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लाशों को बेचकर खबर बनाने वाले की लाश बनी खबर!

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जी हाँ! कर्म का फल बहुत तेजी से भोगना होता है, आप इससे भाग नहीं सकते. कभी कभी इसका परिणाम तुरंत मिल जाता है तो कभी देर से मिलता है. मगर मिलता है. ऐसा ही हुआ, रायटर्स के साथ काम करने वाले दानिश सिद्दीकी के साथ. अपने पूरे कैरियर में भारत के हिन्दुओं, भारत के हिंदुत्व और भारत की जनता द्वारा चुनी गयी सरकार को असहिष्णु ठहराते हुए दानिश सिद्दीकी का जब असली असहिष्णुता से सामना हुआ, तो वह खुद ही एक तस्वीर बन गए, ऐसी तस्वीर जो लोगों को याद दिलाती रहेगी कि लाश बेचने वालों की लाश खुद एक खबर बन जाती है.

दिल्ली दंगों से लेकर कोरोना की दूसरी लहर तक भारत को बदनाम करने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ा. और भारत की तस्वीरों के बहाने विपदाओं को बेचने में शर्म का अनुभव नहीं किया. दिल्ली दंगे में आई बी अधिकारी अंकित की ठंडे दिमाग से, सोच समझ कर की गयी हत्या पर शायद एक भी तस्वीर न खींचने वाले दानिश सिद्दीकी शायद अपनी मुस्लिम पहचान से उबर नहीं पाए थे और यही कारण है कि कई तस्वीरें बेहद एकतरफा रहीं.

तालिबान के हाथों मारे गए दानिश सिद्दीकी के एक पुराने ट्वीट का भी स्क्रीनशॉट वायरल हुआ, जिसमे वह इशरत जहाँ के हत्यारों के लिए फांसी की सजा मांग रहे थे और वह भी भारतीय मुस्लिम होने के नाते! एक भारतीय नागरिक होने के नाते नहीं. शायद इसी पहचान को लेकर दानिश अपने कार्य को करते होंगे क्योंकि उनकी रिपोर्टिंग से हिन्दू या तो गायब था और यदि था, जैसा कि कोरोना की चिताओं की तस्वीरों में था, तो वह केवल उपहासात्मक था, दर्द नहीं था, उन्हें कोसना था.

दानिश सिद्दीकी ने अपनी पहचान केवल भारतीय मुसलमान रखी, तभी दानिश का रोहिंग्याओ के प्रति पक्षपाती रवैया स्पष्ट दिखता था और उन्हें पुलित्ज़र सम्मान भी रोहिंग्या की तस्वीर पर मिला था. दानिश सिद्दीकी ने एक भी ऐसी घटना पर निष्पक्ष रिपोर्टिंग नहीं की थी, जिसमें हिन्दू पीड़ित था, उनकी उस पहचान के समुदाय के द्वारा जिसे वह खुशी से धारण किये घूमते थे. यही कारण रहा होगा कि उन्हें विश्वास होगा कि तालिबान की गोली उन्हें नहीं लगेगी, पर वह लगी और दानिश अफगानिस्तान में तालिबानी हिंसा का शिकार हुए.

भारत में यह खबर आते ही बुद्धिजीवियों और सेक्युलर पत्रकारों को झटका लगा. अभी तक जिस धर्म को और जिस देश को असहिष्णु कह कर कोसा जा रहा था, वहां पर दानिश खुलकर अपनी पहचान के साथ एजेंडा चलाते रहे, मगर अपनी ही मजहबी साझी पहचान का निशाना बन गए. पहले पहल तो इन सेक्युलर लोगों को समझ नहीं आया कि करना क्या है, क्योंकि तालिबान को दोषी कैसे ठहरा सकते थे?

तो पहले केवल मृत्यु की बातें हुई, कि दानिश की मौत की निंदा करते हैं या हत्या की निंदा करते हैं. यहाँ तक कि मशहूर एकतरफा जहरीली पत्रकार राना अयूब ने भी केवल दानिश को याद किया और कहा कि वह दानिश को मिस करेंगी, पर तालिबान पर कोई ट्वीट नहीं आया:

सबसे मजेदार ट्वीट तो जामिया से है, जहां से दानिश ने डिग्री प्राप्त की थे, उन्होंने भी वक्तव्य जारी करके दानिश की “मौत” की निंदा की है. जामिया ने यह नहीं बताया कि दानिश को किसने मारा? जाहिर है, दानिश अपनी मौत नहीं मरे हैं, वह तालिबानी अर्थात इस्लामी हिंसा का शिकार हुए हैं. पर उसे जामिया द्वारा स्वीकारने में हिचकिचाहट क्यों है?

