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घनघोर अंधकार की रात में रामायण हमारे लिए एक दीप की भांति प्रज्जवलित है

रामानंद सागर की ‘रामायण‘ जब कोरोना काल में पुनः प्रसारित हुई तो उसने जनमानस को इस खतरनाक वायरस से लड़ने का संबल दिया। राम और सीता के अनुपम निश्छल चरित्र को देख लोग रो पड़ते थे। उनके आंसुओं में वह कलुषता बह निकली, जो कई दशकों से भारतीय जनमानस में भौतिकता की चाह ने इकठ्ठा कर रखी थी। रामायण के 16 अप्रैल के दो एपिसोड ऐसे रहे, जिन्हे विश्वभर के 7.7 करोड़ लोगों ने देखकर विश्व कीर्तिमान बना दिया। ध्यान रहे ये विश्व रिकार्ड मात्र दो एपिसोड का है, सम्पूर्ण धारावाहिक का नहीं। सभी के मन में ये सवाल उठा कि रामायण के ये दो एपिसोड ही इतने अधिक क्यों देखे गए। इसकी गहराई में जाएंगे तो पता चलेगा कि हमारे पौराणिक ग्रन्थ और उनके नायकों में हम कोरोना जैसी आपदाओं से लड़ने का आत्मबल खोज रहे हैं। 
 
अंतर्मन के तार बड़े जटिल होते हैं। हम समझ ही नहीं पाते कि किसी घटना या किसी व्यक्तित्व से हमारा चुंबकीय जुड़ाव क्यों कर हो जाता है। रामानंद सागर की रामायण से जो चुंबकीय जुड़ाव कोरोना काल में हुआ, उसको सामान्य जन विश्लेषित नहीं कर सका। मानव मन किसी भी घटना या दृश्य का समग्र प्रभाव (whole impect  महसूस कर पाता है, उसे अलग करके नहीं देख पाता। रावण की सेना से युद्ध करते हुए लक्ष्मण घायल हो जाते हैं। रावण की मारक शक्ति इतनी विध्वंसक है कि लक्ष्मण का जीवित रह पाना बहुत कठिन है। राम, सीता, हनुमान और समस्त सेना के लिए ये पल वैसे ही हैं, जैसे आज विश्व के हालात बने हुए हैं। उनके लिए कोई आशा की किरण कहीं से प्रस्फुटित नहीं हो रही है। इस भावना को उन करोड़ों दर्शकों ने हृदय तल पर अनुभव किया, जो ये एपिसोड देख रहे थे।
 
यहाँ आप रावण की मारक शक्ति को सीधे-सीधे कोरोना से रिलेट कर सकते हैं। वर्तमान परिवेश में कोरोना प्रकृति द्वारा मारा बाण ही प्रतीत हो रहा है, जिसकी कोई संजीवनी विश्व के पास नहीं है। लॉकडाउन में रहते हुए हम प्रतीक्षा कर रहे हैं कि प्रकृति ने जो मारक शक्ति का प्रहार हम पर किया है, उसका निदान जल्द से जल्द निकलना चाहिए। देखते ही देखते रामानंद सागर रचित रामायण के ये दो एपिसोड हमारी पीड़ा से जुड़ गए। दर्शक टीवी पर लक्ष्मण जी को मूर्च्छित देख हम अपनी पीड़ा को श्रीराम और हनुमान जी की पीड़ा से जोड़ लेते हैं। ये जुड़ाव अंतर्मन के गहरे तल पर होता है लेकिन ऊपर निर्विकार आंसू प्रवाहित होते हैं, जिसे दिमाग समझ नहीं सकता। हमारे पौराणिक ग्रंथों, विशेष रूप से रामायण में भले ही हमारी समस्याओं का निदान न मिले लेकिन वह ऐसे संकट में हमें न केवल आत्मबल प्रदान करती है बल्कि हमारा विषाद बाहर निकाल फेंकती है। इस पहले एपिसोड ने सुनिश्चित कर दिया था कि 16 अप्रैल की रात प्रसारित होने वाले दूसरे एपिसोड को और भी अधिक दर्शक देखेंगे। 
 
विभीषण से ज्ञात हुआ कि लंका में रहने वाले सुषेण वैद्य ही लक्ष्मण को बचा सकते हैं। हनुमान का वहां जाना और सुषेण को भवन समेत उठा लाने का दृश्य सांकेतिक रूप से बताता है कि यदि मानव में असीम इच्छाशक्ति हो तो हर समस्या का हल निकाला जा सकता है। सुषेण का हनुमानजी को संजीवनी के बारे में बताना इस बात को सांकेतिक रूप से प्रकट करता है कि सम्पूर्ण विश्व को ऐसे नायक की प्रतीक्षा है जो कम से कम समय में कोरोना को पराजित करने वाली संजीवनी ला सके। इस एपिसोड की रेटिंग निश्चित ही पहले से अधिक रही होगी। पहले एपिसोड में एक ऐसी समस्या दिखाई गई, जिसका तात्कालिक निदान मौजूद नहीं था और जब इसका निदान मिला, तो उसे लेकर आना और भी दुष्कर था। इस समय कोरोना एपिसोड में यही सिचुएशन बनी हुई है। हम बेसब्री से कोरोना का निदान खोजने का प्रयास कर रहे हैं। हम अपने उस हनुमान की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जो कोरोना की दवाई लेकर आएगा।
 
हमने स्पेन में डॉक्टरों को घुटने टेककर चर्च में प्रार्थनारत देखा। हमने पाकिस्तान में मौलवियों के साथ आम जनता को बिलखते देखा। हमने देखा कि इटली में मौतों को रोक न पाने के संताप में डॉक्टर कैसे फूटकर रो रहे थे। निश्चित ही कोरोना से लड़ने की जिजीविषा वे खो चुके हैं। उनके पास संबल देने के लिए न श्रीराम हैं न महाबली हनुमान। कोरोना का इलाज तो हमारे पास भी नहीं है लेकिन हमारे पास रामायण है। रामायण की कथाएं हमें साहस प्रदान कर रही हैं। हमें ईश्वर में विश्वास रखना सीखा रही हैं। लक्ष्मण और संजीवनी बूटी वाले एपिसोड करोड़ों दर्शकों ने देखा, तो वह कोई संयोग नहीं था। उसके पीछे भारतीय जनमानस का मनोविज्ञान छुपा है। 

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घनघोर अंधकार की इस काली रात में रामायण हमारे लिए एक दीप की तरह प्रज्जवलित होकर हमारा विश्वास मजबूत कर रही है। उधर पश्चिम के पास ईसा मसीह की मूर्तियां और चर्च तो हैं लेकिन पौराणिक कहानियां नहीं हैं। उनके पास ऐसे पौराणिक प्रसंग नहीं है, जो उन्हें बिलखने से रोक सके। हमारे आंसू  विषाद बहा रहे हैं लेकिन उनके आंसू उस विवशता को दर्शा रहे हैं, उस मनोस्थिति को कि ‘अब हमारे पास कोई रास्ता नहीं है’।

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Vipul Rege

Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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2 Comments

  1. Avatar Satish Tiwari says:

    बहुत ही प्रासंगिक सुसंगत लेख।

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