटे तक ट्रेन वहीं समस्तीपुर में खड़ी रही और रात 8 बजे दानापुर के लिए रवाना हुई। रात 12 बजे ट्रेन दानापुर पहुँची। डॉक्टरों ने बताया कि रेल मंत्री का ऑपरेशन करना होगा और ऑपरेशन के दौरान ही तत्कालीन रेल मंत्री ललित नारायण मिश्र की हालत बिगड़ने लगी और सुबह करीब 9.30 बजे डॉक्टरों ने उनकी मौत की घोषणा कर दी।

ललित बाबू की मौत कोई आम घटना नहीं थी। वो न केवल ताकतवर नेता थे बल्कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के बेहद करीबी थे। आनन-फानन में जाँच CBI के हवाले की गई। बिहार CID को भी जाँच में CBI की मदद करने के लिए कहा गया। कुछ लोगों को हिरासत में लिया। CBI के मुताबिक आनंद मार्ग के मुखिया नेता आनंद मूर्ति की गिरफ्तारी का बदला लेने के लिए ये साजिश रची गई थी। लेकिन खुद ललित नारायण मिश्र के परिवार वालों ने CBI जाँच पर शक करना शुरू कर दिया। वारदात में मारे गए ललित नारायण मिश्र की पत्नी ने तो बकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इस बात का ऐलान कर दिया कि उनके पति की हत्या के पीछे आनंद मार्गियों का हाथ नहीं है बल्कि ये राजनैतिक हत्या है।

उसकी सबसे बड़ी वजह ये थी कि आनंद मार्गियों को गिरफ्तार करने से पहले CBI ने फरवरी में ही कुछ और लोगों को भी ललित नारायण मिश्र की हत्या के मामले में गिरफ्तार किया था। CBI ने 3 फरवरी 1975 को अरुण कुमार मिश्र नाम के शख्स को सबसे पहले ललित नारायण मिश्र हत्याकांड में गिरफ्तार किया था और अरुण कुमार मिश्र की निशानदेही पर उनके एक साथी अरुण कुमार ठाकुर को भी 2 दिन बाद यानी 5 फरवरी 1975 को गिरफ्तार किया था।

अरुण कुमार ठाकुर ने अपना जुर्म कबूल किया और कहा कि धमाके के लिए उसे पैसे का लालच दिया गया था और किसी झा बॉस से मिलवाने की बात हुई थी। अरुण कुमार ने कोर्ट में अपने दिए बयान में कहा था कि 30 दिसंबर 1974 को अरुण कुमार मिश्र ने उसको बताया कि ललित नारायण मिश्र की समस्तीपुर रेलवे स्टेशन पर होने वाली सभा में बम फेंकना है। इस काम के लिए ‘बॉस’ झा पैसा देंगे। अरुण कुमार मिश्र ने ये भी बताया कि ‘बॉस’ झा दो जनवरी को आएँगे तब वो उसे ‘बॉस’ झा से मिलवा देगा। इसके बाद मिश्र और ठाकुर अपने एक साथी शिव शर्मा के पास तीन हैंड ग्रेनेड लेकर 2 जनवरी को समस्तीपुर रेलवे स्टेशन पहुँचे थे।

बाद में CID की तफ्तीश के दौरान ये भी पता चला कि जिस ‘बॉस’ झा का नाम मामले का आरोपित अरुण कुमार मिश्र ले रहा था वो दरअसल बिहार के ही MLC रामबिलास झा थे। अरुण ने ये भी बताया कि रामबिलास झा और ललित नारायण मिश्र के रिश्ते बहुत अच्छे हुआ करते थे लेकिन बाद में इनमें खटास आ गई और रामबिलास झा ललित बाबू से नफरत करने लगे। 

बिहार के आपराधिक जाँच विभाग (CID) के अधिकारियों ने समस्तीपुर के तत्कालीन जेलर एसए रहमान को अरुण मिश्र से दोस्ती करने और पूरी कहानी जानने के लिए राजी किया। रहमान ने गुप्त रूप से अरुण मिश्र के साथ एक बातचीत को टेप-रिकॉर्ड किया जिसमें उन्होंने ‘बॉस’ की पहचान राम बिलास झा के रूप में की और कहा कि उन्होंने तत्कालीन केंद्रीय रेल मंत्री एलएन मिश्र को मारने के लिए 20,000 रुपए देने का वादा किया था।

लेकिन क्या एक MLC एक रेल मंत्री को अपनी साजिश का शिकार बना सकता था। जब बिहार CID ने मामले की तफ्तीश को और आगे बढ़ाया तो सामने आया यशपाल कपूर का नाम। यशपाल कपूर उस वक्त इंदिरा गाँधी के OSD थे। CBI की जाँच से उस वक्त के मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर भी संतुष्ट नहीं थे और उन्होंने जाने-माने वकील तारकुंडे से इस मामले में रिपोर्ट देने को कहा। तारकुंडे ने अपनी रिपोर्ट में न केवल यशपाल कपूर पर शक जताया बल्कि उन्होंने तो प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के भी इस मामले में ज्यादा रुचि दिखाने पर सवाल खड़े किए।

हालाँकि, इंदिरा गाँधी ने रहमान के बयान में कुछ खास रुचि नहीं दिखाई। इस मामले में इंदिरा गाँधी की भूमिका पर भी कई सवाल उठे। कुछ महीनों बाद सीबीआई ने भी पलटी मारी और कहा कि उनके पास अरुण ठाकुर और अरुण मिश्र के खिलाफ पुख्ता सबूत नहीं हैं। यहाँ भी पेच है क्योंकि एक चश्मदीद शंकर साह का बयान है कि दोनों अरुण न केवल मौका-ए-वारदात पर मौजूद थे बल्कि उसने दोनों को भागते हुए भी देखा था। 

कत्ल का केस होने के बाद भी ललित नारायण मिश्र का पोस्टमार्टम नहीं होने दिया गया। यह भी साफ नहीं हुआ कि घायल होने के बाद एलएन मिश्र को अस्पताल पहुँचाने में इतना वक्त क्यों लगा? जानकार इन दोनों बातों को केस कमजोर करने की एक बड़ी कड़ी मानते हैं।

साल 2014 में दिल्ली के एक ट्रायल कोर्ट ने इस मामले में 4 लोगों को उम्र कैद की सजा सुनाई लेकिन साल 2015 में दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले में दोषी पाए गए सभी लोगों को सुबूतों के अभाव में बरी कर दिया। कमाल की बात ये है कि इस मामले में ललित नारायण मिश्र के परिवार वाले ही उन आनंदमार्गियों को उनकी हत्या का जिम्मेदार नहीं ठहराते, बल्कि उनकी उँगलियाँ तो उस पार्टी की ओर उठती है जिसके ललित नारायण खुद इतने बड़े नेता और सरकार में रेल मंत्री थे।

साभार लिंक

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