इस पर फ्रांसिस गौतिए का ट्वीट गौरतलब है, उन्होंने साफ़ कहा है कि दानिश सिद्दीकी की मौत दुखद है पर उन्होंने हमेशा अपनी मुस्लिम पहचान को पत्रकारिता की निष्पक्षता से ऊपर रखा. उन्होंने मीडिया के रुदन पर कहा कि पूरा मीडिया उसका शोर मचा रहा है, मगर क्या मीडिया ने बुरी तरह से मारे गए दो साधुओं का शोक मनाया था:

अभिजीत मजुमदार ने लिखा कि यदि आप भारत के कथित लिब्रल्स की टाइमलाइन देखेंगे तो ऐसा लगेगा कि दानिश को दक्षिण पंथियों ने मारा है, और उन्होंने एक भी शब्द इस घृणित अपराध के लिए नहीं कहा है. मगर आप सच्चाई से नहीं भाग सकते:

भारत के लिब्रल्स के आका रविश कुमार तो एक कदम और आगे बढ़ गए हैं, और उन्होंने उस गोली को ही लानत मनालत भेज दी है, जिसने दानिश की जान ली, मगर वह गोली किसने चलाई, इस पर मौन है?

रविश कह रहे हैं कि दानिश भारतीय पत्रकारिता को एक नए मुकाम पर ले गए. मगर वह यह नहीं बताते कि दानिश भी उन्हीं की तरह एकतरफ़ा दिखाते हैं. वैसे दंगाई का धर्म बदलकर किसी और का नाम दंगों में लेने वाले रविश कुमार दानिश को पत्रकारिता में साहसिक पत्रकार कह ही सकते हैं, क्योंकि रविश की तरह वह भी केवल एक तरफा रिपोर्टिंग कर रहे थे.

रविश, जामिया, और राना तीनों ही दानिश की मौत पर शोक मना रहे हैं, निंदा कर रहे हैं, पर किसने मारा, इसका जबाव नहीं है, अब इसका जबाव घुमाफिरा कर किसने दिया है, आइये देखते हैं:

आल्ट न्यूज़ के संस्थापक और कथित रूप से फैक्ट चेकर, मुहम्मद जुबैर, जो अभी हाल ही में एक झूठा वीडियो मजहबी हिंसा के लिए फैला चुका है, वह दानिश की इस मौत के लिए दक्षिणपंथियों को जिम्मेदार ठहरा रहा है. इन लोगों का जहर है कि कम नहीं होता:

इस पूरे ट्वीट में तालिबान का नाम नहीं है, उस मजहबी हिंसा का नाम नहीं है, जिसने अपने ही हम मजहब वाले की जान ले ली, इसमें मदरसा पोषित उस विचारधारा का नाम नहीं है जिसने दानिश की जान ले ली, उसमें उस मजहबी कट्टरता का उल्लेख नहीं है, जिसने कल तो दानिश की जान ली मगर उससे पहले अपने ही वतन के लोगों की जान ले ली थी और, उसमे उस हवस का जिक्र नहीं है, जो केवल खुद ही जिंदा रहना चाहती है, और किसी को जिंदा ही नहीं देखना चाहती है, और इसमें उस शारीरिक हवस और प्यास का ज़िक्र नहीं है जिसके चलते तालिबान ने अपने इलाके के मौलवियों को पंद्रह साल से अधिक की लड़कियों की सूची अपने लड़ाकों के लिए बताने कहा है.

मुहम्मद जुबैर जैसे लोग अपने मजहब की रक्षा के लिए इतने बेचैन हो गए हैं, कि वह अपने ही मजहब के दानिश की मौत को इस्तेमाल कर रहे हैं, उस पर छाती पीट रहे हैं. मिस्टर जुबैर, उसे राईटविंगर हेट करते थे, मगर उसे मारा उसके अपने मजहबी लोगों ने है, इसे याद रखियेगा!

राना अयूब और अजित अंजुम जैसे लोग तालिबान को नहीं कुछ कह रहे हैं, बल्कि उन्होंने अपना निशाना बना लिया है हिंदुत्व वादी लोग. राजदीप का कहना है कि दानिश की मौत का जश्न मनाने वालों का ट्विटर खाता बैन हो जाना चाहिए, पर राजदीप जैसे लोग रोहित सरदाना की मौत पर जश्न मनाने वालों से कुछ नहीं कहते. राना अयूब का कहना है कि दानिश एक बहादुर की मौत मरा और भारत के दक्षिणपंथी उस पर जश्न मना रहे हैं! मगर राना अयूब यह नहीं कह रही हैं कि दानिश को मारा किसने और किस विचारधारा ने! यह सही है कि भारत के दक्षिणपंथ का एक बड़ा वर्ग दानिश सिद्दीकी को पसंद नहीं करता था, पर दानिश मरा आपकी मजहबी विचारधारा के लोगों के हाथों है!

अजित अंजुम जैसे पत्रकारों को यह दुःख है कि अगर वह दिनेश होता तो प्रधानमंत्री शोक व्यक्त कर रहे होते,

दरअसल यह लोग दानिश के मारे जाने से दुखी नहीं हैं, बल्कि यह लोग खुश हैं, क्योंकि इस बहाने इन्हें उन लोगों पर हमला करने का मौक़ा मिला है, जिनसे यह बेइन्तहा नफरत करते हैं. दानिश की मुस्लिम पहचान को मुस्लिम पहचान के ही लोगों ने मारा है, और यही इनकी परेशानी है. तेजस्वी यादव जैसे कथित युवा नेताओं की भी परेशानी यही है कि वह अपने मुस्लिम वोट बैंक को नाराज़ करने के लिए तालिबान का नाम नहीं ले सकते, इसलिए वह केवल मौत कहकर काम चलाते हैं:

ट्विटर पर एक बड़ा वर्ग यही पूछ रहा है कि दानिश को किसने मारा, उसके विरोध में उसकी मौत का जश्न मनाने वालों की तस्वीरें लोग साझा कर रहे हैं! पर यह तो वह वर्ग है जो इस्लामी कट्टरपंथ के निशाने पर सबसे पहले है और दानिश सिद्दीकी का निशाना भी यही थे क्योंकि दानिश अपनी मुस्लिम पहचान से मुक्त नहीं थे. इसलिए यह प्रश्न बार बार इन लिब्रल्स और तुष्टिकरण फ़ैलाने वाले नेताओं से पूछना होगा कि आखिर दानिश को किसने मारा?

एक और सेक्युलर पत्रकार शेख सालिक, जिसका दिल हमेशा कश्मीर में रहता है, उसका कहना है:

अर्थात दानिश सिद्दीकी ने दिल्ली दंगों और कोविड के दौरान जो भी कवरेज किया, उसके कारण उसे घृणा मिली और वह घृणा उसकी मौत के बाद और ज्यादा निकल रही है!

मगर शेख सालिक भी यह नहीं बताते कि आखिर दानिश को किसने मारा?

अक्सर टीवी पर कांग्रेस का पक्ष रखने वाली रागिनी नायक भी दानिश की उन्हीं तस्वीरों को साझा करती हुई नज़र आईं, जिनके कारण कई लोग आहत हुए थे. और कहा कि दानिश जैसे वीर को याद रखा जाएगा:

इस पर एक यूजर ने कहा

जिंदगी हिन्दूओ को आतंकी साबित करने में लगा दी और..

जब असली आतंकियों से सामना हुआ तो फोटो भी न खींच पाये..!!

विशाल डडलानी जैसे गायक और फैक्ट चेक करने के नाम पर एजेंडा चलाने वाले प्रतीक सिन्हा को दुःख है कि प्रधानमंत्री दुःख व्यक्त नहीं कर रहे हैं, तो किसके लिए दुःख व्यक्त करें, भारतीय के लिए, भारतीय मुस्लिम के लिए या फिर आतंकियों के प्रति सहानुभूति रखने वाले मुस्लिम पत्रकार के लिए:

वह दरअसल स्वयं इस्लामी आतंक का समर्थक था, जिसने तालिबान का समर्थन किया, परन्तु दुर्भाग्य से जिन कथित राईटविन्गर्स को वह गाली देता रहा, जिस धर्म की चिताओं की तस्वीरों को बेचकर खुद महान बनता रहा और जिन्हें असहिष्णु ठहराता रहा, उन्होंने उसके साथ कुछ नहीं कहा और जिस विचार का साथ दिया, जिसके साथ सहानुभूति रखता रहा, उसी ने उसे मार डाला!

बस यही बात कथित पिछड़े लेफ्ट लिब्रल्स की समझ में नहीं आ रही है कि वह जिनसे सहानुभूति रखते हैं, उन्हीं की गोलियों का शिकार होते हैं, तो उसकी आलोचना कैसे करें? ऐसे में उनकी कोशिश यही है कि दानिश जैसे लोग जो पूरी ज़िन्दगी हिन्दुओं को असहिष्णु ठहराते रहें और इस्लामी आतंकवाद का शिकार हों, उनकी मौत को शहादत तो बताना, मगर दोष केवल हिंदुत्व और हिन्दुओं को देना!

परन्तु कांग्रेस के नेताओं का उतावलापन समझ से बाहर है! और कथित पत्रकारों का भारत के प्रधानमंत्री द्वारा इस हत्या पर निंदा व्यक्त करने का उतावलापन भी समझ से बाहर है, क्योंकि आपने अभी तक तालिबान की निंदा नहीं की है, जैसा एक सीटी रवि पूछते हैं:

एक कॉलमनिस्ट जैनब सिंकंदर सिद्दीकी ने ट्वीट किया कि कैसे दक्षिणपंथी लोग दानिश सिद्दीकी की मौत का जश्न मना रहे हैं, तो उन्हें रोहित सरदाना की मौत पर उन्हीं के ट्वीट का स्क्रीन शॉट किसी ने भेजकर याद दिलाया कि उन्होंने क्या किया था:

मगर तालिबान खुद दानिश सिद्दीकी के लिए क्या था, क्या यह कभी सोचा? तालिबान को क्या कभी दानिश ने भी आतंकवादी कहा?

दानिश के पुराने ट्वीट यही बताते हैं कि वह खुद ही तालिबान के प्रति एक सॉफ्ट रवैया रखते थे और हिन्दुओं के प्रति असहिष्णु! हिन्दुओं के प्रति वह कितने असहिष्णु थे उसका उदाहरण वह कुम्भ मेले के दौरान की गयी अपनी पत्रकारिता से दे चुके थे.

लेफ्ट लिब्रल्स चाहते हैं कि वह हिन्दुओं की मौत की कामना करें, हिन्दुओं की मौत बेचकर पैसा कमाएं और हिन्दू धर्म को आतंकी घोषित करें, और फिर भी हिन्दू उन्हें अपना शुभचिंतक मानें! पर अब समय बदल गया है, अब जबाव दिया जा रहा है! और एकतरफा नहीं चलेगा कुछ भी,

दानिश आप उन लोगों के हाथों मारे गए हैं, जिनके लिए आपका दिल धडकता था न कि उन लोगों के हाथों जिनकी मौत बेचकर आप महान पत्रकार कहलाए!

फिर भी प्रश्न यही है कि लेफ्ट लिब्रल्स के मुंह पर तालिबान का नाम क्यों नहीं है?

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Sonali Misra

सोनाली मिश्रा स्वतंत्र अनुवादक एवं कहानीकार हैं। उनका एक कहानी संग्रह डेसडीमोना मरती नहीं काफी चर्चित रहा है। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति कलाम पर लिखी गयी पुस्तक द पीपल्स प्रेसिडेंट का हिंदी अनुवाद किया है। साथ ही साथ वे कविताओं के अनुवाद पर भी काम कर रही हैं। सोनाली मिश्रा विभिन्न वेबसाइट्स एवं समाचार पत्रों के लिए स्त्री विषयक समस्याओं पर भी विभिन्न लेख लिखती हैं। आपने आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में परास्नातक किया है और इस समय इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से कविता के अनुवाद पर शोध कर रही हैं। सोनाली की कहानियाँ दैनिक जागरण, जनसत्ता, कथादेश, परिकथा, निकट आदि पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।

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